गुरुवार, 26 जनवरी 2017

गणतन्त्र दिवस ....अमर रहे....


      
कल ही लम्बे चौडे भाषणों का सिलसिला तारी हो गया था, सभी को इस दिन का महत्व भली भांति समझा दिया गया था...खूबसूरती से बताया था कि सभी को आना है, और गणतन्त्र दिवस के कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान देना है.
      मैं! जो भाषा के साथ नैतिक शिक्षा भी पढाती हूँ, उसे बखूबी जानती थी और यह भी जानती थी कि वह नही आयेगा. सच कहूं तो उसकी रग रग से वाक़िफ थी मैं .‘यथा नाम तथा गुण सा प्रतीक तो वह था ही, मगर निरा अपनी उम्र का प्रतीक. बहुत मेधावी नही, मगर बहुत बुरा भी नही. बहुत ध्यान देने वाला भी नही तो निरा बेध्याना भी नही. पढाई में दिल दरूद ज़्यादा तो नही था, मगर बेदखलों में भी शुमार नही था.  हर हफ्ते गर्लफ्रैंड नही बदलती थी तो ऐसा भी नही था कि अब तक कोईं बनी ही नही. ज़िंदगी को लेकर बहुत ज़्यादा सीरियस नही तो बिल्कुल ग़ाफिल भी नही था. अपनी नस्ल के और नौजवानों का निरा प्रतीक. मगर एक बात थी. उसका हर चलन उसकी ही तरह निराला था. निरा मौलिक और अप्रसारित.
      अक्सर चलती क्लासों के नाखत्म सिलसिलों में या तो वह कैम्पस या कैंटीन से बरामद होता था या फूलों की किसी क्यारी के पास बैठा धूप सेंकता. एक दिन जब उसे बुला कर डांटा, तो कहने लगा था, “और तो मुझे कुछ पता नही, मगर आपको मुझसे उम्मीद है तो तोडूंगा नही! आपके सब्जेक्ट में बहुत अच्छे मार्क्स लूंगा. आपको नीचा नही देखने दूंगा मेडम!”
      सच कहूं तो मुझे उसके इस अल्हडपन पर बहुत ज़्यादा भरोसा था. वजह शायद उसकी शरीर मुस्कुराहट थी. या गम्भीर आखें नही जानती मगर मुझे भरोसा था कि आने वाले कल में किसी बहुत पैसे वाली जगह बरामद होने वाले कुछ लोगों की फेह्रिस्त में वह भले ही शामिल ना हो, वह उन लोगों मे ज़रूर मिलेगा, जो बेहतरीन इंसान होते हैं और शायद अपने और अपने लोगो से जुडे हर दायित्व को पूरा करने वाले भी.
      बहुत ज़्यादा सौम्य, शिष्ट और होनहार बच्चों की मौजूदगी अक्सर अपना एह्सास खुद ही करवा देती है. कभी तो उनका अपना क्लासरूम रिस्पोंस. तो कभी अच्छे नम्बर. मगर कुछ बच्चे अपनी मौजूदगी के साथ अपने ज़ात समाज का एह्सास करवाना भी, “नैतिक शिक्षा की मैडम के प्रति अपनी एक आवश्यक ज़िम्मेदारी” समझते थे. किसी को अपने ब्रहम्म्ण होने पर दम्भ तो कोईं जैन होने पर मिटा जाता था. किसी को जैन में भी किसी के “समय्या” और खुद के और अधिक ऊंचे होने का दर्प तो किसी को “खान” होने पर किंग समझ लेने की नादानी. कहानी  कमोबेश एक ही जैसी थी और भावनाओं की तीव्रता भी लगभग एक सी ही. “गर्व से कहो...