रविवार, 25 मार्च 2018

ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है : फ़ारूख़ शेख़ (यादें)




      बरोडा, ग़ुजरात के पास एक छोटा सा गांव अमरोली; उसके नन्हे से क़स्बे की बडी सी हवेली का ज़नाना, जिसमे दर्दे ज़ेह से करहाती “फ़रीदा बेगम” और पेहलौठी के बच्चे का इंतेज़ार करते मुम्बई से वकालत पढ कर आये जनाब मुस्तफ़ा शेख़. दोनो ही इस बात से अंजान कि अल्लाह एक के बाद एक पांच औलादे-नरीना अता करेगा पर यह जो पहला है उसकी सादगी, “उसकी शान”  बन कर हिंदुस्तान की सिनेमाई दुनिया पर नूरो अम्बर का एक शामियाना तान देगी. 25 मार्च 1948, ग़ुलाम हिंदोस्तान की जद्दोजहद के बीच खुलता आज़ादी का दरवाज़ा और उसी देह्लीज़ पर हिंदी सिनेमा को सौगात में मिला फारूख़ शेख़ का वुजूद जब आंखो के आगे रक़्स करता है तो  लगता है गहरी गहरी आंखो से किसी का सच धीमे धीमे झांकता हुआ रूह में घुल रहा है, अदाकारी की प्यास पर कलाकारी के ठंडे ठंडे छींटे मारता रूह को सरापा एक नग़मे से सरबौर कर गुनगुनाता, “आजा रे! आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा....”
             हिंदी सिनेमाई दुनिया में “किचन सिंक ड्रामा” की थीम और “एंग्री यंगमन” वाले किरदारों की बीच फ़ारूख़ की अदाकारी अपनी एक अलग पह्चान रखती है. उनके चाहने वाले आम लोगों के बीच बहुत ख़ास होते हैं और जब बज़्म मे उनका ज़िक्र आता है तो जैसे गिनती हमेशा से ही पलट जाती है, एक ऐसा चुम्बक काम करता है जो मक़नातीसी जादू से अपनी तरफ़ खींचता सा लगता है और एक आम आदमी के ख़्वाब, एक आम आदमी की मज्बूरी और एक आम आदमी की कमियां पर्दे पर जीते जीते ही फ़ारूख़ अदाकारी की एक नई इबारत गढते हिंदी सिनेमा के अल्हदा रंग की पह्चान बन जाते हैं. चश्मेबद्दूर का सिद्दार्थ पाराशर हो या साथ साथ का अविनाश वर्मा’, कथा का राजाराम हो या किसी से न कहना का रमेश त्रिवेदी अलग अलग किरदारों को अलग अलग अंदाज़ मे जीती फ़ारूख़ की शख़्सियत अदाकारी की सादगी  और ताज़ापन हिंदी सिनेमा की थाली में कुछ यों परोस कर रख देती है कि आंखे उसे दुहरा दुहरा कर देखने को मजबूर हो जाती हैं. मेरा दामाद, लिसन अमाया, नूरी, रंग बिरंगी, क्लब 60, और भी न जाने कितनी यादें...जिनके   रंग पुराने नही पडते वे धीमे धीमे फैल कर गुलाल हो जाया करते हैं. 
                 
                        शौक़िया तौर पर थियेटर करते हुए फारूख़ ने क्रिकेट को अपना पह्ला प्यार माना था. पत्नी रूपा उनका दूसरा प्यार. बेशक फारूख़ का एक्टिंग बतौर करियर एक इत्तेफाक़न लिया गया फैसला था जिससे इनके अम्मी अब्बू बहुत खुश नही थे पर किसी क़िसम का गुरेज़ भी नही..बस एक फितरत थी जिसने हमेशा से कुछ अलग करने को उकसाया. यही वजह थी कि सेंट ज़ेवियर्स का बैक बेंचर और सेंट मैरीज़ का लेक्चर बंक कर कैंटीन मे बैठनेवाला और ज़िंदगी को जुरआ जुरआ पीने वाला, गहरी आंखो वाला यह नौजवान वकालत की मंज़िलों का रास्ता रास्ते में छोड   अपनी फ़ितरतों की ज़िद मान बैठा और ऐसे ही ज़िद्दी और कुछ अलग कर गुज़रने वाले लोगों ने हिंदी सिनेमा को मैन- स्ट्रीम-सिनेमा से निकाल एक नया सिनेमा दिया जो आगे चल कर “समानांतर सिनेमा” कह्लाया. उन दिनो जापान और फ़्रांस के एक्पेरिमेंटल नज़रिये ने हिंदी सिने जगत पर ख़ासा असर डाला था और सत्यजीत रे, मृणाल सेन और ऋत्विक साहब की हाथों बंगाली सिनेमा बेहद खुश्नुमा रूप ले रहा था बस उसी फिज़ा में सांस लेते हुए फारूख साहब के फन्ने अदाकारी ने अपने रंग बिखेरने चालू किये और नतीजतन “आर्ट-मूवीज़” का ज़ायक़ा हिंदी ज़हन आज तक फ़रामोश नही कर सका.

