मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

चल बैठें चर्च के पीछे ....


दिल  की सुनसान   गलियों से
गुज़रता आखिरी तन्हाँ क्रिसमस
पूरा चाँद और ठंडी हवा
न  पाने की खुशी
न ही खो देने का गम

जीना ज़रूरी है
बेबसी आदमियों और फूलों की
ज़िन्दगी का एक हिस्सा है
मसीहा शायद इस ही ज़िन्दगी की ख़ातिर
खुद को कुर्बान कर गए हैं

शाम  रोज़ होती है मगर
छुट्टी सिर्फ क्रिसमस को ही मिलती है 
चर्च रोज़ सायें सायें करता है
मगर आज आबाद है

आज शाम सब कुछ सजा है
मगर मेरा दिल बुझा है
इस सजे धजे शहर में
मै  बिलकुल तन्हां हूँ
डरा हुआ अकेलेपन से

शुक्र है
कल फिर रोज़ की तरह
मै दफ्तर में हूँगा
कई सारे अकेले लोगों के बीच
एक और अकेला

कल नहीं है कोई त्यौहार
नहीं सुनूंगा मै
 अपनी आत्मा का शोर
नहीं डरूंगा मै
घर  के, अंदर के अकेलेपन से

लौट कर दफ्तर से
गुजारूँगा वक़्त
कबूतरों के साथ
बैठ कर चर्च के पीछे .....

  


गुरुवार, 8 नवंबर 2012

"भाभी बेगम"


" गुडिया! आँगन की खूंटी पर भूसे वाले कमरे की चाबी टंगी है, नत्थे  आता होगा, उसे थमा देना. " अब्बू मुझे काम सौंप तेज़ क़दमों से बाहर निकल आये. मैंने खुशवंत सिंह की शोर्ट स्टोरीज़ का कलेक्शन साइड टेबल पर रख उकताई सी एक नज़र आँगन की खूंटी पर डाली ही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई. लगता है नत्थे भाई आ गए. मै उठी और कुंडी खोली, सामने बिट्टन भाभी खडीं थीं, आईं! ये क्या!!  क्या नत्थे भाई पूरे कुनबे समेत आ गए थे! सलाम अलिय्कुम भाभी-बेगम! मेरे कहने की देर थी कि भाभी दरवाज़े की चौखट पर ही मेरे गले लग गयीं. "अब्बू ने तो कहा था कि नत्थे भाई आने वालें हैं!" मेरे मुह से निकला, "लो बीबी! भाभी बेगम से क्या दुश्मनी है जो ऐसी आजिज़ी से भाई को तो याद किया जा रहा है पर , भाभी को नहीं! " भाभी बुर्का एक तरफ रखते हुए बोलीं. "अरे! वह बात नहीं, वह  भूंसे का सौदा ....."  मुझे अपने आप में बड़ी शर्मिंदगी हुई. " खैर! क्या लेंगीं आप! ठंडा लेंगी या चाय बना दूं!" मैंने अपने झेंप मिटाते हुए कहा, "अरी बिन्नो! तुम्हारे भाई तो कह रहे थे, तुम्हे तेफाइड (टॉयफाइड) हो गया है, हम अयादत  (खबर पुरसी)  को आयीं हैं ,मरीज़ से ही काम करवा लें क्या!" मुझे भाभी पर बेसाख्ता प्यार आ गया.

 नत्थे भाई उमर में हमसे कोई सात आठ साल बड़े होंगे और भाभी बेगम पूरे दो साल छोटी. अब्बू कह रहे थे, नत्थे भाई एक और भाई के साथ जुड़वां पैदा हुए थे. वक्त बीता इनकी नत्थी वाला भाई तो अल्लाह को प्यारा हो गया निशानी के तौर पर यही रह गए और इनका नाम. अब्बू के दूर के रिश्ते की खलेरी (मौसेरी ) बहन के बेटे , शैखानी बुआ के इकलौते फ़रज़न्दे सालेह (सुपुत्र) और हम बच्चो की जान. "लेओ  हम कबीट की चटनी बनाये थे, तो रख लाये, साथ बैठ, गप लगा, खायेंगे; तुम्हारा भी मुह खुल जाएगा." भाभी बेगम ने कटोरदान  से रोटी निकाली, साथ लाये डिब्बे से चटनी और  छोटे छोटे कौर बना मेरे मुह में डालने  लगीं. सच ! मेरे मुह से खाते ही दुआ निकली, "अल्लाह आपको हर दौलत से नवाज़े भाभी बेगम!:" उनके हाथ की चटनी, गोयाँ जन्नत की कोइ अज़ीम ने'मत!  "कूँ खाँ! बीमार पड़ के आ जाती हो हमाय पास! " इतने में ही हाथों में गुलाबजामुनो का कुल्ल्हड़ थाम  नत्थे भाई चले आये. भाभी ने फ़ौरन सर ढांक हल्का सा घूँघट ले लिया, गोया नत्थे भाई कोई सड़क के आदमी हो. " ये क्या भाभी बेगम! आपको ब्याहे अब सात सालों से ऊपर होने आये! तीन गोल मटोल बच्चों की अम्मी हो गयीं आप! और आज भी नयी ब्याही दुल्हनों सी शर्माती हैं" मैंने  बुरा मुंह बनाया. "तो बीवी! शर्माए ना तो क्या करे! मियाँ हैं हम उनके! तुम तो गुडिया ! कुछ क़ायदा नहीं जानतीं! अल्लाह जाने तुम्हारा मियां कैसे निभाएगा !!!"  'हे हे!  मैंने दांत निकाले, इसीलिये तो इत्ती आसानी से नहीं मिल रहा!!!  क्या हर कोई मियाँ हमारा जोड़ीदार हो सकता है!" हमने भी नत्थे भाई पर दाँव फेंका. "बस तो कीजिये आप! खामख्वाहं बच्ची को..." भाभी बेगम पानी लाने के बहाने अन्दर चली गयीं.

"और खाँ! क्या चल्ला है आजकल!"  नत्थे भाई ने ज़ोर से मेरे हाथ पे हाथ मारा, मेरा वही हाथ जो दो साल पहले उतर गया था, साल भर पहले फ्रेक्चर हुआ था और अब जिसमे सलाइन लग लग कर शदीद तकलीफ होने लगी थी. " अल्लाह नत्थे भाई! कुछ तो लिहाज़  कीजिये!!! " मै आदतन चीख उट्ठी. वाकई मुझमे सब्र का माद्दा बिलकुल नहीं था और दर्द बर्दाश्त करने का तो बिलकुल भी नहीं. मैंने पास पड़ा तकिया उठा उन्हें दे मारा और बड़े तमीज़ से फोर्मेलिटी  निभाई, "आप कैसे हैं."  तकिया नत्थे भाई को न लगते हुए बावर्ची खाने से पानी लाती हुई भाभी बेगम पे. मैंने झट करवट ली और रज़ाई ढांक ऐसे पड़ गयी गोयाँ कोई मुर्दा हूँ और नत्थे भाई! कानो में अंगुलियाँ दे भीगी बिल्ली बन अपनी उस दुल्हन के सामने घुटनों पर बैठ गए अभी अभी ही जिनकी शर्म के वह कसीदे पढ़ रहे थे. " हाँ! तुम्हारे अब्बू की ज़रखरीद हूँ न!  मार लो, तकिये क्या फतरें (पत्थर) मार लो!"  भाभी बेगम ने घूँघट नीचे कर शर्म का इज़हार किया और आवाज़ ऊंची कर नाराजगी का. "अरे हो तो उसी आदम की औलाद न! महज़ जिनके शौक़ की खातिर ही अल्लाह ने औरत बनायी थी! " वह मियाँ से लड़ने पे आतीं तो अक्सर शुरुआत आदम अलस्सलाम से किया करतीं थीं. " हाँ! और तुम! बदज़ात कौम ! अरे औरत की वजह से ही आदम जन्नत से निकाले गए और काबील ने हाबील का क़त्ल किया!" भाई जान ने भी निहायत मुहज्ज़ब अंदाज़ में जड़ा. "क्या कर रहें हैं आप लोग!" मैंने  मासूमियत से लिहाफ से गर्दन निकाली. जवाबन उन्होंने मुझे ऐसे घूरा जैसे झगडे की ज़िम्मेदार मै हूँ. "अब तुमसे का कहें गुडिया! ये आदमी ऐसे ही हमाई जान खाता है!!" भाभी बेगम की आँखों में एक भी आंसूं नहीं था अल्लाह जाने वह क्या पोंछते पोंछते बोली. "तुम का कहो! हमैयी कहें, हम कुछ करलें ये औरत खुश नहीं रह पाती, "अरे! तो आप डॉक्टर थालिया से मिले, ये देखिये इसमें लिखा है अगर बीबी खुश नहीं है तो आप मिलें." साइड टेबल  से अखबार उठा निहायत भोलेपन से मैंने उनकी तरफ बढाया. "चुपो कम्बख़त! वैसी वाली बात नहीं."  अपने तीन तीन बच्चों का ख़याल कर भाभी बेगम ने अपना घूँघट और नीचे सरका लिया. 'अरे मुग़ल बच्ची होकर इस आदमी को सहन कर रई हूँ, कित्तेयी साल हो गए हैं!' भाभी ने अपने बर्दाश्त का ज़िक्र किया.  ' अई हई! देखना जरा, ये बर्दाश कर्र्यीं हैं, अरे! सय्यदों का सबर (सब्र)  ले रई हो! देखना एक दिन टूटेगा, मुझ भोलेभाले का सबर  तुम पर!'  नत्थे भाई अच्छी अच्छी लडाका औरतों पे भारी थे. 'हाँ! हाँ! कल्लो खूब लड़ाई कल्लो! ज़न्खों जैसे हाथ नचा नचा के हमसे खूब लड़ाई कल्लो!' भाभी ने फिर घूँघट सरका अपने भले घर की होने का सबूत दिया और मुंह से फ़िज़ूल की सिसकियाँ निकालने लगीं.  'अरे! ज़न्खा होगा तुम्हारा बाप!  ये तीन तीन बच्चे क्या मैके से लायीं थीं.  "मेरे बाप को अनाप शनाप कहा" भाभी मुझ लिहाफ में पडी से लिपट हिल हिल के रोने लगीं. "अरे! पहलवान थे वो! अच्छे मियाँ पहलवान! " अभी होते ना तो ऐसा धोबी पाट देते कि मिया ज़िन्दगी भर याद रखते!" भाभी को उनके वालिद मरहूम की बेपनाह याद आने लगी थी.और मै! उनका वज़न अपने टूटे हाथ पे बर्दाश्त कर हिसाब लगा रही थी, वाकई, इनके अब्बू पहलवान थे.

'अल्लाह!' मैंने दिल ही दिल में दुआ माँगी, 'ये किसी तरह काबू आ जाएँ' कि अचानक नत्थे भाई का मोबाइल बजा और नत्थे भाई भुन भुन करते ड्योढी पार कर गए और भाभी बेगम मेरे पलंग के सरहाने बैठ, गुलाबजम्नो का कुल्ल्हड़ साफ़ करने में मसरूफ. "बड़ा ज़ुलुम हुआ आपके साथ तो भाभी बेगम!" मुझे बिस्तर पर पड़े पड़े फिर शरारत सूझी. "अरे ! देखियो तुम! ऐसा मज़ा चखाउंगी कि ये तो ये, मेहल्ले  का कोई मर्द अपने औरत से ना लडेगा! " अल्लाह! मेरा दिल धडका. करने क्या जा रहीं हैं आप!" मुझे लगा, पता नहीं क्या होने वाला है. "इनोको बिस्तरे से ही अलग कर दूंगी!, तुम भी बीबी! याद रखियो, एसई करना मियां ज़ादा लडूं लडूं करे तो!" उन्होंने मेरा नोलेज दुरुस्त किया. " अल्लाह!" मैंने धडकते दिल से दरवाज़े की तरफ देखा, शुक्र है अम्मा घर में नहीं थीं. वर्ना मुझे वह धप पड़ते कि नानी दादी याद आ जाती. मै अब उनके और नज़दीक खिसक  आयी, "एक बात कहूं!"  भाभी बेगम कुछ कहने के पहले ही लाल गुलाबी हो गयीं, बेहद लजाती सी बोलीं  "चुप रहो बिन्नो!  तुम्हारा नालिज खुद ब खुद दुरुस्त हो जायेगा. " अल्लाह! ये शादीशुदा औरतें भी ना!  न मालूम कहाँ तक की सोंच लेती हैं. असल में मै जो कहने जा रही थी वह नत्थे भाई का बेहद एम्बीगुअस सवाल था, जो वो एक दफे तन्हाई में दादी अम्मी से पूछ रहे थे, "आप ही बताइये, कान में अंगुली डालें तो किसको मज़े आने हैं, अंगुली को कि कान को! " जवाब में दादी अम्मी ने पास पडी चप्पल उठा दे मारी, "ठेर जाओ! अभी तेरी कान और अंगुली निकाले देती हूँ! " मगर मुझे अपना तमाशा कतई मंज़ूर न था. मैंने सवाल मुल्तवी किया.

