रविवार, 10 मई 2015

"अम्मा का घर अम्मा के बाद"


जगह जगह परछांई  सी है 
     अपने घर अँगनाई सी है 
             न होने के बाद भी अपने
                        पूरे घर पर छाई सी है 

हल्दी-मिर्ची , तेल -शकर सी,
        गंध में महके पूजा घर सी 
              पिछवाड़े से अगवाड़े  तक 
                           पूरी बसी- बसाई सी है

अजवाईन , तुलसी, पौदीना
         उसका आँचल झीना झीना
              भौर के राग में चिड़ियों के सुर 
                              वह घुलती शहनाई सी है
ठंडी रातें बिना अलाव 
     मन पर लगते घाव- घाव
           रूठ के सोयी नींद के ऊपर 
                 पड़ती गरम रज़ाई सी है 

  भण्डारे  के अंधियारे से 
        दालानों के उजियारे तक 
               ग़ौर  से देखो गयी नहीं वह
                      हर बच्चे में समाई हुई है 
                                                      - लोरी 


बुधवार, 6 मई 2015

मैं कौन हूँ





मोज़े  बेचती, जूते बेचती औरत  मेरा नाम नहीं 
मैं  तो वही हूँ 
जिसको तुम दीवार में चुन कर 
मिस्ले सबा बेख़ौफ़ हुए 
ये नहीं जाना 
पत्थर से आवाज़ कभी भी दब नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ 
रस्म व रिवाज़ के बोझ  तले 
जिसे तुमने छुपाया 
ये नहीं जाना 
रोशनी घोर अंधेरों से 
कभी  डर  नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ 
गोद  से जिसकी फूल चुने 
अंगारे और कांटे डाले 
ये नहीं जाना 
ज़ंजीरों से फूल की 
ख़ुश्बू  छुप नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ 
मेरी हया के नाम पर तुमने 
मुझको खरीदा, मुझको बेचा 
ये नहीं जाना 
कच्चे घड़े पे तैर के 
सोहनी मर नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ  जिसको तुमने डोली बैठा के 
अपने सर से बोझ उतारा 
ये नहीं जाना 
ज़हन ग़ुलाम अगर है 
क़ौम उभर नहीं सकती 
पहले तुमने मेरी शर्म-ओ-हया पे 
खूब तिजारत की थी 
मेरी ममता , मेरी वफ़ा के नाम पे' 
खूब तिजारत की थी 
अब  गोदों  और ज़ेहनों में 
फूलों के खिलने का मौसम है 
पोस्टरों पर नीम -बरहना 
मौज़े बेचती , जूते बेचती औरत मेरा नाम नहीं 
                                                             किश्वर नाहिद