     फारूख़ के करियर की पह्ली फिल्म ग़र्म हवा एक मील का पत्थर थी पर इसी  फिल्म ने जनाब सत्यजीत रे साहब को फारूख के बेशुमार टेलेंट का अंदाज़ा करवाया था और उनके खाते में शतरंज के खिलाडी जैसी फिल्म आन गिरी थी. उपन्यास सम्राट की क़लम से तह्रीक़  हुई इस कहानी में किरदार के साथ इंसाफ एक बडा ही मुश्किल काम था. फ़ारूख़ साहब ने इसे एक चैलेंज की तरह लिया और बेहद सधे अंदाज़ की अदाकारी से ना केवल सिने प्रेमियों के बल्कि अदाकारी से मोहब्बत रखने वालों के भी दिल में घर कर लिया. अदाकारी की रफ़्तार का आलम तो फिर सब जानते ही हैं .. दिल पर हाथ रख कर कहिये जनाब! रमोला को कचोरियां थमा “सुफ़ैद नही तो काला, पीला, लाल कोई भी झूठ बोल देना! पर बोल ज़रूर देना:” वाले रमेश बाबू को आप भूल पाये हैं! या चश्मेबद्दूर के “प्यार, लगावट, प्रणय, मोहब्ब्त” के बोल पर थिरकते, बाइक पर ट्रिपलिंग़ मारते सिद्धार्थ को आपने दिल से नही चाहा!!!

      फारूख साहब का ज़िक्र हो और "नूरी", "बाज़ार" और "उमरावजान" ज़हन के दरवाज़े पर दस्तक न दें, ऐसा भला हो सकता है! शहरयार साहब का कलाम और ख्य्याम साहब की मौसिक़ी के बीच फारूख की अदाकारी!!! रेखा जैसी बेहद ग्लैमरस ऐक्ट्रेस के पह्लू में बैठे नवाब सुल्तान (फारूख़ साहब) और मकालमे के नाज़ो अंदाज़: “किस किस तरह से मुझको ना रुस्वा किया गया/ ग़ैरों का नाम मेरे लहू से लिखा गया ....” निगाहों की बेबसी से बयां होती कल्बी कश्मकश और “तशरीफ़ लाइये हुज़ूर! और आइये हुज़ूर” के बीच ज़ाहिर एक नौसिखिया नवाब की झिझक से लबरेज़ एक जुमला, “हम कोठों पर कभी नही आते” जवाबन उमराव की शरारत “अब हम ऐसे बुरे भी नही” में दिया गया निहायत भोला नवाबी एक्सप्रेशन. लिल्लाह!!! कितनी फ़ारूखियत टपकती है इस सीन में! इतनी की ख़ुद फ़ारूख साहब अदाकारी का दूसरा नाम हो उठते हैं, देखिये तो ज़रा:
फ़ारूख़ (सुल्तान नवाब) : कल रात का नशा तो उतरा ही नही, ऐसा मालूम होता था
जैसेआप हमारे लिये ही गा रही हों  
उमराव:  लीजिये भला! और वहां आपके जैसी शायरी और मौसिक़ी की समझ रखने वाला था ही कौन!
फ़ारूख़ (सुल्तान नवाब) : (कोठे वालियों की जुमलेबाज़ी से नाआश्ना नवाबियत के तेवरों से बेख़बर एक बेहद मासूम इंसान की तरह) जल्द्बाज़ी मे हम दाद देना ही भूल गये
उमराव: इससे बडी दाद क्या होगी कि कोईं दाद देना ही भूल जाये     
कितना इंसाफ किया था नवाब साहब के किरदार से फ़ारूख साहब ने कि आज तक यादें ज़हन पर ताज़ा हैं! नवाब ही क्यों क्या आप बाज़ार  के “सर्जू” को फ़रामोश कर पाये हैं! नही न!!! जाने दीजिये दास्तान तवील है और ज़ेहन मे अपनी मासूमियत समेटे फारूख साहब का तसव्वुर अपने पूरेपन पर “ फिर छिडी रात बात फूलों की.....”
हाँजी जनाब!!  ये वे लोग थे जिनका रास्ता अलग था, जो भीड नही थे, जिनका तस्व्वुर कुछ ऐसा था जैसे सेहरा में रात फूलों की.....” इंतेक़ाल के बाद जिनकी सालगिरह यादों की काफूर जैसी महक उठाकर हाल से माज़ी में पटक देती है.....सालगिरह की मुबारकबाद दिये जाती हूं चुल्हे पर रखे दूध मे उफान आ गया है और आंखों से भी दो बूंदे झलक गयी हैं , बतौर ख़िराजे अक़ीदत.....      