पांच बज गयी थी. मम्मा के स्कूल से आने का टाइम हो गया था. अब्बू अभी भी नहीं आये थे. "गुडिया ! चाय बना लूं, हम तो बिन्नो चाय बगैर गुज़र नहीं कर सकते. " मेरी भी बना लियो! बाहर बाइक रुकने की आवाज़ और नत्थे भाई के साथ मम्मा. " हम लिवा लाये मुमानी बेगम को."  नत्थे भाई देवडी में से चिल्लाये. " जे देखो! इमेज बिल्डिंग  तो कोइ इनसे सीखे!"  मम्मा के घर में दाखिल होते ही भाभी बेगम का घूँघट नीचे हो गया, हौले से शर्माते हुए उन्होंने मम्मा को सलाम किया और लजीली मुस्कराहट से नत्थे भाई को देखा. मम्मा निहाल हो गयी, "नत्थे! पूरी दुनिया देखने को बैठी थी कि मै तेरा  ब्याह कहाँ करूंगी. तेरी बीबी की शक्ल में अल्लाह ने मेरी लाज रख ली! व' तो  इज्ज़ोमंतोशाओ, व' तो ज़िल्लो मन्तोषा!"  (वह ही इज्ज़त और ज़िल्लत का देने वाला है) मम्मा ने आसमान की तरफ हाथ उठा भाभी बेगम को गले से लगा लिया. "  नत्थे भाई यों मुस्कुराये मानों बड़े खुश हों. भाभी ने जल्दी जल्दी खाना बनाया और मम्मा ने साड़ी चेंज कर असर की नमाज़ अदा की, "तुमने पढी! " मम्मा ने नत्थे भाई को घूर के देखा. "बस! अबी पडल्ल्ये हैं न!" नत्थे भाई सकपकाए,और भाभी बेगम हंस पडी, "खूब खिखिया रही हो, हम कहें तुमने कित्ती पढीं!" नत्थे भाई ने मम्मा का ध्यान भाभी बेगम पर डाला, जवाब में भाभी बेगम ने ऐसी निगाहें नीचीं की गोया नत्थे भाई के सामने उनके गले से लफ्ज़ ही न निकलते हों! , नत्थे कित्ता ख्याल है उसे तेरी इज्ज़त का, और एक तुम हो जाहिलों जैसे बेगम से लड़ रहे हो!" मम्मा ने जुमला जड़ा. मै मुस्कुरा कर रह गयी, सुबह से उनकी इज्ज़त का फालूदा बनते जो देख रही थी.

 सुनो! तुम दोनों हो ना, गुडिया के पास!  मै और तुम्हारे अब्बू जरा घूम आयें ममा ने चाय का कप ठीक आँगन की सीडियों पर रखते हुए कहा. " ममा! आप मत जाइए! " मैंने ममा का पल्ला थामते हुए कहा. सुबह से इन दोनों मियाँ -बीवी  का कतई गैर रोमांटिक ड्रामा देख मै सख्त बोर हो गयी थी, डर था कहीं शादी का इरादा मुल्तवी ना कर बैठूं. कुत्ते बिल्लियों की तरह इन्हें लड़ता देख कौन कहेगा कि इन दोनों की मोहब्बत वाली शादी थी. (जो ममा ने बड़ी महनत से सेटल करवाई थी.)  " बेटी! मेहता अंकल अस्पताल से आ गएँ हाँ, अभी देख कर आतें हैं." ममा ने अपनी मजबूरी बतायी और बाहर. नत्थे भाई दुछत्ती से टहल नीचे आये ही थे कि वह लगी कप को लात और वह गया कप भाभी बेगम के पाले में, दो टूक!!!  "अल्लाह! आँखें कहीं गिरवी रख आये क्या! शाम पड़े कप टूटना अपशकुन होता है !" "हाँ! तुम कभी भी कुछ भी करो, सब शगुन और हम!!" " तोड़ो! कौनसे हमारे दहेज़ के हैं! " चुप रहना जानती कहाँ थी भाभी बेगम. "अरे ! तुम्हारे वह कंजूस भाइयों ने चूहे की टांग तक तो दी नहीं , कप क्या देंगे! नत्थे भाई ने जड़ा. "क्या! मिया! हद में ही रहना अपनी, अरे! एक इशारे पे' घर भर देंगे, एक नहीं पूरे ग्यारह हैं, शब्बन, लल्लन, लड्डन, अच्छन, छप्पन, सत्तावन समेत पूरे ग्यारह नाम गिनवाए भाभी बेगम ने.  अरे जाओ जाओ! कहते हुए नत्थे भाई ने आदतन हाथ पैर नचाये, कि क्या देखती हूँ! पन्हरी पर रक्खा एलोवेरा का गमला झट नीचे नत्थे भाई के पैर पे. या अल्लाह! भाभी बेगम सब छोड़ भागीं, डिटाल कहाँ है, कपास कहाँ है, कैंची लाओ, गोज् पीस लाओ!  अल्लाह  मियाँ! आग लगे मेरी ज़ुबान को! किसी की जान लेके कटेगी ये! पानी पिलवा दो, अल्लाह! ज़्यादा लग गयी जी! ऐ अल्लाह! इनके कुछ न हो, बदले में तू मुझ पूरी को उठा ले. आँखों से ज़ार ज़ार आंसू बह रहे थे, स्यापे और मातम का आलम ये था कि लगी नत्थे भाई को थी और वही भाभी  बेगम का सर थाम  उन्हें चुप करा रहे थे, "आराम से मेरी जान! कुछ नई होगा!!! घबराओ मत! सब सही हो जाएगा!!" नत्थे भाई को सम्भाल बेडरूम में रख आयीं भाभी. दूध, दही, दावा दारू, खाना पानी सब का सब इस मोहब्बत से बेडरूम में जा रहा था . मुझे लगा कि हल, मन, स्किनर, हर्लाक, वुन्ट और कोईं भी बड़े से बड़ा सायकोलोजिस्ट भी भाभी के  नेचर पर कोई नतीजा नहीं निकाल सकता था. किस मोहब्बत और अपनाइयत से भिडीं थीं भाभी बेगम!

 मैंने ज़रा झंका, नत्थे भाई के पैरों की मालिश करते करते ऐसी मीठी मुस्कराहट थी भाभी बेगम के चेहरे पर कि लिल्लाह! कोई भी शायर रीझ जाए! मैंने सुना, बड़ी तहज़ीब से शर्माती शर्माती कह रहीं थी भाभी बेगम! नायटी उईटी तो लाये नहीं हम! ओह्ह! मुझे बेसाख्ता उनकी बिस्तरे वाली क़सम याद आ गयी. मै खिलखिला  पडी और ज़ोर से आवाज़ लगा उन्हें आगाह किया:  "भाभी बेगम! दरवाज़ा भिड़ा लीजिये ,प्यार अंधा होता है पड़ोसी नहीं.               

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012


कितना सहल जाना था
खुशबुओं को छू लेना
कितना सहल जाना था
बारिशों के मौसम में शाम का हर एक मंज़र
घर में क़ैद कर लेना
कितना सहल जाना था
जुगनुओं की बातों से फूल जैसे आँगन में
 रोशनी सी कर लेना
कितना सहल जाना था
उसकी याद का चेहरा
ख्वाब्नाक आँखों की
झील के जज़ीरों पर देर तक सजा लेना 
कितना सहल जाना था
ऐ नज़र की खुशफहमी!
इस  तरह नहीं होता
तितलियाँ पकड़ने को दूर  जाना पड़ता है .
                                                      -  हुमा शफीक हैदर

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012



यादों का एक झोंका आया, हमसे मिलने बरसों  बाद 
पहले इतना रोये नहीं  थे,  जितना रोये बरसों  बाद
 
लम्हा लम्हा घर उजड़ा  है , मुश्किल से अहसास हुआ 
पत्थर आये बरसों पहले, शीशे  टूटे  बरसों बाद       

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

असद उल्लाह खाँ ग़ालिब

 


कब से हूँ क्या बताऊँ, जहान-ए -ख़राब में
शब्ब्ये  हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में

ता'  फिर ना इंतज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गए, आये जो ख्वाब में

क़ासिद के आते आते ख़त एक और लिख रखूँ
मै जानता हूँ जो वो लिक्खेंगे जवाब में

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था, दौर ए जाम
साकी ने कुछ मिला ना दिया हो शराब में....
                                                       - ग़ालिब

सोमवार, 30 जुलाई 2012



खुली आँखों में सपना झांकता है
वो सोया है कि कुछ कुछ जागता है

तेरी चाहत के भीगे जंगलों में
मेरा मन मोर बन कर नाचता है

मुझे हर कैफियत में क्यों ना समझे
वो मेरे सब हवाले जानता है

मै उसकी दस्तरस में हूँ मगर वह
मुझे मेरी रज़ा से मांगता है

किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल
बहाने से मुझे भी टालता है

सड़क को छोड़ कर चलना पडेगा
कि मेरे घर का कच्चा रास्ता है.
                                                     - परवीन शाकिर

रविवार, 22 जुलाई 2012

चाँद मुबारक- परवीन शाकिर की क़लम से


पूरा दुःख और आधा चाँद
हिज्र की शब् और ऐसा चाँद

दिन में वहशत बहल गयी थी
रात हुई और निकला चाँद

यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तन्हां चाँद

मेरी करवट पर जाग उट्ठे
नींद का कितना कच्चा चाँद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हाँ होगा चाँद

आंसू रोके, नूर नहाये
दिल दरिया तन सहरा चाँद

जब पानी मे चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चाँद

बरगद की एक शाख हठा कर
जाने किसको झाँका चाँद

रात के शानों पर सर रक्खे
देख रहा है सपना चाँद

हाथ हिला कर रुखसत होगा
उसकी सूरत हिज्र का चाँद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क में सच्चा चाँद

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद

बुधवार, 18 जुलाई 2012

एक मंज़र



उफक के दरीचों से किरणों ने झाँका
फ़ज़ा तन गयी रास्ते मुस्कुराए

सिमटने लगी नर्म कोहरे की चादर
जवाँ शाखसारों ने घूँघट उठाये

परिंदों की आवाज़ से खेत चौंके
पुर  असरार  लय  में रहट गुनगुनाये

हंसी शबनम आलूद  पगडंडियों से
लिपटने लगे सब्ज़ पेड़ों के साए

वो दूर टीले पे आँचल सा झलका
तसव्वुर में लाखों दिए झिलमिलाये


                                                      - साहिर लुधियानवी

रविवार, 15 जुलाई 2012

उसने फूल भेजें हैं.......

An ill girl on a bed under cover Stock Photo - 3631971 


उसने फूल भेजें हैं....
उसने फूल भेजें हैं
फिर मेरी अयादत को

एक एक पत्ती में
उन लबों की नरमी है
उन जमील हाथों की
खुश गवार हिद्दत है
उन लतीफ़ साँसों की
दिलनवाज़ खुशबू है

दिल में फूल खिलतें हैं
रूह  में चरागाँ है
ज़िंदगी मोअत्तर है

फिर भी दिल ये कहता है
बात कुछ बना लेना
वक़्त के खजाने से
एक पल चुरा लेना
काश! वो खुद आ जाता
                                   -परवीन शाकिर 

सोमवार, 9 जुलाई 2012

तेरा मेरा नाम


तेरा मेरा नाम खबर में रहता था
दिन बीते एक सौदा सर में रहता था

मेरा रास्ता तकता था एक चाँद कहीं
मै सूरज के साथ सफ़र में रहता था.

सारे मंज़र गोरे गोरे लगते थे
जाने किसका रूप नज़र में रहता था

मैंने अक्सर आँखें मूंदे देखा है
एक मंज़र जो पस मंज़र  में रहता था

काठ की कश्ती पीठ थपकती रहती थी
दरियाओं का पाँव भंवर में रहता था

उजली  उजली तस्वीरें सी बनती हैं
सुनते हैं अल्लाह बशर में रहता था.

                                  -राहत इन्दौरी, कलामे ए राहत "नाराज़" से.