हम फलां है, और फख्र से कहो हम फलां हैं...” ऐसे में उनके अंदाज़ भी अलग अलग हो जाया करते थे. सुप्रभात, ग़ुड मोर्निंग, गुड ऑफ्टरनून से हठ कर “अस्सलामो अलैय्कुम, जय जिनेंद्र, जय शिव या जय नर्सिंह” जैसा भी कुछ हो जाया करता था और “सबका मालिक एक” अंदाज़ में सबके लिये मेरा जवाब बस एक मीठी सी मुस्कुराहट होती थी. मैं अक्सर देखती थी....जैन को जैन में, मुसलमान को मुसलमान में , पंजाबी को पंजाबी में , मराठी को मराठी में बडी तेज़ी से दिलचस्पी बढ रही हैलोग रंग, नस्ल और ज़ात के  आधार पर दोस्त बना रहे हैं…..मेरेखुदा! इंसान को इंसानियत सिखाने में मुझसे कहाँ चूक हो रही है कि मानस की चौपाई पढते वक़्त मैं अक्सर चप्पलें उतार, सर ढांक लेती हूँ, बिल्कुल ऐसे ही सबद, या जिनवाणी या क़ुरान का ज़िक्र करते हुए भी खुद ब खुद मुझसे हो जाया करता है...फिर???” फिर के अनबूझे रह्स्य को मैंने वहीं छोड आने वाले कल का सिरा थामना चाहा, “यह लडका कल तो ज़रूर मुझसे डांट खायेगा ही!  एक गणतन्त्र दिवस  के वक़्त ही काम याद आये इसे.”
      अगले दिन राह्दारी में मिला भी. बदस्तूर मॉस कम्यूनिकेशन के स्टूडेंट्स से घिरी मैं! सबके बीच से, ढेर सी सुप्रभात और ग़ुड मोर्निंग की बीच वह आया, तेज़ी से  मेरे पैर छुये और छूते ही बोला “अस्सलामो अलैकुम” मैं जो उसे डांटने के लिये मुह खोलने वाली थी, आवाक रह गयी थी. नही आया था वह...नही मनाया था उसने गणतन्त्र दिवस .....नही समझ आते थे उसे भाषण....परे था वह बडी बडी बातों से.....मगर मैंने देखा, परहेज़ नही था उसे रब के किसी भी नाम से .....नही बनाता था वह दोस्त ज़ात और समाज देख कर, और पक्का ब्रहम्म्ण होकर भी देखा था मैंने उसे सब के साथ, एक टिफिन से खाते हुए....सुना था कि चोट लगने पर सबके साथ शामिल रह्ता है वह, सबके दुखदर्द में .....और बडे बडे मुल्कों की बडी बडी वारदातें भी नही डिगा पाती उसे मोहब्ब्त करने से. मेरे हिंद का प्यारा बच्चा!!!  
      अक्सर लोग मुझे बडे सलीक़े से सलाम करते हैं मगर ज़हन उनके सलाम को सुन  भी नही पाता ... आज  जब उसने पैर छुए लगा कोईं कह रहा है, “ सलामती हो तुम पर और रब की रहमत”.
      मुझे उस पर बेसाख्ता प्यार आने लगा. जानती थी एक मासूम सा झूठ बोलेगा वह. “सर में दर्द था  इसी से कल नही आया”  उसका कहना था कि मैं खुद से बाहर आई. मैं मुस्कुरा दी , गोयां कह रही हूं, तुम्हारे इस मासूम झूठ पर मेरे लाखों सच क़ुर्बान.
      गुस्सा क्या करूं, वह तो जानता है कि गणतंत्र के प्रति उसकी जवाबदारी क्या है! सब पीछे छूट गया ...ज़हन में बशीर बद्र साहब का एक शेर गून्ज रहा था:
“ बुत भी रक्खें हैं, नमाज़ें भी अदा होती हैं