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

गणतन्त्र दिवस ....अमर रहे....


      
कल ही लम्बे चौडे भाषणों का सिलसिला तारी हो गया था, सभी को इस दिन का महत्व भली भांति समझा दिया गया था...खूबसूरती से बताया था कि सभी को आना है, और गणतन्त्र दिवस के कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान देना है.
      मैं! जो भाषा के साथ नैतिक शिक्षा भी पढाती हूँ, उसे बखूबी जानती थी और यह भी जानती थी कि वह नही आयेगा. सच कहूं तो उसकी रग रग से वाक़िफ थी मैं .‘यथा नाम तथा गुण सा प्रतीक तो वह था ही, मगर निरा अपनी उम्र का प्रतीक. बहुत मेधावी नही, मगर बहुत बुरा भी नही. बहुत ध्यान देने वाला भी नही तो निरा बेध्याना भी नही. पढाई में दिल दरूद ज़्यादा तो नही था, मगर बेदखलों में भी शुमार नही था.  हर हफ्ते गर्लफ्रैंड नही बदलती थी तो ऐसा भी नही था कि अब तक कोईं बनी ही नही. ज़िंदगी को लेकर बहुत ज़्यादा सीरियस नही तो बिल्कुल ग़ाफिल भी नही था. अपनी नस्ल के और नौजवानों का निरा प्रतीक. मगर एक बात थी. उसका हर चलन उसकी ही तरह निराला था. निरा मौलिक और अप्रसारित.
      अक्सर चलती क्लासों के नाखत्म सिलसिलों में या तो वह कैम्पस या कैंटीन से बरामद होता था या फूलों की किसी क्यारी के पास बैठा धूप सेंकता. एक दिन जब उसे बुला कर डांटा, तो कहने लगा था, “और तो मुझे कुछ पता नही, मगर आपको मुझसे उम्मीद है तो तोडूंगा नही! आपके सब्जेक्ट में बहुत अच्छे मार्क्स लूंगा. आपको नीचा नही देखने दूंगा मेडम!”
      सच कहूं तो मुझे उसके इस अल्हडपन पर बहुत ज़्यादा भरोसा था. वजह शायद उसकी शरीर मुस्कुराहट थी. या गम्भीर आखें नही जानती मगर मुझे भरोसा था कि आने वाले कल में किसी बहुत पैसे वाली जगह बरामद होने वाले कुछ लोगों की फेह्रिस्त में वह भले ही शामिल ना हो, वह उन लोगों मे ज़रूर मिलेगा, जो बेहतरीन इंसान होते हैं और शायद अपने और अपने लोगो से जुडे हर दायित्व को पूरा करने वाले भी.
      बहुत ज़्यादा सौम्य, शिष्ट और होनहार बच्चों की मौजूदगी अक्सर अपना एह्सास खुद ही करवा देती है. कभी तो उनका अपना क्लासरूम रिस्पोंस. तो कभी अच्छे नम्बर. मगर कुछ बच्चे अपनी मौजूदगी के साथ अपने ज़ात समाज का एह्सास करवाना भी, “नैतिक शिक्षा की मैडम के प्रति अपनी एक आवश्यक ज़िम्मेदारी” समझते थे. किसी को अपने ब्रहम्म्ण होने पर दम्भ तो कोईं जैन होने पर मिटा जाता था. किसी को जैन में भी किसी के “समय्या” और खुद के और अधिक ऊंचे होने का दर्प तो किसी को “खान” होने पर किंग समझ लेने की नादानी. कहानी  कमोबेश एक ही जैसी थी और भावनाओं की तीव्रता भी लगभग एक सी ही. “गर्व से कहो...