शनिवार, 7 जुलाई 2012

"बड़े अच्छे लगतें हैं.......!"

अल्लाह ख़ैर! "मारिया अब्बास वेड्स अज़हर वारसी" हाँ! था तो शादी कार्ड ही. मै ख़्वाब भी नहीं देख रही थी  और लिखा भी बिलकुल यही था. मेरे लब खुले के खुले रह गए और ज़हन भागते हिरन सा माज़ी में चला गया.  उसके बचपन की आवाज़ गूँज उठी " अप्पी! आप चा (क्या)  कल्लई हो! चा पतंग उला लही हो?" या उसे छेड़ देने पर, उसका गुस्से में कहना," एक लात पलेगी तो मल जाओगे!"   

ददिहाल की मै आख़िरी विकेट थी, और ननिहाल की सेकिंड लास्ट. मारिया सबसे बड़ी ख़ाला, जिन्हें हम ख़ाला अम्मा कहते थे की नातिन. उम्र में मुझसे आठ नौ साल छोटी, लिहाजा उसका बचपन मुझे कुछ ऐसे हिफ्ज़ था जैसे हिस्ट्री के लेसन. मारिया उसके खानदान की सबसे बड़ी बेटी और उससे छोटा उसका चचाज़ाद उर्फी. पहली दफे मारिया के ददिहाल गयी तो ( वह छः एक बरस की और मै चौदह पंद्रह की)  मारिया हाथ में "चम्पक"  लिए उर्फ़ी से बतिया रही थी,  "भैया! आओ हम आपको एक कहानी पढ़ कर सुनाये- चुत्रू मुत्रू की कहानी." चुत्रू मुत्रू! ये कौनसा लफ्ज़ है? मेरे ज़हन ने मुझसे ही सवाल किया. मुझसे रहा न गया मै उठ कर गयी, और चम्पक में देखा, वह थी 'चुन्नू मुन्नू की कहानी' . लिखने का अंदाज़ कुछ ऐसा  था कि बच्चे उसे चुत्रू -मुत्रू ही पढने पर आमादा थे. बहुत समझाने पर भी नहीं मानी वह. चुत्रू मुत्रू ही चलता रहा, और हमसब बड़े "चुत्रू मुत्रू की कहानी" का  लुत्फ़ लेते रहे.  खूसूरत, जिद्दी, गोल मटोल गुडिया सी मारिया.उसने मुझे कभी ख़ाला नहीं कहा बस अप्पी ही कहती थी..
 
                      मेरे आते ही बैग बंद, बातें चालू. मुझे भी लाड दुलार करने और रोब गांठने को वही एक थी, मेरी प्यारी मारिया.
 
 बच्चों को कुरआन पढ़ाने वाली आपा आतीं उन्हें पढ़ातीं तो क्या! बिना समझाए अरबी भाषा रटातीं और चली जातीं. दालान में तख़्त पर हिल हिल कर क़ुरान रटती मारिया और तीखे तेवरों वाली उस्तानी बी. तेज़ छडी की तड तड पड़ती मार और बेहद खुराफाती मारिया! "चलो पढो ! अइया का न'बुदू, व अइया का नस्त'इन (ऐ रब! हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझसे ही मदद मांगते हैं). "आईं! ये अइया क्या होता है! शायद उस्तानी बी भूल गयीं हों! मै खुद सही कर लेती हूँ" , उसके नन्हे ज़हन ने सोंचा और उसने पढ़ा, "भैया का न'बुदू, व भैया का...." साथ ही भाई पढ़ रहा था, उसे लगा शायद अरबी में उसे कुछ कहा जा रहा है. यह कह रही है तो ज़रूर कोई संगीन मामला है, अभी सही करता हूँ!!!  "लो बीबी! हमारा कायका न'बुदू!! तुमारैयी होगा, मारिअका न'बुदू.... " अब हो गयी जंग शुरू, इसने उसे मारा, उसने इसे नोचा, धींगा, मुश्ती, मार कुटाई.  हम सब लोगों का हंस हंस के बुरा हाल. दादी अम्मी ने उस दिन , दिन भर इन्हें धूप में खड़े रखने का फतवा जारी किया, उस्तानी से माफ़ी मंगवाई और अल्लाह से भी माफी मंगवाई, कुरआन के लफ़्ज़ों की बेहुरमती पर.

छुट्टियों में मारिया हमारे हाँ आती तो बस, अब्बू की तो उड़ के ही लग जाती! पता नहीं क्या क्या उगनी- तुगनी सिखाया करते मारिया को! मसलन " बेटे घर में कोई मेहमान आये तो कहो, "आओ थको!" , और जाए तो कहो: "टाटा टलो !" " और मारिया अगर उसे मेहमानों पर एप्लाई कर देती तो अम्मी अब्बू की वह जंग छिड़ती की इतिहास की सारी जंगें शर्मा जाएँ!!
और जब वह स्कूल में दाखिल हुई तब!स्कूल का नाम था "अरिहंत पब्लिक स्कूल"  बिलकुल शाकाहारी स्कूल. मैडम ने बच्चों को सवाल दिया: "राईट द नेम ऑफ़ थ्री थिंग्स यू ईट?" पहला दिन, लिहाज़ा बच्ची समझी नहीं, उसने मेडम से पूछा " इसमें क्या लिखना है?"
                                                 - "आप जो खातीं हैं, उसका नाम लिख दीजिये"  मेडम ने समझाया!
                                                 "मच्छी (मछली) , गोस (गोश्त) , मुलगा( मुर्गा)  उसने लिखा.
                                                 -"आप ये सब खा लेतीं हैं! मेडम का मुह  हैरत से खुला ही था कि उसने चट से जड़ा: "न! मै तो बछ बोती -बोती (बोटी बोटी) खाती हूँ!"



मै मुस्कुरा उठी.हाथ में पकडे शादी कार्ड को भाभी बेगम को थमाया, "लीजिये! मारिया के निकाह का दावतनामा! "
                            - "अरे निकाह तो होना ही था, गादी वाली कोठली के क़िस्से के बाद! " भाभी ने तंज़ किया.
                                 - क्या किस्सा!!! मै हैरत से बुत बन गयी.
" बेगम! हम ही नहीं सारा खानदान कह रहा है, वरना वह लन्दन पलट, एक से एक लडकियां रिजेक्ट करता फिर रहा, उम्र में उससे दस साल बड़ा!!! उसे इस मुटल्ली में क्या ख़ूबी नज़र आयी होगी भला!!!" भाभी ने मुझे लताड़ा.
-  "ये खानदान है या देवकी नंदन खत्री का  नोवेल! अरे! क्या होगा भला उस मुई कोठरी में !  मैंने भाभी को सुनाया.
-"बीबी! बिना गादी के भी बहुत कुछ हो जाता है, तो फिर उस कोठरी में तो गादियाँ  रक्खी हुई थीं, तुम ही सोच लो! क्या हुआ होगा. " भाभी ने हाथ नचाये.
मै बुरी तरह उबल कर रह गयी. पूरा खानदान गादी वाली कोठरी के काण्ड को रो रहा था. सब दूर बातें बनायी जा रहीं थी, मुझसे रहा न गया, मैंने फोन घुमाया: " मारिया! अप्पी बोल रही हूँ!तुझे मेरी जान की कसम! तेरे मुगलों, पठानों के खून  का वास्ता! बता मुझे , उस दिन गादी वाली कोठली में क्या हुआ था!"
"अप्पी! " उसकी आवाज़ से मेरा दिल धडका! अप्पी, जब इनकी अम्मी हमें देखने आयीं न! तो उन्ने अम्मी से कहा 'ऐ भेन! अल्लाह ने भी इत्ता हक तो दिया है , लड़के की लडकी से बात करा दो!" हम गादी वाली कोठली में बैठे, आपको तो पता है, संदूक पर जमी तमाम गादीयों  पर हम एक झटके में उचक के चढ़ जाते हैं, बस! वईं पे बैठे  थे. ये बात करने आये, हमने कहा 'यईं पे बैठ जाइए!' जब ये बैठे तो क्या कहें! सारे गद्दे रजाइयां फिसल कर नीचे, एक तरफ ये पड़े एक तरफ हम. 'सुनो! हमें कुछ बात करनी है', ये कपडे झाड़ते बोले, " कुछ नई सुनना हमें! जब चढ़ना नयी आता था, तो क्यों चढ़े, हमें उतरा लिया होता!!!"  हमने बी इनकी फ़िलुम खेंची! "अब पहले गादी जमवाओ, फिर सुनेंगे तुम्हारी बातें!"  लिहाज़ा वे गादियाँ  जमवाने लगे, और आख़िरी गादि पे बोले 'सुनो! किसी से कहना मत गादी वाली कोठली में क्या हुआ था' अगले दिन इनकी अम्मी ने रस्म करदी! अप्पी! हमें दिखे! ये बिचारे डर के मारे मुस्से शादी कर रहें हैं कहीं मै इनका राज़ न खोल दूं कि लन्दन पलट लड़का गादियों पे चढ़ना भी नहीं जानता!!! " 
अल्लाह! मैंने माथा पीट लिया, अट्ठारह साल एक माह की दुल्हिन! मेकअप से  पाक चेहरा, शैतान मगर हद दर्जे की मासूम!! गोल मटोल साफ़ ज़हन और साफ़ दिल की शफ्फाफ लडकी. इतना हुस्न किसी को भी पागल बना दे, फिर  अज़हर तो इंसान है! मुझे भाभी बेगम पर शदीद गुस्सा आया.
मैंने सुना, रेडियो पर गाना आ रहा था : "बड़े अच्छे लगतें  हैं, ये धरती, ये नदिया, ये रैना और तुम....."          

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

सावन की इस सुबह



सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

आँगन में पौधों पर

फूलों पर, पत्तों पर
बरसाती खुशबू से
मुझ पर ही क्यों छाये

खिड़की की चौखट पर

मौसम की आहट से
बरसाती झोंकों में
पगलाए वंशीवट से
यमुना के तीरे तीरे
श्याम सलोने नटखट से
राधा की पायल से गुंजित
वृन्दावन के पनघट से
स्मृति की नदिया में
अश्रुपूरित नीरव तट से
कालिदास के मेघ सलौने
बोलो! मुझको क्यों भाये 

सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

                               

बुधवार, 4 जुलाई 2012

"उफ़! ये लडकियां!!!"

              

सावन आये दो दिन गुज़र गए हैं. भरे सावन में मरे टाईफाइड की मार झेल रही मै जलकुढ़ कर बेकार ही कोयला हो रही थी कि अब्बू का फोन आया, "नईम भाई आ रहें हैं, गाडी भेज दी है, तुम आ जाओ." मै जानती थी, अब्बू को मेरी नहीं, प्याज़ और अजवाइन के पकौड़ों की याद आ रही थी, अपनी सूनी अमराई में मल्हार की तानों की याद आ रही थी, और याद आ रही थी, छत पर सावन की झड़ियों में चाय के कप थामे गप्पेबाज़ी करने की. सच्ची! अब मुझे लगता है, मम्मा सही कहतीं हैं, "हरकतों में तो पूरी अपने बाप पर पडी हो तुम!" मै भी कौन यहाँ बड़ी खुश हूँ! फ़ौरन बैग में दो एक केप्री, एक दो टी-शर्ट ठूँसे, घर के लोअर- टी शर्ट पर ही अपने पहनावे को थोडा तहज़ीब वाला बनाने को बुर्का डाला,खास खास दोस्तों को अपने ना होने की इत्तेला दी और तैयार. नईम भाई बड़े अच्छे ड्राइवर हैं, पूरे रास्ते उनसे बतियाने में, गाँव और मोहल्ले भर की ख़बरें लेने में रास्ता कैसे कट गया मालूम ही नहीं चला.