दिल मेरा दिल नही, अल्लाह का घर लगता है...” 

रविवार, 22 जनवरी 2017

तुम भी पहले पहल , हम भी पहले पहल

            



             सुबह सुबह दरख्तों में पानी डालने गयी, क्या देखती हूँ, नंन्हे से गुलाबी गुलाब में ताज़ा मोतिया फूल अपनी ख़ुशबू बिखेर रहा है. पूरी बगिया रोशन हो गयी उसकी महक और खूबसूरती से.  दो पल को लगा परिस्तान से कोईं शहज़ादी उतर आयी हो, और मेरे फूल का भेस बदल मुस्कुरा रही हो. खुदाया!! दिल बेवजह खुश हो आया।  मैंने तो नहीं लगाया था यह गुलाब।  इस बारिश खुद ही पनप आया नीम की क्यारियों में। ज़हन पर बहुत ज़ोर डाला तब याद आया कि  पिछली शबेकद्र रूमान जब भैया मियाँ के साथ बडे अब्बू की क़ब्र पर फातिहा पढने गया  था तब वहीँ  से टहनी समेत तोड़ लाया था एक गुलाब. और खेल खेल में ज़मीन में खोंस ,अपनी छुट्टियां पूरी कर वापिस शहर को भी आ गया था।  कितना खुश होगा जानकर 'उसके लगाए पहले दरख्त का पहला फूल'।
                  कमबख्त ये पहला!!! मुझे जाने क्या क्या पहला पहला याद आने लगा. समीना बाजी के लिए फ़ारूक़ भाई ने जो लाल फूल हमें बच्चा समझ के हमारे ही हाथों भिजवाया था वह, या सुवर्णा ताई को पराग भैया ने जो ताज़ा तरीन फूल दिया था वह, मदरसे की सीढ़ियों  पर फरीदा ने जो सुर्ख़  फूल लजाते हुए, मेरे भाई साहब के लिए दिया था वह, या स्लेट पर उसी का लिखा पहला आई लव यू  जिसमे  "यू" में मात्रा भी गलत लगी थी। पहली बार खरीदी गयी डायरी, पहली बारिश में पहली बार भीगना, पहली बार साइकल चलाने पर गिरना, या पहली पहली लूना से पहला पहला एक्सीडेंट। पहला पहला कितना गुदगुदाता सा लगता है , जैसे अभी अभी ही हो कर गुज़रा हो.

                    पहली बार जब नानी के दरख्तों से अमरुद तोड़ खुद खाया था.  नए नये फ्रिज की पहली पहली बर्फ़ , जो खाई भी थी और पड़ोस की पिंकी बाजी के कुर्ते में चुपके से डाल भी दी गयी थी. पहले पहले ब्लैक एंड व्हाइट टी. वी.की पहली फिल्म , "दुनिया ना माने " और कलर टी वी की " संजोग " पहले  मिल्कमेड से बने पहले नारियल लड्डू और जी बाज़ार पर तो इस पहले पहल  का यूं ज़ोर था कि " पहला पहला लांच किया वनस्पति घी आज भी " डालडा " ही कहलाता है , पहली पहली स्टोरवेल जो गोदरेज थी आज भी आधे हिंदुस्तान की जुबां पर " गोदरेज की अलमारी "  के रूप में ही याद की जाती है और वाशिंग पाउडर का यह आलम है कि उसका तो नाम ही "सर्फ़" पड गया है  और जी ! कितना अरसा भारत की सारी मोटर साईकल " राजदूत " ही कहलाती रहीं और  एक से एक अंग्रेज़ी नामो की क्वाइल्स आ जाने के बावजूद भी , मच्छर ,मारने की अगरबत्ती को लोग "कछुआ" ही कहते रहे. 

                   गादियां चाहे किसी और कंपनी की हों , " डनलप" वाली ही कहलाती हैं, दांत मांजने का काला मंजन चाहे  हाथी छाप हो  कहलाता " बिटको " ही है ; जलने पर आप कुछ भी लगाएं नाम उसका " बरनाल"  ही  निकलता है, और बर्तन चाहे जिससे  धोएं , जब पाउडर ख़त्म होता है,  माँ याद दिलाती है, "विम"  ख़त्म हो गया है. वक़्त कैसे गुज़रे सफहों सा ही फड़फड़ा जाता है जब  याद आता है, " पहली पहली स्कूटर जब एक दिवाली घर के दरवाज़े आकर रुकी तो उपाध्याय आंटी की आरती थाली से भी पहले हम बच्चों ने जो गाकर  उसका इस्तक़बाल किया था वह गाना था , " हमारा बजाज......"" ये कोईं बड़े ब्रांड नहीं , पर  ज़िंदगी में पहले पहल आये वह बदलाव थे  जो चुपके से ज़हन में दाखिल हो गहरा असर कर जाते थे  , जो कीमतों से नहीं एहसासों से याद आते थे और जो टी वी  पर आने वाले इश्तेहार ही नहीं थे बल्कि हमारी ज़िन्दगी के सुख दुःख के बराबर के शरीक थे .