हम फलां है, और फख्र से कहो हम फलां हैं...” ऐसे में उनके अंदाज़ भी अलग अलग हो जाया करते थे. सुप्रभात, ग़ुड मोर्निंग, गुड ऑफ्टरनून से हठ कर “अस्सलामो अलैय्कुम, जय जिनेंद्र, जय शिव या जय नर्सिंह” जैसा भी कुछ हो जाया करता था और “सबका मालिक एक” अंदाज़ में सबके लिये मेरा जवाब बस एक मीठी सी मुस्कुराहट होती थी. मैं अक्सर देखती थी....जैन को जैन में, मुसलमान को मुसलमान में , पंजाबी को पंजाबी में , मराठी को मराठी में बडी तेज़ी से दिलचस्पी बढ रही हैलोग रंग, नस्ल और ज़ात के  आधार पर दोस्त बना रहे हैं…..मेरेखुदा! इंसान को इंसानियत सिखाने में मुझसे कहाँ चूक हो रही है कि मानस की चौपाई पढते वक़्त मैं अक्सर चप्पलें उतार, सर ढांक लेती हूँ, बिल्कुल ऐसे ही सबद, या जिनवाणी या क़ुरान का ज़िक्र करते हुए भी खुद ब खुद मुझसे हो जाया करता है...फिर???” फिर के अनबूझे रह्स्य को मैंने वहीं छोड आने वाले कल का सिरा थामना चाहा, “यह लडका कल तो ज़रूर मुझसे डांट खायेगा ही!  एक गणतन्त्र दिवस  के वक़्त ही काम याद आये इसे.”
      अगले दिन राह्दारी में मिला भी. बदस्तूर मॉस कम्यूनिकेशन के स्टूडेंट्स से घिरी मैं! सबके बीच से, ढेर सी सुप्रभात और ग़ुड मोर्निंग की बीच वह आया, तेज़ी से  मेरे पैर छुये और छूते ही बोला “अस्सलामो अलैकुम” मैं जो उसे डांटने के लिये मुह खोलने वाली थी, आवाक रह गयी थी. नही आया था वह...नही मनाया था उसने गणतन्त्र दिवस .....नही समझ आते थे उसे भाषण....परे था वह बडी बडी बातों से.....मगर मैंने देखा, परहेज़ नही था उसे रब के किसी भी नाम से .....नही बनाता था वह दोस्त ज़ात और समाज देख कर, और पक्का ब्रहम्म्ण होकर भी देखा था मैंने उसे सब के साथ, एक टिफिन से खाते हुए....सुना था कि चोट लगने पर सबके साथ शामिल रह्ता है वह, सबके दुखदर्द में .....और बडे बडे मुल्कों की बडी बडी वारदातें भी नही डिगा पाती उसे मोहब्ब्त करने से. मेरे हिंद का प्यारा बच्चा!!!  
      अक्सर लोग मुझे बडे सलीक़े से सलाम करते हैं मगर ज़हन उनके सलाम को सुन  भी नही पाता ... आज  जब उसने पैर छुए लगा कोईं कह रहा है, “ सलामती हो तुम पर और रब की रहमत”.
      मुझे उस पर बेसाख्ता प्यार आने लगा. जानती थी एक मासूम सा झूठ बोलेगा वह. “सर में दर्द था  इसी से कल नही आया”  उसका कहना था कि मैं खुद से बाहर आई. मैं मुस्कुरा दी , गोयां कह रही हूं, तुम्हारे इस मासूम झूठ पर मेरे लाखों सच क़ुर्बान.
      गुस्सा क्या करूं, वह तो जानता है कि गणतंत्र के प्रति उसकी जवाबदारी क्या है! सब पीछे छूट गया ...ज़हन में बशीर बद्र साहब का एक शेर गून्ज रहा था:
“ बुत भी रक्खें हैं, नमाज़ें भी अदा होती हैं