                मौसम सुहाना, घर की छत, गुलमोहरों के मंज़र, लिपीपुती ज़मीन से उठती सौंधी सौंधी महक, और मज़े की बात! मामा स्कूल गयी हुई थी." आज तो उड़ के लगी है हम बाप बेटी की!" अब्बू हमेशा की तरह मुस्कुराए, और मुझसे बैग लेकर निगाहों ही निगाहों में बोले, मै भी मुस्कुराई गोयाँ कह रही हूँ, "अभी हाथ मुह धोकर आती हूँ  फिर करते हैं धमाल." सामान रक्खा ही था कि देहलीज़ पर से "सर! कहाँ हो!!! भाभी जी कह गयीं थी दूध लेने का, ये लेओ लेलिये हम!!!" की जानी पहचानी आवाज़ करती सावित्री चाची. "का हो चौखट पर खडामे (चप्पल)  किसकी धरी है! " उन्होंने टीवी लाउंज में झाँका."मै आयी हूँ चाची! " मै भाग कर उनके गले लग गयी. "ई लेओ! दौनों बिटिया आ गयीं!  अरी! मोना भी आयी है ससुराल से, बिब्बो, नीतू, छोटी, चरखी, रिहाना, सबैयी हैं बिटिया!  मिर्ची के डंठल तोड़ते तोड़ते, फुलवारी सुधारते , अंगनाई  लीपते खूब संगत होगी ढोलक पे! हमरी कोयल जो आ गयी है!!" चाची ने गोयाँ अगले कामो की लिस्ट ही थमा दी,  क्या क्या करना है, किस किस से मिलना है, कौन कौन आया है ससुराल से, और गाना तो गाना ही है, बहाना नहीं चलेगा!!!. ये अमीर खुसरो ज़रूर हमारे ही गाँव के रहे होंगे, "आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा" मेरे ज़हन में बरबस ही खुसरो का कलाम गूंजा!!!

                 "अब्बू! चक्कर से आ रहे हैं थोड़े" वाकई कमजोरी की वजह से मुझे चक्कर आ रहे थे, मैंने कमरे में आकर फिर आँख लगाने की कोशिश की ही थी कि बहुत सारी पायलें बहुत सारी चूड़ियाँ  और बहुत सारी आहटें, एकदम से मेरे सर पे. अरे!!!! छम्मी, छोटी, चरखी, नीतू, रेहाना, पायल, मिन्नू सब की सब मेरे सर पे सवार! क्या क्विक सर्विस है चाची की भी! " क्यों री!!! अकेली छुपी बैठी है, मरी सोंच रही थी, हमें नहीं मालूम चलेगा! " "अरे दोगली भूल गयी ना हमें!" " अरी! पांचे-गट्टे, हंडे कुलिये, गुड्डे गुडिया , संजा गरबे सब भुला दिए ना!!!" मै कुछ कहूं उसके पहले ही, लानत-मलामत, आंसू और इल्ज़ामों की बौछार सी होने लगी.  "हाई दैया!!! ताप है इसे तो" चरखी ने मेरा हाथ थामा. मुझे बेसाख्ता मुनव्वर राणा याद आने लगे: "तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कान्धा नहीं देते!/ हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं..." लगता है एक फेरा लिया होगा इस गाँव का उन्होंने!!! अल्लाह! मरियों!!! मुझे टाईफाइड हो गया है तुम  सब की सब भी ना!!! हम सब की सब सतबहिनियों  जैसी एक दूसरे में उलझ पडीं कि एकदम से मिन्नू को सूझी, "क्योँ री!!! अन्ग्रज्जी बुखार तो नहीं हुआ तुझे! (पिछली दफे उसकी शादी पर आयी थी तो उसे एड्स के बारे में समझाते हुए मैंने ही उसे एड्स का नया नाम बताया था.)  कहने की देर थी कि सब फिक्क से हंस पडी. नीतू मेरी इस बेईज्ज़ती को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी. "खबरदार! तोहका बाबा जी की कसम, जो हमरी बबुनी के ऐसन बोली" उसने ठेठ देसी अंदाज़ में मिन्नू को घुड़का. "लेओ देख लिओ अपने ही अखियन से! अरे गाँव भर में कित्ते जोड़ी चाचा जी-चाची जी, और कित्ते दर्जन चचा जान- चची जान हैं जिनका तोहार ब्याह से मतबल है!!!! , फिर कहे ना कर लिओ!" मै हंस दी , "हमें कौन्हूँ इनकार है,अरे हमें हेए कोई पसंद ना करे!" हमें भी नीतू की ज़ुबान सुन कलकत्ते के  कोल्हू टोले  से निकलने वाले अखबार उदन्तमार्तंड की ज़ुबान याद आ गयी. "अरे तो हम् सबैयी मर गयी का, या सांप सूंघ गया हमें! एक बार तो याद किया होता सखियों को !!" मीतू फट पडी. "ई लओ! अब तोह से ब्याह करेंगी हम! अरी! तोहका धनी इस सावन में हमरा राम नाम सत ही कर देगा." सब की सब खिलखिला कर हंस पडी. "सच्ची गुडिया! तू बिलकुल नहीं बदली, अब भी देसी इत्ती अच्छी बोल लेती है." " लो! जैसे तुम लोग बदल ही गयी हो!" अब्बू सबके लिए कुछ हल्का नाश्ता ले आये, "लो मेरी बीरबहुटियों! खिलखिलाती रहो" 'आपने क्यों ज़हमत की अब्बू जी! हम क्या कोई गैर हैं! ' सबका अब्बू से एक ही शिकवा था. सब की सब अब्बू की स्टूडेंट  थीं. मीतू (मिताली) डोक्टर थी, चरखी (रक्षा शर्मा) का अपना स्कूल था, मिन्नू (मीनाक्षी झा) वकील थी,  छम्मी (अज़रा एजाज़ ) जर्नलिस्ट थी, छोटी (सारा थोमस) नर्स थी, रेहाना सय्यद टीचर थी, और मै! टीचर, फ्री लांसर, ट्रांसलेटर, मार्केटिंग मैनेजर, लेक्चरार, और पता क्या क्या होकर फिर कुछ भी नहीं!  यानी, जॉब छोड़ कर घर की ज़िंदगी जीने वापिस घर आयी थी. मिन्नू के वकील साब ने ही उसे आज यहाँ तक पंहुचाया था, वरना उसकी शादी तक तो उसे एड्स के बारे में भी कुछ पता नहीं था. हम सबने उसकी खूब खिचाई की थी, इसी से आज वह बदला निकाल रही थी. "अच्छा सखियों! शाम भी होगी, रात भी होगी, बात भी होगी, अब जाओ न! " मैंने जम्हाई ली, वाकई मुझे नींद आ रही थी,  "वाह गोईं, ऐसे कैसे, अरी अभी तो हमें कितनी बाते करनी हैं, ए गुडिया! तू बता न, कोई पसंद है तो धीरे से कान में कह दे, बिन्नो! अब तो कर डाल शादी."  " हाँ पसंद है! वो लंबा ऋतिक रोशन पसंद है, बोल करवा देगी मेरा उससे ब्याह, वो राहुल गांधी पसंद करता है मुझे, चल पढवा दे हमारा निकाह!  सलमान, मेरे नाम की ही तो आँहें भरता है, बता दे कब तारीख पक्की कर लूं!  और तो और अटल जी और कलाम साब भी ..... अरी बस कर !!! मोना ने मेरा मुह भींचा, "वाकई बेचारी थक गयी होगी अब चलो आराम करने दो उसे."

                       थकान से कब नींद लगी कब खुली हिसाब नहीं. आँख खुली तो मामा थर्मामीटर से मेरा टेम्प्रेचर ले अब्बू से कह रही थी, बुखार नहीं है अभी, आप थोड़े एपल ले आइये इसके लिए. हम माँ बेटी बतियाने को हुए ही थे कि मोना, छम्मी और छोटी फिर धमक पडीं. " सुन न! मेरे हाथों थोड़े भुने चने थमाती हुई बोली मोना, वह पिपलेश्वर मंदिर के पुजारी को माता रानी की सवारी आती है, चल न! वहाँ पूछ कर आयें तेरा ब्याह क्यों अड़ जाता है"  "तेरी मौत मेरे हाथों लिखी है लगता है ! तुझे पता है मुझ सख्त चिढ है ऐसी बातों से" मैंने उसे चने खाते खाते घुड़का. चल छम्मी! यह तो मानेगी नहीं, हम ही कुछ करते हैं, उसने चने वाला टीमटाम उठाया और चल निकली.

                  अगले दिन संडे था, मामा मेरी तबियत को लेकर फिक्रमंद थीं, और अब्बू मुझे रिलैक्स करने की कोशिश कर रहे थे. कोई नहीं आया था, सिवा दूधवाले, कचरे वाले, अखबार वाले और सब्जी वाले के, लिल्लाह! कितना सुकून है यहाँ की ज़िंदगी में. हम लोगों ने साथ मिलकर अब्बू  और मामा की ऑल टाइम फेवरेट मूवी "बूदरिंग हाईट्स " का लुत्फ़ उठाया. एक दिन खामोशी से निकल गया. और अगले दिन फिर वही सखियों की टोली, बातों की होली, हंसी ठिठौली." ":सुन! कर आयीं हम तेरा पक्का बंदोबस्त, तू तो चली नहीं! देख अगले सावन कैसी हरी भरी होकर आयेगी घर."  "कक्या! क्या कर आये तुम लोग!" मैंने हैरत से उन्हें तका. "जानती है, क्या बोली मातारानी! अरी पहले रिश्ते को ठुकराने के कारण ही हो रहा है ऐसा, सच्ची गुडिया! पहिला रिश्ता मंगल के घर से आता है  और तू! मंगल से दंगल कर बैठी!!!  "अरी कमबख्तों! जला दो अपने  डिग्रियां!!" मेरा गुस्सा अब सातवें आसमान पे था, " मै पूछती हूँ करके क्या आयी हो !"  "गुस्सा काहे करती हो, अरे तुम्हे याद है वह भूरे खाँ! हिस्ट्री के किसी राजा की नहीं, चाँद मियाँ चूड़ीवालों  के लड़के की बात कर रहें हैं हम!!!"  और बरबस ही मेरा गुस्सा हंसी में बदल मेरे लबों पे आ गया, बिलकुल गोरा-चिट्टा, कोई दस बरस का और मै सात एक   की, मेरा खासम खास  दोस्त. टायर चलाना, फिरकी घुमाना, चव्वे (कच्ची इमली) बिनना, और इक्की दुक्की अम्मा बहिन की गालियाँ, कित्ता कुछ सिखाया था उसने मुझे, "भूरे खाँ!  मेरे अच्छे भूरे ! मेरी पतंग बढ़ा दे, और बस पतंग  आसमान पे,  भूरे! तेरी सायकल का एक चक्कर लगाने दे न , और सायकल हाज़िर. चल वो गंदे पानी की कुल्फी खिला न, और कुल्फी गोयाँ खास मेरे लिए हाज़िर. पढाई में भूरे सिफ़र था और मेरा शाब्दिक ज्ञान शुरू से ही बेजोड़. एक दिन मुझे इम्प्रेस करने के चक्कर में टीवी से कोई फिल्म का डाईलोग याद कर उसने चिपकाया, "गुडिया सुन!" वह और मै अंगनाई  में बैठे बैठे इमलियाँ चुग रहे थे, "हूँ!" मैंने जवाबन उसकी तरफ देखा, "मेरे रक्त से मै तेरी मांग भर दूंगा!"  क्क्य!! मेरे ज़हन में इस मुहावरे का मतलब बड़ा साफ़ था, "कमीने, कम्बखत, तेरा नास जाए, निगोड मारे तुझे कुत्ते उठा ले जाएँ, तेरी अम्मा का फ़लाना, तेरे  अब्बा का ढमाका....मैंने पता नहीं कौन कौन सी गालियाँ इजात करलीं, चप्पल निकाली, उसे मार मार वो कुटाई की, कि बेचारा! पिटने के दौरान वह बार बार पूछ रहा था, "काहे मार रही हो, उहाँ टीवी मां तो खुस हुई थी वो!!" जवाब में मै मारने की रफ़्तार और तेज़ कर देती थी. जब मार मार कर थक गयी तो बुक्का फाड़ कर रोती हुई घर को गयी गोयाँ मैंने भूरे को नहीं भूरे ने मुझे मारा हो. दादी अम्मी के कोर्ट में मस'ला  पेश हुआ, दादी लकड़ी टेक भूरे के घर गयीं और भूरे के अब्बू ने उसकी तबियत से कुटाई की. मेरे बड़े भाई बहिनों ने अलबत्ता बड़ा लुत्फ़ उठाया इस वाक़िये का और वे सब के सब भूरे को कँवर सा'ब  कह कर पुकारने लगे. यह नाम इतना फेमस हुआ कि  पूरा गाँव ही उसे कवर सा'ब कहने लगा. "अरी  सुन"! मीतू की आवाज़ ने मुझे फिर माज़ी से हाल में ला पटका, "खूब सोंच समझ कर हमने आज, एक पुतला बनाया, उस पर लिखा " भूरे  की मोहब्बत" उसे विधी विधान से  फूँक आये शमशान में! अब देख इंशाल्ला, मातारानी की कृपा रही तो अगले सावन तू तेरे मियाँ के साथ आयेगी."
मेरा मुह खुला का खुला था, और मै सोच रही थी, "उफ़! ये लडकियां!!!"  