                       पहली बार नसीम बाजी ने मुझे चाँद रात पर चूड़ियां पहनवाई थीं, और एक ईद पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि मैं भी एक लड़की हूँ, जब पहले पहल ही उसने मज़ाक में ही मुझे छेड़ दिया था कि " जी साहब ! चूड़ियां आपने पहिनी और हम रात भर इनकी खनखन सुनते रहे "  यूनिवर्सिटी की सीढ़ियों पर बेवजह बैठ वह पूरी ईद सिवैयों  का इंतज़ार करता रहा और मैं अंजना के घर पढने जाने के बहाने  पूरा दिन उसी कैम्पस में मधुकामिनी की टहनियों  में दुबकी  डिब्बा लेकर बैठी रही मगर देने की हिम्मत नहीं जुटा पायी।  अगले दिन दोनों ने एक दूसरे से कहा , " छुट्टी थी , भला कैसे आते "  वह दौर ही ऐसा था , माकूल वक़्त का इतंज़ार करते करते माशूका और आशिक़ अस्पताल की सीढियो पर ही मिलते थे जंहा आशिक़ अपनी बीवी की डिलेवरी के लिए आता था और माशूक़ा अपने शौहर के साथ अपनी ड्यू डेट पूछने। जो अटका रह जाता था वह सिर्फ एक अहसास था..... वही पहले पहल वाला।        

                 मैंने देखा और खूब गौर से देखा। गुलाब का वह फूल जिस नंन्हे पौधे में  लगा था वह बेचारा इसका वज़न भी नहीं बर्दाश्त कर पा रहा था. इतना ही बोझ बड़ी अम्मी पर  डाल , बेचारे बड़े अब्बू अपने दूधमुंहे बच्चे को छोड़ अल्लाह को प्यारे हो गए थे. सुनते हैं, बड़ी अम्मी उस उम्र में बेवा हुईं थीं जिस उम्र में आजकल लड़कियों  के निकाह भी नहीं होते।  सब ने खूब कहा तीन बच्चे छोडो और दूसरा निकाह कर लो. पर बड़ी अम्मी ने एक न सुनी। पढ़ लिख अपनी नौकरी कर , अपने बच्चो को पाल बड़ा कर दिया और आज दादी बनी बैठी हैं.  एक बार मैंने कहा बड़ी माँ! आपने दूसरा निकाह क्यों न किया, बोलीं " पहला तो पहला होता है" और ऐसे लाल हो गयीं जैसी आसपास ही कहीं बड़े अब्बू बैठे हों।  साल गुज़र गए इस गम से खानदान उबार नहीं पाया।  "दादी अम्माँ " उस ज़माने की बेहद बोल्ड लेडी  और बेहद दबंग भी,  वह भी इस गम से उबार नहीं पाईं थी. किसी फतवे को नहीं मानती थीं वह . (क़ब्रिस्तान  में औरतों  के जाने पर लगी पाबंदी को भी ) अक्सर हम  बच्चो की  अंगुली थाम , नदी के परले सिरे पर बने कब्रिस्तान  में  ले जाया करती और घंटो अपने बेटे की क़ब्र पर बैठा करती थी।  (एक गर्मी उन्होंने ही यह गुलाबी गुलाब बड़े अब्बू की क़ब्र पर लगाया था।)  पूछने पर कहतीं , " मेरा लाल, मेरी पहलौठी का था , उसी ने पहले पहल माँ बोला था मुझे।  पंद्रह  बरस की थी जब वह हुआ था , दुःख सुख सब में मुझसे लगा हुआ....... जाने कब बड़ा होगा उसका बेटा------  जाने कब उसकी नस्ल फलेगी.. ........ 

                  दादी अम्मा को गुज़रे अरसा हुआ. बड़े अब्बू के बड़े बेटे के घर रूमान हो गया। पर राज़ की बात बताऊँ........ हमारी नस्ल में  " राजा " नाम उसी को मिला जो घर का पहला बच्चा था यानि  दादी की सबसे पहली पोती, मेरी सबसे बड़ी बहिन ,  जो मेरे सर पर बैठ ऊंचे सुरों में गुनगुना  रही है , " तुम भी पहले पहल , हम भी पहले पहल ........."