दिल मेरा दिल नही, अल्लाह का घर लगता है...” 

रविवार, 22 जनवरी 2017

तुम भी पहले पहल , हम भी पहले पहल

            



             सुबह सुबह दरख्तों में पानी डालने गयी, क्या देखती हूँ, नंन्हे से गुलाबी गुलाब में ताज़ा मोतिया फूल अपनी ख़ुशबू बिखेर रहा है. पूरी बगिया रोशन हो गयी उसकी महक और खूबसूरती से.  दो पल को लगा परिस्तान से कोईं शहज़ादी उतर आयी हो, और मेरे फूल का भेस बदल मुस्कुरा रही हो. खुदाया!! दिल बेवजह खुश हो आया।  मैंने तो नहीं लगाया था यह गुलाब।  इस बारिश खुद ही पनप आया नीम की क्यारियों में। ज़हन पर बहुत ज़ोर डाला तब याद आया कि  पिछली शबेकद्र रूमान जब भैया मियाँ के साथ बडे अब्बू की क़ब्र पर फातिहा पढने गया  था तब वहीँ  से टहनी समेत तोड़ लाया था एक गुलाब. और खेल खेल में ज़मीन में खोंस ,अपनी छुट्टियां पूरी कर वापिस शहर को भी आ गया था।  कितना खुश होगा जानकर 'उसके लगाए पहले दरख्त का पहला फूल'।
                  कमबख्त ये पहला!!! मुझे जाने क्या क्या पहला पहला याद आने लगा. समीना बाजी के लिए फ़ारूक़ भाई ने जो लाल फूल हमें बच्चा समझ के हमारे ही हाथों भिजवाया था वह, या सुवर्णा ताई को पराग भैया ने जो ताज़ा तरीन फूल दिया था वह, मदरसे की सीढ़ियों  पर फरीदा ने जो सुर्ख़  फूल लजाते हुए, मेरे भाई साहब के लिए दिया था वह, या स्लेट पर उसी का लिखा पहला आई लव यू  जिसमे  "यू" में मात्रा भी गलत लगी थी। पहली बार खरीदी गयी डायरी, पहली बारिश में पहली बार भीगना, पहली बार साइकल चलाने पर गिरना, या पहली पहली लूना से पहला पहला एक्सीडेंट। पहला पहला कितना गुदगुदाता सा लगता है , जैसे अभी अभी ही हो कर गुज़रा हो.

                    पहली बार जब नानी के दरख्तों से अमरुद तोड़ खुद खाया था.  नए नये फ्रिज की पहली पहली बर्फ़ , जो खाई भी थी और पड़ोस की पिंकी बाजी के कुर्ते में चुपके से डाल भी दी गयी थी. पहले पहले ब्लैक एंड व्हाइट टी. वी.की पहली फिल्म , "दुनिया ना माने " और कलर टी वी की " संजोग " पहले  मिल्कमेड से बने पहले नारियल लड्डू और जी बाज़ार पर तो इस पहले पहल  का यूं ज़ोर था कि " पहला पहला लांच किया वनस्पति घी आज भी " डालडा " ही कहलाता है , पहली पहली स्टोरवेल जो गोदरेज थी आज भी आधे हिंदुस्तान की जुबां पर " गोदरेज की अलमारी "  के रूप में ही याद की जाती है और वाशिंग पाउडर का यह आलम है कि उसका तो नाम ही "सर्फ़" पड गया है  और जी ! कितना अरसा भारत की सारी मोटर साईकल " राजदूत " ही कहलाती रहीं और  एक से एक अंग्रेज़ी नामो की क्वाइल्स आ जाने के बावजूद भी , मच्छर ,मारने की अगरबत्ती को लोग "कछुआ" ही कहते रहे. 

                   गादियां चाहे किसी और कंपनी की हों , " डनलप" वाली ही कहलाती हैं, दांत मांजने का काला मंजन चाहे  हाथी छाप हो  कहलाता " बिटको " ही है ; जलने पर आप कुछ भी लगाएं नाम उसका " बरनाल"  ही  निकलता है, और बर्तन चाहे जिससे  धोएं , जब पाउडर ख़त्म होता है,  माँ याद दिलाती है, "विम"  ख़त्म हो गया है. वक़्त कैसे गुज़रे सफहों सा ही फड़फड़ा जाता है जब  याद आता है, " पहली पहली स्कूटर जब एक दिवाली घर के दरवाज़े आकर रुकी तो उपाध्याय आंटी की आरती थाली से भी पहले हम बच्चों ने जो गाकर  उसका इस्तक़बाल किया था वह गाना था , " हमारा बजाज......"" ये कोईं बड़े ब्रांड नहीं , पर  ज़िंदगी में पहले पहल आये वह बदलाव थे  जो चुपके से ज़हन में दाखिल हो गहरा असर कर जाते थे  , जो कीमतों से नहीं एहसासों से याद आते थे और जो टी वी  पर आने वाले इश्तेहार ही नहीं थे बल्कि हमारी ज़िन्दगी के सुख दुःख के बराबर के शरीक थे .