मंगलवार, 26 जून 2012

मेरी शादी....




"बीबी! अब तो हो लो अपने घर की,
कब तक अम्मा की छाती पे मूंग दलोगी!"

ताई अम्मा का जाना पहचाना फिकरा, और हम भी क्या कम गिरते हैं!  " अरे काहे ना दलें! हमारे अब्बू ने और जो मंगा दिए हैं!" किराने के सामान से हमने भी उन्हें मूंग की थैली दिखाते हुए ज़ुबान लड़ाई, मम्मा ने सलाम फेरा, जानमाज़ से उठीं और बड़ी बड़ी आँखों से हमें घूरते हुए, मूंग की थैली झपट बावर्ची खाने में आ गयीं. 'अरे बिट्टो! तुम्हारी अक्ल तो सास ही ठीक करेगी!' ताई अम्मा बड़बडाई. लो जी! अब हमारी सास के पीछे पड़ गयीं, शुक्र मनाओ के बड़ी अम्मी हो, ग़ैर होती ना तो हम देखते अबी! हमने भी दिल ही दिल में उन्हें धमकाया .अरे! ज़ोर से धमकाते तो मम्मा हमारा तिक्का बोटी कर देतीं.

सोचने वाली बात है, मीना गयी, रीना गयी सबकी शादी हो ली, गरज ये कि मोहल्ले की हर लम्बी-मोटी, ऐरी-गैरी सब निपट गयीं, अल्ला मियाँ! ये तू हमसे ही क्यों सारे इम्तेहान लेता है! अरे हम ही नहीं पूरे शहर, घर, मोहल्ला, खानदान, और इसका एक एक फर्द ज़ोर लगा रहा है, बिन्दु जी महाजन, अनजान बाजी, बिन्गारे अंकल, नन्हे मामू, मुन्नी आपा, शिबली भाई, संसार और हमसफ़र मैरिज ब्यूरो, हिदुस्तान मेट्रीमोनी, और समाजी रिश्ते सबने अपने अपने लेवल पे पूरा ज़ोर मार दिया है, और कहीं लोग ज़ात बिरादरी का बैर रक्खें पर हमारे केस में तो भारत की लोकतांत्रिक एकता का नमूना ऐसा दीख पड़ता है कि शर्मा , मेहरा, मिश्रा अंकल, सतनाम चचा, जूरानी आंटी सबने अपनी पूरी पूरी कोशिश करली है.  हालत ये है  कि काम वाली बाई के साथ बर्तन जमवाने खड़े हो जाओ तो वो भी एक दो रिश्ते बता देती है, फिर भी कबख्त हमारा नसीबा, टस से मस नहीं होता. सेहरे के फूल खिलने की दुआएं देते नाना मियाँ, दादी अम्मी, और नाना अब्बू सब अल्लाह को प्यारे हो गए, पर वह हमारा नौशा! अल्लाह जाने सेहरे में कौनसे बेशर्म के फूल लगा कर आने वाला है जो खिल ही नहीं रहे.

अब देखिये ना इन लड़के वालों को! अरे इनका लड़का काला होगा तो हमें आटे की सफ़ेद बोरी कह कर रिजेक्ट कर देंगे, इनका लड़का गोरा हुआ तो हमें कोयले की खान कह दिया जायेगा. इनका लड़का कम पढ़ा लिखा होगा तो हमारे क्वालिफिकेशन सुन कर कहेंगे कि " अल्लाह ! क्या सारे कुनबे के हिस्से का इन्होने ही पढ़ डाला! और लड़का भोंदू हुआ तो हमें कहा जायेगा, "बड़ी तेज़ तर्रार है.", इनका लड़का मरगिल्ला होगा तो हमें कहेंगे "मुटापे का ये आलम है कि चार पांच लड़के लगेंगे उससे शादी को!"  और इनका लड़का मुट्टा निकला तो आपको रिजेक्ट करने की वजह देखिये, " अई गोईं! कां माशाल्ला हमारा खाता पीता शाहिद! और कां वो तख्ता लडकी!. उन्हें आँख उठा कर देख लो, तो कहें कि "अल्लाह! आजकल की लड़कियों की आँखों में शर्म ही नहीं " और ना देखो तो, " अई भेन! (अरी बहिना!) हमें लगे भेन्गी है".

अब्बू बेचारे! कल ही शादी के धंधे  में नए नए उतरे मुन्ने मियाँ  अब्बू से बाते कर रहे थे, " कूँ खाँ! क्या हुआ बेटी का!" तमाखू मलते मलते अब्बू की दुखती रग पर आहिस्ते से हाथ धरा मुन्ने मियाँ ने!
"अरे कहाँ अभी! " अब्बू ने किसी हारे हुए जुआरी की तरह आसमान की तरफ देखा. "आप बी ना सा'ब! अव्वल तो लडकी को इत्ता पढ़ाना नी, और पढ़ाओ तो लोगों को बताना नी! अरे हम भेज रए हैं दो एक !! आप उनसे पढाई का तो ज़िक्र ही मत करियेगा, बाकी हम देख लेंगे,  अरे साब ऐसे हीरे लखीने हैं कि ज़िंदगी भर आप मुन्ने मियाँ को याद करेंगे हाँ! एक बखत लडकी ज़रूर दिखा देइय्ये हमें!  अब्बू ने इशारा किया "वो देखो, जो खेत में नए ट्रेक्टर का ट्रायल ले रही है ना, वही है मेरी बेटी!"  और हम! धम्म से कूदे ट्रेक्टर रोक, तो मुन्ने मियाँ सहम कर दो क़दम पीछे हो लिए. सलाम चचा! हमने एक सलाम ठोंका, " हे हे! ख़ासी अच्छी है मियाँ बेटी तो! चचा मुन्ने हिनहिनाये, तुम पोडर वोडर नई लगातीं बिटिया! कोईं आये तो ज़रा लगा लिया करो." जी चचा मियाँ! हमने भी स्टोल से सर ढांक लजाने की एक्टिंग की. "कुछ याद है आपको? " " जी बहुत कुछ "  मुन्ने मियाँ के मुंह से निकला नहीं कि हमने लफ्ज़ उचक लिए, "कार हम चला लें, बस हम चला लें, ट्रेक्टर का तो आप नमूना देख ही चुके हैं,  माशाल्ला से खासे पढ़ भी लियें हैं"  " अरे मेरा मतलब है सीना पिरोना!"  अब चचा मुन्ने ने पैंतरे बदले. "आप फ़िक्र मत करिए फटा सिला, रफू रंगाई, हम सब में माहिर हैं!  हमने निहायत भोलेपन से जवाब दिया."  चचा मुन्ने अब खुश दिखे, "अल्लाह ने हमें फ़रिश्ता  बना के भेजा है आपकी  बेटी के लिए! " "आयीं! कहीं ये चचा मुन्ने ने ही तो मुझे अपने चौथे निकाह के लिए सिलेक्ट नहीं कर लिया! " मैंने घबरा कर आँखों ही आँखों में उन्हें तौला, "हम्म! एक ठंडी सांस ली मैंने" , बहरहाल चचा मुन्ने ने अगले ही दिन एनाबाद वालों के यहाँ से जीप भर के लड़केवाले भेज दिए, हमें खबर नहीं,  हम उनकी जीपों की चिल्लपों सुनकर सोंच रहे थे, अल्लाह खैर ! कहाँ डाका पड़ गया.

नाश्ते सजाये गए, घर की सुथराई भी हो गयी, दालान की बेलों से मधुमक्खियों के छत्ते हठाये गए, और मेहमान भी आ गए. जीपें सय्यदवाड़ी के परले सिरे खड़ी करवा दी गयीं, वाह! एक जीप पे हमारा दिल भी आ गया. सब लोग मेहमानों की खातिर में लगे थे और हम छत से जीप देख रहे थे, इत्ते में भाईजान टपक पड़े, पके आम की तरह, "तुम यहाँ क्या कर रही हो? "  बेमौसम के सवाल.
"अरे! क्या कर रही हो का क्या मतलब है, हमारे लड़केवाले, और हमीं नई देखें! वाह मियाँ! " " हम्म! देख लो, मगर ज़रा जल्ली कल्लेना" भाई ने जवाब में कुछ ऐसे कहा कि लगा कि मै बाथरूम के दरवाज़े के 'इस' तरफ खड़ी हूँ और भाई,  'उस' तरफ. मेरी लार जीप को देख बेसाख्ता टपक रही थी, कि अल्लाह ने एक नन्हे को नाजिल कर दिया, छोटू! मैंने धीमे से आवाज़ दी. "हमें बुला लही हो? " जवाब में नन्हे ने सवाल दागा. "हमाला नाम छुम्मन है" निहायत नवाबी अंदाज़ में उसने जवाब दिया. "छुम्मन! मेरी जान! ये जीप किसकी है." मै मुंडेर से पूरी लटक गयी.  "फ़य्याज़ भाई की! उनके लिए ही तो दुल्हन भाभी ढूंढ़ने आये हैं हम! " ":अच्छा! पुचु पुचु मेरा बच्चा! जाओ जाकर फ़य्याज़  भाई से चाबी लेकर आओ, कहना दुल्हन भाभी मंगा रही हैं." "नहीं देंगे! किछी को नहीं देते!" उसने अपनी गोल गोल आँखों को और गोल करते हुए कहा, "अरे तो मियां! उड़ा लाओ, घूमना है कि नहीं! " कहते हुए मैंने उप्पर से एक चोकलेट फेंकी . अल्लेवा! हमें भी ले चलोगी; उसने चोकलेट लपकी, " अबी लातें हैं."  जियो मेरे लाल! काम हो गया!! मै पिछले दरवाज़े से नीचे भागी, कहाँ जा रही हो, "तुम्हारी बात आयी है बन्नो!" ये ताई अम्मा ट्रेफिक पुलिस की तरह गलत जगह ,गलत वक्त ही टपकती हैं; "जजी! इस्तरी ख़राब हो गयी,खान आंटी के यहाँ से प्रेस लाऊं ना अब! क्या सोचेंगे वो लोग!" जाओ! मेरी बेटी! ज़बरदस्ती बालों में हाथ फेर दिया  ताई अम्मा ने! अरे सुन! लुकछुप की जाइयो! कोई देख ना ले. मैंने जवाब में एक मुस्कराहट उन पर फेंकी और पिछले में पार्क गाड़ियों के पास! ":छुम्मन मेला लाजा बेता!" मैंने उसे गोद में लेकर सालसा की पोज़ीशन बनायी, उसे गाडी में पटका और चाबी लगाते हुए उससे पूछा ! " ये नेक काम अंजाम कैसे दिया आपने छोटे मिया! " गोदी में लतक गए ओल धीले छे ले ली, हम ऐछ्यी कलते हैं" अर्ररे!! मैंने हैरत से उसे देखा और स्टार्ट कर के रिवर्स डाला. उह्ह! गाडी! धम्म से जाकर सय्यद वाड़ी के मज़बूत पिलर से टकराई, ओह्ह! उसकी आवाज़ से लग गया था की जीप की पिछली लाईट शहीद हो गयी है. डर के मारे मेरा कलेजा मुह को आने लगा, मैंने गाडी को इंसानियत से पहले वाली पोज़ीशन में पार्क किया और कहा, "उतरो छोटू! " "कूँ! तुमने तो कहा था छैल कलावोगी !, घुमाव ना अब!" उसका मुह पूरा चोकलेट में भर रहा था. "अरे! तुम्हारे उन कंजूस भाई ने पेट्रोल डलवाया  नहीं! क्या पानी से चलाऊँ गाडी! " मै भाई छे पूछूं!" उसने धमकाने वाले अंदाज़ में कहा, अरे! मैंने चोकलेट आगे की. " मंच!"  उसने बुरा मुह बनाया, " नई मै तो पूछूंगा"  मेरा दिल धडकने लगा, मैंने डेरीमिल्क का बड़ा सा पैकिट उसकी जानिब बढाया, आज सुबह ही पप्पा से वुसूला था, लड़ लड़ के. तुम तो बड़े रिश्वतखोर हो! मैंने रुआंसे होकर कहा. "काम भी तो जोखिम का था."

मैंने राहत की सांस ली. अब सीधा उप्पर जाकर मगरिब अदा की और मेरा फरमान आ गया. पाहिले चचा मुन्ने ने मुझे देखा और समझाइश दी, "बिटिया! नौकरी तो आपने की ही नहीं" क्यों जी! बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनीज़ में अच्छी वर्कर होने के झंडे गाड़ चुकी हूँ और आप!" मैंने गुस्से में मुन्ने मियाँ को घूरा, मगर पापा ममी का चेहरा देख हार मान ली. "ओके! और बताइये!" चचा ज़रा मुस्कुराए  अब, थोडा पास आये, और सुनो! दस जमा'अत पढी भी हैं, और हाँ! थोडा कम्पकपाना, लड़के के सामने थोडा ज्यादा. "

मैंने उन्हें देखा उन्होंने अपना अंगूठा मुझे दिखाया और आगे के दरवाजे से अन्दर आ गए. लो जी! आ गयी लडकी. मै बड़े से चादरनुमा फिरोजी दुपट्टे में लिपटी, आहिस्ते आहिस्ते नीची नज़रे किये  हाल में दाखिल हुई.  मेरे हाथों ने कम्पकपाना चालू कर दिया था. "ओह्ह! कित्ती घबरा रही है बेचारी!" किसी औरत की आवाज़ थी. अब तो हंसी रोकने के चक्कर में हाथ और ज़ोर ज़ोर से कांपने लगे. लड़के के सामने जब पानी के ग्लास की ट्रे आगे की तो हाथ इतनी ज़ोर से कांपे कि पानी उस बेचारे पे. ओह्ह! साथ आयी एक मोहतरमा उठीं, "अल्लाह! बेटी बैठ जाओ!  कितनी शर्माती है, आजकल की लड़कियों में कहाँ ऐसी शर्मो हया!  हम कहें, हम केयी साथ हुआ था ऐसा, इनके बाउजी देखने आये थे ना हमें." बड़ी बी खामख्वाह जज़्बाती हो गयीं थी.  "हें हें! ज्यादा बाहर नहीं निकली ना," चचा मुन्ने भी हिनहिनाये. मै बैठ गयी.

लड़के ने टावेल से खुद को सुखाया. उसके कुरते पाजामे का कलफ उसके मूड की तरह ही गारत हो गया था. "वैसे सा'हब ! आपके यहाँ काम क्या होता है?" अब्बू ने लड़के के वालिद से पूछा. "अब आप से क्या छुपा है सर! अपना दो नंबर का काम है लकड़ी का. अच्छा पैसा है"  वो संभले. ऐसी बात नहीं है, हम अल्लाह वाले लोग हैं , ज़कात दे देते हैं, माशाल्ला से दो हज हो गए हैं. वे चचा मुन्ने से भी ज्यादा इर्रीटेट  करने वाले अंदाज़ में हिनहिनाये, गोयां अल्लाहताला को खरीद लिया हो. "पुलीस वुलिस का डर..?" मेरे सीधे सादे मास्टर अब्बू ने भोलेपन से पूछा, अरे जनाब! काम बड़े जोखिम का  है, रिश्वत है ना! लाखों खिलाने पड़ते हैं, गोदी में लटक गए, धीरे से डाल दी हम ऐसई करते हैं. ओह्ह! मेरे कानो में छुम्मन के अलफ़ाज़ गूंजने लगे, "गोदी में लतक गए, धीले छे......" लिफाफा देख मैंने मज़मून भांप लिया था. तभी मेरे कानो ने सुना, "भाई! ये लियए चाबी, आप भूल गए थे गाली में, हमने उथा ली. " छुम्मन फ़य्याज़ को चाबी थमा रहा था. अह्हा ! मेरा समझदार बेटा! उसके दादा ने उसे चूम लिया और उसकी जेब में एक ५०० का नोट फंसा दिया. मेरी और छुम्मन की नज़रें मिली और छुम्मन  ने मुस्कुरा कर एक आँख दबा दी. "अल्लाह! मेरा दिल ज़ोर से धडका.  ऐ परवरदिगार! मेरे ना हुए बच्चों को इस दादा से बचा लीजियो तुझे मरियम अलस्सलाम का वास्ता!!! ( अगर हम वो ना कर पाए जो तू चाहता है तो हम वह भी ना करें जो तू नहीं चाहता. मेरे ज़हन में अम्मा कि दुआ गूँज उठी)

अब्बू ने मेरी तरफ देखा, मैंने उनकी तरफ. "जी बात यह है कि इसने कॉलेज में पढ़ा है, थोडा ज्यादा, आगे नौकरी करना चाहती है." नई साब बिलकुल नहीं, होई नई सकता, खैर अल्लाह ने कहीं तो लिखा होगा, फय्याज का जोड़ा"  उसके अब्बू मायूसी से उठे. चचा मुन्ने ने मुझे मायूसी से देखा. मै और अब्बू मुतमईन थे. सब लोग मेहमानों को दरवाज़े तक छोड़ कर आये . चचा मुन्ने मायूस लग रहे थे. "क्या है चचा! मैंने उनके मुह में चाकलेट फंसाते हुए कहा घबराइये नहीं, अभी तो बैग में और भी हीरे लखीने होंगे ना! आखिर अल्लाह मिया ने आपको मेरे लिए फ़रिश्ता  बना कर जो भेजा है."  





(इमेज के लिए गूगल को, और पोस्ट चलाने के लिए अज़ीज़  दोस्त डॉक्टर साहब का तहे दिल से शुक्रिया, वर्ना मेरे बीमार होने की वजह से इस पोस्ट को आवाज़ नहीं मिल पाती.)

शुक्रवार, 22 जून 2012

इसीलिये मम्मी ने मेरी तुम्हे चाय पे बुलाया है.......


http://4.bp.blogspot.com/_IIUXg4PXyqk/S6808rKQMDI/AAAAAAAAAGk/UyLiaioU8_M/s1600/coffee%2520love.jpg 


 जिसके बगैर आगाज़े सुबह ना हो, जिसके बगैर दिन ना ढले, जिसके बगैर तन्हाइयां बुझी बुझी लगें, और जो नज़दीक हो तो अपना आप मुकम्मल लगे. जी हाँ! उसी का नाम  है चाय. वही जिसके बगैर हम ना रिश्तों की कल्पना कर पायें, ना गपियाने की. ना लम्बी दोपहर  के काटने का कोई बहाना हो ना स्टडी से थक आये ज़हन का कोई ठिकाना हो. सच जिसके बगैर कायनात का हर रंग फीका हो, ज़िन्दगी रुकी रुकी सी लगे ,वही तो है चाय. 

 माँ  को चाय बिलकुल पसंद नहीं, पापा सुबह चाय की जगह छांछ पीते हैं, अक्सर जब हम भाई बहिन चाय पीतें हैं, दोनों नाक भौंह सिकोड़ते हुए कहते हैं, "नशीले! हमारे बच्चे हैं यह!"  "पता नहीं, अस्पताल में बदल गए शायद!" दोनों ही मुस्कुराते हुए इस नतीजे पर पहुँचते हैं. बाजी को किसी के हाथ की नहीं जमती, सो बड़े मज़े हैं, वह जल्दी उठ गयी तो सुबह से शाम तक चाय की छुट्टी, कोई मुझसे नहीं कहेगा, "गुडिया! जाओ चाय बनालो, मंझली और चाय के इश्क के किस्से बड़े मशहूर हैं, जब बड़े मामू ने अपने बेटे के लिए उसका प्रपोज़ल माँगा तो उस वक्त वह चाय पी रही थी, वक़ार भाई ने जब बड़ी अदाओं से उन्हें बताया कि 'फुप्पी जान से अब्बू उन्हें वकार  भाई के लिए मांग रहे हैं'  तो जवाब में पूरा ग्लास वह भी चाय का, उन्होंने वकार भाई  पे देमारा. शादी तो खैर बहिना की गैरों में हुई पर, वक़ार भाई के टखने पर उस ग्लास का निशान जूं का त्यूं है. बड़े भैया को कोफी ज्यादा पसंद है, पर रोज़े अब्र और शब् ए माहताब में  दिल चाय पर ही आता है, खुद बनाते भी हैं और सब भाई बहिनों को पिलाते भी हैं. छोटा भैया बचपन में ही दूध को तलाक दे चुका था, और उसके साथ ही चाय एक महबूबा सी लग गयी थी, अक्सर स्कूल से आकर चाय मांगता तो माँ कहती, 'चाय नहीं मिलेगी, खाना खाओ पहिले', जवाब में वह मुस्कुराते हुए माँ के गले में बाहें डाल कहता, "चाय बिना चैन कहाँ रे!"  माँ पट भी जाती थी, अमूमन अम्माएं ऐसी ही होती हैं.

मेरी कोई फ्रेंड आती जनाब चाय लेकर हाज़िर! सीमा स्मिता से लगा कर स्मृती दी या कीर्ती सबको अपने हाथो चाय बना कर दी है इसने, बदले में कम भी कहाँ पड़ा!  इसके दोस्त कितने नालायक थे, ऑर्डर से, लाड से ,मान से या मनव्वल से मुझसे चाय बनवा ही लेते थे, प्रदीप भैया, गोपाल भैया, शैलेष भैया , गौरव भैया, सचिन भैया, वैभव भैया, फरीद भैया, विक्टर, प्रवीन, छोटू सिंधी और भैयाओं की नाख्त्म होने वाले फहरिस्त और शाम की चाय के धमाल. 

कोई लडकी सेट करनी है, दिलशाद का घर, और चाय का टाइम, किसी को पीटने का प्रोग्राम बनाना है, शाम पांच बजे दिलशाद का घर और चाय का टाइम, किसी की गर्ल फ्रेंड के बिछड़ने का मातम शाम को चाय के वक़्त दिलशाद के घर. अब तो सब ज़िन्दगी की दौड़ धूप में उलझे हैं, सबके बीबी बच्चे हैं नाखतम होने वाले काम हैं, पर साल में एकबार ज़रूर मिलते हैं सब वही दिलशाद का घर चाय का टाइम.
दिलशाद (छोटा भाई) और चाय अब एक दूसरे के पर्याय थे, प्रदीप भैया की मम्मी को पता था, दिलशाद आने वाला है, चाय ज़रूर बनेगी, अच्छा गुडिया भी आ रही है, चाय बढ़ा लो, और बारिश के मौसम में घर का लैंड लाइन खनखना उठता, "गुडिया! हम सब आ रहे हैं, जोशी के पकौड़े लेकर, चाय बना ले बेटू! " शाम को अक्सर, "ए भैया! कल मैंने बनायी थी, आज तेरा नंबर है, " "ओये! आज मेरा नहीं, भैया का टर्न है" चल बढ़ ले यहाँ से, मै वे नहीं बनाने की! "  इतने में पिम्पले क्लास से लौट कर घर में दाखिल होती कीर्ती /"लाइए भैया! मै बना दूं," करके खुद ही चाय बना देती थी.  

शाम की चाय के साथ भेल, मेरी एक्साम के टाइम पर गौरव भैया ही बनाते थे, रात को अक्सर रूम मै नाना मियाँ  के साथ शेयर  करती थी, अक्सर रात के दो या तीन बजे वे उठते और कहते, "मेरी  बच्ची ! पढ़ रही ही, आ तेरे लिए चा बना दूं!" मै जवाब में मुस्कुराते हुए उठती नाना मियाँ को वाशरूम ले जाती, पानी पिलाती, वुजू करवाती और तहज्जुद गुज़ार नाना मियाँ के मुसल्ले पर एक प्याली चाय रख जाती, गोयां यह नाना मियाँ का चाय पीने के लिए कोई इशारा हो. एक दिन मैंने माँ  से पूछा " मामा! नाना मिया ऐसा क्यों करते हैं, जवाब में माँ की ऑंखें गीली हो गयी, कहने लगीं, "बेटे वह दौर शदीद ग़रीबी का था, घर में गैस नहीं था, मै बीएससी कर रही थी, और मुझे स्टोव जलाना नही आता था, अब्बू जी चार बजे उठ कर मेरे लिए चाय बनाते थे, आज मै जो कुछ हूँ सिर्फ उनकी कुर्बानी और मोहब्बत की वजह से वर्ना, छः बेटियों के बाप ने अगर छटी बेटी को नहीं पढाया होता तो!" जवाब में मेरी भी आँखे भीग गयी. मै जब तक नाना मिया के साथ रही, अपने हाथों से उन्हें चाय पिलाती रही, अम्मा का कर्ज़ समझ कर और बदले में नाना मिया ने मुझे हमेशा एक दुआ दी, "अल्लाह ! मेरे इस बच्चे को सूरज सा मुनव्वर कर, और चाँद सा नूरानी कर दे." नाना मिया की दी हुई दुआ घर में सबको रट गयी थी, जब भी मै उन्हें चाय की प्याली से तश्तरी में चाय ढाल कर देती, मेरा भाई चुहल करता, "अल्लाह इस लडकी को चुड़ैल सा चीपड़ा, और  सिंगी गाय सा भारी......" फिर तो हमारी वह फ्री स्टाईल  होती कि बस ..!!!
  