                       पहली बार नसीम बाजी ने मुझे चाँद रात पर चूड़ियां पहनवाई थीं, और एक ईद पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि मैं भी एक लड़की हूँ, जब पहले पहल ही उसने मज़ाक में ही मुझे छेड़ दिया था कि " जी साहब ! चूड़ियां आपने पहिनी और हम रात भर इनकी खनखन सुनते रहे "  यूनिवर्सिटी की सीढ़ियों पर बेवजह बैठ वह पूरी ईद सिवैयों  का इंतज़ार करता रहा और मैं अंजना के घर पढने जाने के बहाने  पूरा दिन उसी कैम्पस में मधुकामिनी की टहनियों  में दुबकी  डिब्बा लेकर बैठी रही मगर देने की हिम्मत नहीं जुटा पायी।  अगले दिन दोनों ने एक दूसरे से कहा , " छुट्टी थी , भला कैसे आते "  वह दौर ही ऐसा था , माकूल वक़्त का इतंज़ार करते करते माशूका और आशिक़ अस्पताल की सीढियो पर ही मिलते थे जंहा आशिक़ अपनी बीवी की डिलेवरी के लिए आता था और माशूक़ा अपने शौहर के साथ अपनी ड्यू डेट पूछने। जो अटका रह जाता था वह सिर्फ एक अहसास था..... वही पहले पहल वाला।        

                 मैंने देखा और खूब गौर से देखा। गुलाब का वह फूल जिस नंन्हे पौधे में  लगा था वह बेचारा इसका वज़न भी नहीं बर्दाश्त कर पा रहा था. इतना ही बोझ बड़ी अम्मी पर  डाल , बेचारे बड़े अब्बू अपने दूधमुंहे बच्चे को छोड़ अल्लाह को प्यारे हो गए थे. सुनते हैं, बड़ी अम्मी उस उम्र में बेवा हुईं थीं जिस उम्र में आजकल लड़कियों  के निकाह भी नहीं होते।  सब ने खूब कहा तीन बच्चे छोडो और दूसरा निकाह कर लो. पर बड़ी अम्मी ने एक न सुनी। पढ़ लिख अपनी नौकरी कर , अपने बच्चो को पाल बड़ा कर दिया और आज दादी बनी बैठी हैं.  एक बार मैंने कहा बड़ी माँ! आपने दूसरा निकाह क्यों न किया, बोलीं " पहला तो पहला होता है" और ऐसे लाल हो गयीं जैसी आसपास ही कहीं बड़े अब्बू बैठे हों।  साल गुज़र गए इस गम से खानदान उबार नहीं पाया।  "दादी अम्माँ " उस ज़माने की बेहद बोल्ड लेडी  और बेहद दबंग भी,  वह भी इस गम से उबार नहीं पाईं थी. किसी फतवे को नहीं मानती थीं वह . (क़ब्रिस्तान  में औरतों  के जाने पर लगी पाबंदी को भी ) अक्सर हम  बच्चो की  अंगुली थाम , नदी के परले सिरे पर बने कब्रिस्तान  में  ले जाया करती और घंटो अपने बेटे की क़ब्र पर बैठा करती थी।  (एक गर्मी उन्होंने ही यह गुलाबी गुलाब बड़े अब्बू की क़ब्र पर लगाया था।)  पूछने पर कहतीं , " मेरा लाल, मेरी पहलौठी का था , उसी ने पहले पहल माँ बोला था मुझे।  पंद्रह  बरस की थी जब वह हुआ था , दुःख सुख सब में मुझसे लगा हुआ....... जाने कब बड़ा होगा उसका बेटा------  जाने कब उसकी नस्ल फलेगी.. ........ 

                  दादी अम्मा को गुज़रे अरसा हुआ. बड़े अब्बू के बड़े बेटे के घर रूमान हो गया। पर राज़ की बात बताऊँ........ हमारी नस्ल में  " राजा " नाम उसी को मिला जो घर का पहला बच्चा था यानि  दादी की सबसे पहली पोती, मेरी सबसे बड़ी बहिन ,  जो मेरे सर पर बैठ ऊंचे सुरों में गुनगुना  रही है , " तुम भी पहले पहल , हम भी पहले पहल ........."  
     