चांदनी रातों में चाय का कप थामे हम तीनो भाई बहिन सियारों की तरह छत पर बैठ चाँद तांकते, नयी ग़ज़लों पर तब्सिरे होते, जगजीत साहब, गुलाम अली साहब, महदी  हसन साहब या अहमद हुसैन मोम्मद हुसैन साहब की आवाज़ का जादू धीमे धीमे चलता रहता, बारिश या सर्दी की कोहरे वाली कितनी सुबह हैं जब ज़फर भाई  को साथ ले, अपनी अपनी गाड़ियां उठा, थर्मस में चाय डाल हम लॉन्ग राइड पर निकल जाते थे. चाय गोया वह बुढिया थी, जिसने हमें रोते हँसते, गाते झूमते हर रंग में देखा था . कितनी झील सुबहें, नील शामें, हम और चाय बस!!!! 

और अब! होने वाले मियां ने फरमान भेजा है, "आई हैट  टी." ऐसे कैसे हो सकता है!!!
क्क्क्य! मुझे मेरा लिखा एक शेर याद आ गया:
"तुझ से बिछड़ कर डूबती, चाय के प्यालों में शाम
हमने यूं गम को भुला कर मुस्कुराया देर तक..."
 
चाय के लिए मेरी मोहब्बत जोश मारने लगी, मुझे कुछ करना होगा.
 
  घर  में कोई नहीं था, हमने भी  मौक़ा देख उन्हें चाय पे  बुलाया, कान के नीचे कट्टा अड़ाया और खुले लफ़्ज़ों में समझा दिया है,  "बचपन से क्या पिया सुबह! अरे चाय ही पी ना! अरे २ दिन से कोफी क्या मिली मियाँ अँगरेज़ हो गए!!! आज चाय को कह रहे हो कल हमें कहोगे, "आई हैट यू"  मिया! हम तो चाय पियेंगे वक्त बेवक्त पियेंगे, हमसे शादी करनी हो तो चाय से मोहब्बत करनी होगी, वरना, टीमटाम उठाओ, हमारे जैसी बीबी का मियाँ होने के लिए बड़ा जिगरा चाहिए हाँ! अभी तो बेचारे उठ कर गए ही हैं, बड़े रोमांटिक मूड से आये थे, और बड़े बुझे बुझे जा रहे हैं. हम मूड ठीक करने के लिए चाय बनाने जा रहे हैं, उसके बाद सोचेंगे इनका क्या करना है....     


 



 

बुधवार, 13 जून 2012

पप्पा की खातिर

"सुन! मै शादी कर रहा हूँ, तू आयेगी ना!" सुबह सुबह मोबाइल खनखनाया  और यासिर कि जानी पहचानी आवाज़ ने समाअतों की फिजा में रंग घोले.

हर बार की तरह इस बार भी कुछ नया और चौकाने वाला. "चलो! तुम्हे और शीरीं को मुबारकबाद" मेरे मूह से निकला ही था कि उसने बात काटी, "शीरीं नहीं यार! अज़रा निशात नाम है मेरी होने वाली बीवी का."  क्या बात कर रहे हो तुम! शीरीं का क्या होगा, पागल हुए हो क्या, वो तो सदमे से मर जायेगी यार! तुम मर्द एक नंबर के कमीने होते हो, मै तुम्हे शूट कर दूंगी मै तो जैसे उबल पडी." डांट मत लगाओ यार! आज शाम की फ्लाईट से इंदौर आ रहा हूँ, उसने फोन डिस्कनेक्ट किया और मेरे दिमाग में हथौड़े बरसने लगे. पहले यासिर के आने पर प्रोग्राम होता था, क्या करना है, कहाँ कहाँ घूमना है, कितने दिनों सोनकच्छ, कितने दिनों इंदौर. अब  यासिर के आने पर मै सबसे तेज़ चाकू तलाश रही थी.

यासिर से मुलाक़ात के पहले पहले दिन मेरे ज़हन में घूमने लगे,  वेरोनिका इंटर प्राईज़ेस  के भोपाल ऑफिस की तरफ से मै, हैदराबाद ऑफिस  की तरफ से यासिर और चैन्नई ऑफिस की तरफ से सालई कोलामणी. "थर्ड ए.सी. का टिकट भेज कंपनी समझ रही है कि अहसान किया." वह फोन पर किसी से बात कर भुनभुना रहा था, 'आईं! हम भोपाल वालों  के साथ तो और भी सौतेलापन किया गया है,स्लीपर में ही....मैंने तुरंत भाई का नंबर डायल किया. "हां! वापसी की फ्लाईट बुक है यार, परीशान मत हो !" मेरे बिना पूछे उसने बगैर औपचारिकता के जवाब दिया. 

  मीटिंग ख़त्म हुई, मै महीने भर का एजेंडा हाथ मै थामे, कलाई घड़ी को घूरने लगी, ६ बजे की फ्लाईट है, और अभी ४: ३० हुए है, अभी से अरोड्र्म जाकर क्या करूंगी, क्यों न  लाजपत मार्केट तक होकर आया जाये, एरोज़ इंटर नेशनल होटल की सीडियां उतरते उतरते मै सोच रही थी. गूगल मैप्स की मदद से रास्ता तलाशते तलाशते जब लाजपत मार्केट आयी तो रोडसाइड पर एक शॉप में एक कैप्री पर मेरा दिल आ गया. मै उसकी मोहब्बत में बावली दुकान में घुसी कि अन्दर दुकानदार से भावताव करते यासिर पर निगाह गयी, वह झेंपा, झिझका, और मुस्कुराता हुआ करीब आया. "मुझे रोडसाइड शोपिंग का मेनिया है" , मैंने उसका बड़ा हुआ हाथ थामा, "मी टू" मै मुस्कुराई. और कैप्री उठा पेमेंट करने लगी. हम साथ साथ दुकान से बाहर आये, इधर उधर टहले, उसकी ट्रेन शाम आठ बजे की थी.  हम बेवजह गपिया रहे थे. इस उस के भाव ताव कर छोटे मोटे दुकानदारों को तंग कर रहे थे, हैदराबाद और भोपाल की बातें कर वक़्तगुजारी का लुत्फ़ उठा रहे थे. अब भूक लगने लगी थी, उसने एक रोडसाइड शॉप पर कुछ मोमोज ऑर्डर किये और बेंच पर बैठ पास खड़े सॉक्स वाले से भाव ताव करने लगा. मै मुस्कुरा कर पास खड़े मटका कुल्फी वाले से दो कुल्फियां ले आयी, और अब हम दोनों साथ मिल कर उसे तंग करने लगे, उसने कुल्फी वाले को पेमेंट किया, हमने साथ में मोमोज खाए और अब चलने की वेला.
 मैंने रस्मी बातें कर उससे विदा लेते वक्त एक पैकेट उसकी तरफ बढाया और एरोड्रम के लिए एक रिक्शा पकड़ा. रास्ते भर मै यासिर के बारे में सोंच रही थी, इतना हाई फाई मगर जरा भी क्लास कॉन्शियस नहीं, स्टेटस कॉन्शियस नही, अभी इंदौर भोपाल के लड़के होते न तो....सच प्रोफेशनल माहौल का बड़ा फर्क पड़ता है. 

मै सोंचों में गुम थी कि एक  मैसेज " विल आलवेज़ मिस दिस सिल्वर डे -थैंक्स, यासिर."  मै मुस्कुरा दी. उसके बाद हर मीटिंग के बाद दोस्ती बढ़ती ही गयी और कब मैंने यासिर की बड़ी बहिन का दर्जा पा लिया मुझे अहसास ही नहीं हुआ. हम अक्सर ६ महीनों में एक दिन पूरा साथ बिताते, जिसमे सिर्फ और सिर्फ बातें. खलील जिब्रान की कहानियां,, ओस्कर वाइल्ड के नगमे और पता नहीं क्या क्या!
दिन भर यासिर के लिए सोंचते सोंचते गुजरा, और शाम को वह आया तो बुझा बुझा सा था, सोफे के नीचे बिछे कालीन पर तकिये से सर टिकाये निढाल हो गया यासिर. मैंने पानी पिलाया, और कुछ देर उसे कमरे में अकेला छोड़  किचन में आ गयी.  मगरिब पढी, दुआ में हाथ उठाये और यासिर पास आकर बैठ गया, " जानती है, उसके अब्बू केंसर के पेशेंट हैं, मेरे अब्बू हार्ट पेशेंट दोनों नहीं चाहते हम शादी करें, अम्मा सारी उम्र न बख्शने की धमकी दे रहीं हैं, मै अगर बगावत कर भी लूं, हम भाग भी जाएँ और मान लो उसके वालिद नहीं रहे तोउसके तीन छोटे भाई बहिनों  का क्या होगा, उसके अब्बू की आख़िरी स्टेज है, और मेरे अब्बू की ८०% आर्टरीज ब्लोक हैं , मुझे भी तो गुडिया की शादी करनी है. और फिर तू एक दिन नहीं बोली थी, मियाँ बीबी के रिश्ते में सब कुछ होना चाहिए, सिवा मोहब्बत के, बड़ा प्रेक्टिकली जीना होता है यह रिश्ता!!! खुश रहना हो तो कभी उससे शादी मत करना जिससे बहुत मोहब्बत हो."  हमने साथ बैठ के तय किया हमारा शादी न करना ही बेहतर है, हमने उस दिन साथ साथ पहली बार ओपेरा देखा, साथ घूमे, साथ साथ रोये और..... कल उसकी भी शादी है."
वह आदत के अनुसार एक सांस में सब बोल गया, उसकी आँखें पनिया रही थी और वह दुखी था, "यासिर! मेरा बच्चा!"  मैंने आंसू पोछे और उसका सर अपने गोदी में रख लिया.
"यासिर!" - खाना लगाते लगाते मैंने पूछा

-"हूँ!"  उसने जवाबन मुझे घूरा.

-"तुम न! अच्छे पप्पा बनना!!!"

और वह  मुस्कुरा दिया

गुरुवार, 7 जून 2012

"ये छत बहुत हसीन है......"

"दालानों की धूप, छतों की शाम कहाँ
घर के बाहर, घर जैसा आराम कहाँ...."
कितने दिनों बाद घर की सुबह नसीब हुई, कल रात जब छत पर टहल रही थी यही तो सोच रही थी, मेरे लगाये दरख़्त अब बड़े हो चुके थे, गुलाब फूलने लगे थे, मोगरा लहलहाने लगा था, और रातरानी के चटकते शगूफे पहली बारिश की खुशबू से सराबोर हो रूह में घुलते से लग रहे थे. मेरा पाला कछुवा भी बड़ा हो चुका था. कल शाम लग रहा था जैसे मै चाय के साथ शाम भी घूँट घूँट करके पी रही हूँ. आज सुबह जब छत पर आयी मेरे आने से पहले कबूतरों का जोड़ा, सामने के पीपल का कव्वा, और दो प्यारी गौरय्यें फुदक कर मुंडेर पर आ पहुँची, मैंने उनके लिए पानी के बर्तन में पानी, और खाने की परांत में कुछ बाजरे के दाने डाल दिए. वे चहक चहक कर मेरा इस्तकबाल करने लगीं. मुझे खुशी थी वे मुझे अब भी नहीं भूलीं थीं. थैंक्स गोड! मैंने मुस्कुरा के एक ठंडी सांस ली. आज मामा ने फजिर के लिए नहीं उठाया कल रात के मेहमान बड़ी देर से जो गए थे. मै आराम से उठ कर टेरिस पर  हवा का लुत्फ़ उठा रही थी.

भाभी को पौधों में कोई दिलचस्पी नहीं  पर काम वाली खाला बी ने मेरी गैर हाजिरी में इन सबके लिए अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं थीं, इसी से लौटती दफे में इन सब के लिए अच्छे अच्छे तोहफे लेकर आयी थी. मै अपने बोगनबेलिया से बातें करने लगी, 'आई मिस यूं जानू', मैंने गुलाब से कहा " शोना! आयी लव यू" और कहते कहते मेरी आँखें गीली हो गयीं. तुलसी में तो मेरा दुपट्टा खुद ब खुद जा अटका बेसाख्ता मेरे मूंह से निकला " हम अपने दिलपसंद पनाहों में आ गए.." बरगद की बोनसाई ने मुझे देख कर आशीर्वाद में हाथ उठा दिए, क्रोटन ने मुस्कुरा कर मुझे गले लगाया, चायनारोज़ तो  मारे खुशी के अपना एक लाल फूल भी गिरा बैठा,  कूकू फ्लोवर्स अलबत्ता अकड़े बैठे थे, जैसे ही मैंने छुआ बेल लकड़ी से मेरी गोदी में आ गिरी, " माय लव"  मैंने उसे धागे से बाँध कर फिर खडा किया.
मोर्निंग वाक् से बीन कर लाया और मटके में इकठ्ठा किया गोबर अब जैव खाद में तब्दील हो गया था. मैंने मिट्टी पलट, थोडा थोडा सब में डाला, गिलकी, लौकी, करेले की बेलों ने भी "राम राम" किया, मै उनसे भी मिल आयी. ऑफिस टाइम के फूल मुझे कनखियों से देख रहे थे, काला लंबा मोगरा अपनी अपील से अच्छी तरह वाकिफ था, बेवजह मुझे लाइन मार रहा था. मैंने "लिन्डेन डस्ट" की एक शरीर मुस्कराहट उन पर फेंकी और आगे बढ़ गयी. अनार के लाल फूल, एलोवेरा की "लश ग्रीनरी" और घास के नन्हे जवारे सभी खुश थे, मानों कह रहे हों, "जहां चार यार मिल जाएँ, वहीं रात हो गुलज़ार". माल्वेसी फेमिली के लाल गुलाबी फूलों के प्यार को तो मै ज़िंदगी  में कभी  नहीं फरामोश कर सकती और चमेली!  जैसे ही उसके मंडवे के  पास से गुज़र हुई, कागज़ से भी हलके फूल हवा की तरह मेरे आँचल में आ गए, बेसाख्ता मेरे मूह से निकला:
                                                                "अब भी मिलतें हैं हमसे यूं, फूल चमेली के
                                                                 जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है....."

टूटे मटके में लगी रक्त चम्पा के पास ही बड़े भैया ने टूटे  टब का इस्तेमाल कर एक नकली पौंड बनाया था, जिसकी नन्ही रंगीन मछलियों की शोभा देखते ही बनती थी. मेरे इंजीनीयर भांजे ने कुछ अक्ल भिड़ा,  कबाड़ से जुगाड़ लगा एक नकली फाउन्टेन भी बना डाला था, हमने इसके आसपास वाटर लिली के गुलाबी फूल लगा रखे थे, कुल मिला कर सब परीकथाओं सा. मुझे वह दिन याद आया जब एक छुट्टी के दिन भइया इसे बनाते बनाते गा रहा था " ये घर बहुत हसीन है......"

 शायद कुछ ही दिन और हैं, ये सब फिर मेरे लिए एक याद बनकर रह जाएगा. पता नहीं वक्त मुझे कहाँ  ले जाये, और मै इस घर के लिए एक याद बन जाऊं, फासले शायद सब गुम कर दें, इस छत पर गुजारी हम भाई बहिनों की चांदनी रातें, हमारे हंसी ठहाके, पापा मामी के साथ खेली अन्ताक्षरी, और बड़ी भाभी की गोदी में सर रख कर बतियाने वाले दिन.....
मगर इतना ज़रूर है, मै कहीं ना कहीं ज़रूर मुस्कुराउँगी, इन क्यारियों के फूलों के नए नए शिगुफों में या फिर क्रोटन के नए पत्तों में.
                                                                                                         लोरी.

बुधवार, 6 जून 2012

एलीज़ा


मेरे घर के सभी रास्तों को काट गयी
तुम्हारे हाथ की कोई लकीर ऐसी थी

घर आये हुए चैन की सांस ली भी ना ली थी, कि अम्मा का वही "लड़का देखो पुराण" चालू हो गया. इस बार ताई अम्मा, अप्पी और भाई जान के फंदे  में आ ही गयी मेरी भोली भाली मामा! एक तो वैसे ही इत्ते लम्बे सफ़र के बाद भोपाल उतर जाओ का राग, फिर भोपाल वाला लड़का; फिर इंदौर वाला लड़का, ( कल मुंबई वाला भी आने वाला है!!!!)
अब अम्मा को कौन समझाए कि माँ प्यारी! ताजमहल को भी इतने लोग नहीं देख गए जितने मुझे! टैक्स लगवा दो ना अम्मी!!!

          इस बार जब माँ भोपाल वाला लड़का देख कर इंदौर वाला देखने आयी ना तो सच्ची एक बड़ा मज़ेदार वाक़ेया हुआ. ऐसा कि भुलाए नहीं भूल पाउंगी. इंदौर आने पर ऐसा लग रहा था कि बस!! मामा ने क्यों बुल्वालिया. अभी सेशन एंडिंग पार्टी की धूम हो रही थी, सर सय्यद लाइब्रेरी में सजावट, कांफ्रेंस हाल में हँसी ठहाके, और अपने खुद के एक्टिव पार्टिसिपेशन का नशा उतरा भी ना था, कि माँ ने वापसी का फरमान जारी कर दिया, दिल हुआ सब से लिपट लिपट कर रो लूं!! मगर मसला संजीदा था, डैडी अब मेरी शादी का टेंशन लेने लगे थे, और मामा भी थोडा थोडा. सो आना बड़ा ज़रूरी था एक तो घर में मेरे अलावा काम करने के लिए कोई मौजूद नहीं था, तिस पर भैया भाभी खंडाला गए हुए थे. उफ़ तौबा! मैंने दिन भर घर की सफाई की, ब्लॉग अपडेट किया, और जले पैर की बिल्ली  की  तरह घर भर में घूमती रही, शाम हुई, रात हुई और महमान हज़रात का खैर मकदम भी हुआ. (वैसे मै एन्जॉय करती हूँ इसको मगर......) इतने दिनों से बुर्का पहन कर मुझे वापस मेहमानों में मर्द हज़रात के  सामने जाने में हल्की सी कोफ़्त हो रही थी. माहौल खुद ब खुद भारी भारी होने जा रहा था कि मेह्नानो के साथ आयी एक नन्ही मुन्नी गुडिया एलीज़ा तितली की तरह ठुमक मटक कर बिन बुलाई बरखा की ठंडी फुहारों सी अन्दर आ गयी. पहले पहल दिल हुआ इससे बातें करूँ या नहीं, जज़्बात की रौ में बह निकली और हम मिल कर हल्ला मचाने लगे ना तो मेहमान इस नन्ही को डांटेंगे और मेज़बान अपनी नन्ही  को. सोचों में गुम ही थी कि एलीज़ा ने मेरा दुपट्टा पकड़ कर ऑर्डर किया, भाभी  मुझे एक बुक दे दो ना!!! आईं!!! "मै ! भाभी!!! " शायद एलिज़ा ने कहीं भाभी लफ्ज़ सुन लिया हो, मगर उसके लफ़्ज़ों के यूं इस्तेमाल के टेलेंट को देख कर तो दंग रह गयी मै!!! 

 
                             बमुश्किल अपने हंसी रोकी ही थी, कि नन्ही ने एक और आर्डर किया, "परना बी आता है या युई  लक्खी है?" उसकी तीखी तीखी नाक किसी पारखी टीचर की तरह चढी हुई थी, और मासूम आँखों में शैतानी  के डोरे हरकत कर रहे थे. मै खिलखिलाने को हुई, कि मामा की आवाज़!!! " गुडिया! पानी वानी पिलवा दो ज़रा!" " उफ्फ्फ अल्लाह ये अदा!" मै बोलने ही वाली थी कि मुझे याद आया कि बाहर बैठे  मेहमान मेरी ज़िंदगी का फैसला लेने आयें हैं, और मै!!! मुझे थोडा सीरीयस होना चाहिए, ये एलिज़ा भी ना!  मैंने पानी देने के बाद किचन का रुख किया, नन्ही अब किचन में आ धमकी! "यां क्या कल्ली हो? उसकी नमकीले चेहरे पर फैली हैरानी और आँखों में घुली मासूमियत ने मुझे फिर जकड लिया. मेरे  ध्यान नहीं देने पर उसने मुझे फिर डपटा, " चाचू! इदल बैठो, मेले साथ खेलो!" अबकी बार उसने मुझे चाचू कहा, मैने बड़े जतन से हंसी रोकी ही थी, कि  एलिज़ा ने फिर हुक्म दिया! "मुझे खेलना है, तुमको बेत के खेलने वाला खेल नई आता?" कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि एक मिनट के लिए मुझे लगा कि मुझे अपनी सारी डिग्रीज़ जला देनी चाहिए, लानत है मुझ पर!!! बैठ के खेलने  का एक भी खेल मुझे नहीं आता.!!  
   मै इस संजीदा मसले पर गौर फरमा ही रही थी कि मम्मा की आवाज़! " बेटी! ज़रा इधर आकर बताइये कि आपने क्या क्या किया है? " जी में आया कहूं "अम्मा! मैंने कुछ नहीं किया, अरे!!! मुझे तो बैठ के खेलने का खेल भी नहीं आता"  मगर निहायत शराफत से मुझे बताना पडा कि  मैंने भी गुज़ारे लायक पढाई की है.

 मेरे पीछे पीछे परछाई सी डोलती एलीज़ा अब मेरे साथ किचन में आ गयी, मैंने उसे थोडा सा नाश्ता ऑफर किया जवाब में उसने मुझे घूर कर देखा, और पानी की तरफ इशारा किया, मैंने  प्योरिट से पानी निकाल, एक ग्लास उसकी ओर बढाया वह खड़े खड़े एक सांस में पानी पीने लगी, " बुरी बात! बैठ कर पीजिये" मेरे समझाने पर वह भाग कर डाइनिंग हाल तक आयी, ठुमक कर तख्त पर बैठ गयी और बोली, "लाओ यहाँ लाकर दो!" (मेरी सासू माँ! लो पियो) मैंने मुस्कुरा कर उसे ग्लास थमाया. उसने एक नज़र ग्लास पर डाली, " कांच का ग्लास क्यूँ लिया! तोलोगी (तोडोगी)  क्या???  अब तो मै हंस ही दी, एसा लगा जैसे कि हल्की हो उठी हूँ, नाश्ता लगा दिया गया था, लिहाजा मै और एलिज़ा डांस करने लगे, थोड़ी देर बाद रुक कर उसने हाल की  कुक्कू क्लोक़ की तरफ इशारा किया, उसमे चिरिया नई आती? मै जवाब देती इतने में तो दूसरा सवाल तय्यार हो गया था जो राहदारी के खिलौनों को लेकर था, "इत्ते सब से तुम अकेली खेलती हो" मासूम सी नन्ही को बेवजह अल्लाह मिया से शिकवा हो आया, मानों कह रही हो " अकेली एक तुम और इतने खिलौने."  मैंने उसे बेसाख्ता चूम लिया, उसके ओब्ज़र्वेशन, उसकी ऊर्जा, और उसकी मासूमियत!!!  जी में आया, इसकी नज़र उतार कर इसे अपने पास रख लूं, खिलौने वाली चुलबुली गुडिया के जैसी.

          उसके निहायत एटिकेट-पसंद अब्बू और नफासत -पसंद अम्मी को उसके यह सहासिक कारनामे शायद बिलकुल पसंद नहीं आ रहे थे, इसी से लगातार 'नहीं- नहीं' कहते वह एलिज़ा को भीतर से बाहर बुलाने की कोशिश कर रहे थे, पर नन्ही की डिक्शनरी में "नहीं" लफ्ज़ था ही नहीं. उसे किसी की कोई परवाह नहीं थी, दुनिया के तन्ज़ों से गाफिल वह मेरे घर के कोने कोने का लुत्फ़ उठा रही थी.
मुझे नहीं पता देखने आये लोगों में कौन लड़के  से क्या क्या रिश्ता रखता था, पर एलिज़ा! थोड़े ही वक्फे में उसने मुझे, आंटी, अप्पी, भाभी, चाचू, और पता नहीं क्या क्या बना डाला था.


वंडरलैंड की एलिस, पंचतन्त्र के साधू- महात्मा, एंडरसन के भूत, परी और मेज़ पर रखी तमाम किताबों से एक रिश्ता कायम करके एलिज़ा चली गयी पर कमरे में उसकी खुश्बू अब भी ताज़ा है गुलदान के फूलों जैसी.
जियो नन्ही, और नूर किरन बन कर सारी दुनिया पे छ जाओ
तुम्हारी आंटी
लोरी .