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

फ़िनिक्स







अंजाम से  आग़ाज़  कर
उठ कर ज़रा परवाज़ कर

रख दे  परे   मायूसियां
तू ज़िंदगी को साज़ कर

ख़ामोशियां सरगम पे हों
नाकामियां परचम पे हों

तो ज़ीस्त भी खिलती नही
और मौत भी मिलती नही

उठ! तू ख़ुद की ख़ाक से ही 
तामीर-ए-ख़ुद  जांबाज़ कर 
सेहबा 

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

ईद मुबारक




             बहिनो! क्या  बताऊं, तुमसे बांट बूंट कर हल्की होना चाहती हूं: मियां मौलवी साहब की पांच बेटियां अस्मां, सीमा, रेशमा, गुड्डी, मुन्नी. अगले दिन ईद और मियां मौलवी साहब के पाजामे को टेलर मास्टर ने लम्बा कर दिया. मियां साहब ने अस्मा को बुला ताक़ीद की “ बिटीया!!! ज़रा अब्बू का पाजामा एक बालिश्त छोटाकर देना सुबह को ईद है”  “ अब्बू ! मेरा तो सूट नही सिला!! आपको पजामे की पडी है” मियांसाहब रेशमा के पास : “ बिटीया!!! ज़रा अब्बू का पाजामा एक बालिश्त छोटाकर देना सुबह को ईद है” “ अब्बू मुझे नही आता ये सब!”  मियासाहब सीमा के पास: “ बिटीया!!! ज़रा अब्बू का पाजामा एक बालिश्त छोटाकर देना सुबह को ईद है” बारी बारी हर बेटी ने मायूस किया. मियासाहब ने अशर्फी टेलर को चंद रुपये देकर काम निब्टाया. 

             पाजामा घर पर लाकर रखा और सोने की तैयारी. अस्मां अपने कपडों से फारिग हुई तो याद आया कि अब्बू के साथ कितना बुरा बर्ताव किया उसने.उसे अभी ही उठ कर माफी तलाफी करना चाहिये. अब्बूतो खैर सो भी चुके. रात भर पछतावे की आग मे जलने से बेहतर है, अभी ही मशीन लगा पाजामा एक बालिश्त छोटा कर दिया जाये. वह अब्बू जो उसके लिये हर वक़्त एक साये की तरह साथ रहे वह उनके साथ ऐसा कैसे कर सकती है!!. वह फौरन बिस्तर छोड भागी, अब्बू का पाजामा छोटा कर चैन की सांस ली और बिस्तर पर लेट गयी. सीमा, सबसे फारिग हो दिन भर की गुस्ताखियां याद करने लगी. अब्बू के साथ की गयी जब खुद की हरकत याद की तो अफ्सोस से जी भर गया अपने किये कराये के मलाल को कम करने के लिये फौरन बिस्तरे से परे हो उठी और सिलाई कमरे में रखे अब्बू के पाजामे को एक बालिश्त छोटाकर के ही दम लिया. अल्लाह!! बेटियां शायद इसी दिन के लिये अल्लाह की रेहमत समझी जातीं है, रेशमा को भी नींद कहां आने वाली थी!!!  ज़माने को सिल सिला के देती हूं लेकिन एक अपने अब्बू के कपडे ही नही सिल पा रही!!! वह फौरन बिस्तर छोड भागी, जल्द अज़ जल्द पाजामे को एक बालिश्त छोटा किया, और अपने एक अच्छी बेटी  होने के मुगालते में पानी डाल सोने वाले कमरे में चली गयी. गुड्डी मुन्नी क्यों पीछे रहती भला !! फौरन फौरन बिस्तर छोड भागी, दोनो ने बारी बारी एक एक बालिश्त कम कर अपने फरमाबर्दार होने का फर्ज़ निभाया और ग्रे कलर के खूबसूरत पाजामे को सही करने का  भरम पाल सोने के कमरे में आ गयी.


     ईद की सुबह. अब्बू फज्र की नमाज़ से फारिग हो अपना लिबास बदलने की तैय्यारी करते करते चिल्ला रहे थे “ अरे लड्कियों! मशीन पर रखी ग्रे चड्डी के  नीचे उसी रंग का पाजामा रखा था !!! क्य तुम में से किसी ने उसे देखा है??? “     

शुक्रवार, 24 जून 2016

पहला रोज़ा


    याद नही उम्र कितनी थी, पांचवे का इम्तेहान दिया था और अब तक रमज़ान में इफ्तारी खाने का ही लुत्फ उठया था कि रमज़ान के छट्वें रोज़े के दिन अम्मा दादी अम्मा के साथ लोगों की फेह्रिस्त बनाती बरामद हुईं. अप्रैल का महिना, ऐन मेरी सालगिरह के एक दिन पहिले. स्कूल अभी खुले नही थे, लिहाज़ा मदरसा और पेटिंग की क्लास के बाद चंग-अष्ट की मेह्फ़िलें और चम्पक, नंदन के साथ बीतती ख़ाली ख़ाली दुपहरें. बुज़ुर्गों के काम में ज़्यादा दख़लअंदाज़ी की इजाज़त तो थी नही सो पता भी नही था कि क्या होने जा रहा है. पडोस की रफ़ीक़ा ख़ालाजान के साथ दादी अम्मा जो जो मश्विरे कह सुन रहीं थी उससे तो यही अंदाज़ लगाया जा सकता था कि दूर दराज़ की किसी कुआंरी फूफीजान या ख़ालाजान की मंगनी ही होनेवाली है. तभी बडी अम्मा ने घुडका: “ज़्यादा इतराओ नही! कल तुम्हारा ही काम होगा” या अल्लाह! मेरी मंगनी!!! ख़ौफ के मारे कलेजा मुंह को आ गया! दूर दूर तक मोहब्ब्त लुटाते भाइयों के बीच कहीं भी दुल्हे की ख़ौफनाक तस्वीर का तस्व्वुर भी नही था, फिर ये मंगनी!!!! अंदर के बाग़ी तेवर कोई जवाब तलब करते इंसाफ की ज़ंजीर हिलाते इससे क़ल्ब ही अम्मा ने आकर बताया, “कल तुम्हारी सालगिरह भी है और पहिला रोज़ा भी.” जान में जान आयी मेरी. बक़ौल दादीअम्मा, “दिन भर भूखे भिनभिनाना तो मेरा ख़ास शगल था”, सो मुझे कोई ऐतराज़ नही था, फिर यहां तो पब्लिसिटी भी पूरी मिल रही थी, सो फख़्र से उडी उडी अडोस पडोस में भी गा आयी मैं! “ मेरा पहिला रोज़ा है, फ़लानी तुम भी आइयो और ढमाकी तुम भी आइयो”

       अगले दिन पूरे जोश से सेहरी में जगाया मुझे. नेहला धुला अम्मा ने नीली अम्ब्रेला फ्रोक के साथ पडोस की पिंकी बाजी की छोटी हुई पीली शल्वार पह्ना दी. (अस्ल में भाइयों के कपडों पर डाका डालने वाली उम्र की वजह से अभी ज़िंदगी में शल्वारों की घुसपैट शामिल नही हुई थी.) जल्द जल्द सेहरी खिला कर रोज़े की नियत करवाई गयी. बडी अम्मा ने ख़त्म- वक़्ते- सेहरी नाक दबा कर बडा सा ग्लास पानी का भी हलक़ मे उडैल दिया. और सेहरी का वक़्त खत्म हुआ. फज्र की अज़ान हुई, अम्मा ने नमाज़ के बाद क़ुरान हाथों में थमा दिया. यासीन पढते पढ्ते जम्हाइयों को दबा कर जल्द ही फारिग़ हो बिस्तर में लुडक गयी.

       एक नींद निकाली और जले पैर की बिल्ली की तरह आदतन बावर्चीख़ाने का रुख़ किया. “ अरी!! ये भूत की तरह यहां क्यूं मंडरा रही हो? रोज़ा है तुम्हारा!!!” बडी अम्मा ने डपटा तो ख़याल आया कि रोज़ा है. खिसियाती हुई बाहर आयी तो बाजी ने टोका, “अरे! मेहमान आ गये हैं! ज़रा मुंह धोकर कपडे बदल लो, नानीजान, मामूजान-मुमानी जान, चचा चची सब के सब लोग ही आते होंगे, जल्द कंघा लेकर आओ तो तुम्हारी चोटियां बना दूं”. मुझे बाजी का बाल खींच खींच कर चोटी बनाना सख़्त नापसंद था मगर उन्हें ना सुनने की आदत नही थी, अभी रोज़े में ही धुनककर रख देतीं सो मैंने चुपचाप चोटी करवाने को ही ग़नीमत जाना. इतने में अम्मा ने आकर बताया कि आज सब लोग मेरे लिये तोहफ़े और ढेर से कपडे भी लाने वाले हैं. मैं थोडी सी ख़ुश हो गयी. आज मुझे मेरी रोज़ की झाडू बुहारने वाली ड्युटी से भी छुट्टी मिल गयी थी. नानी के घर से लाये गये कपडे पहिन मैं फिर आंगन से कमरे, कमरे से छज्जे डोलने लगी. दिल में खयाल आया, रोज़ा है, कोई काम तो है नही, क्यूं न थोडी टीवी टावी ही देख ली जाये. प्लग लगाया ही था कि सीआईडी की तरह फिर बडी अम्मी नाज़िल, “अ‍री कम्बख़्त! रोज़े में टीवी नही देखते, रोज़ा मतलब नफ्स का रोज़ा. किसी  क़िस्म का कोई एंनटरटैनमेंट नही.” उनकी घुडकियां दिल पर ली भी ना थी कि सब के सब चचा, फूफा अपनी जतन से जमा की गयी बच्चों की फौज समेत हाज़िर. गुडिया गुडिया का शोर मचाते कोई चूमचाट रहा था तो कोईं मारे ख़ुशी के गले लगा रहा था. मेरा पूरा ध्यान साथ लाये तोहफों के झोलो पर था.

           दिन का दूसरा पहर चालू. सूरज ऐन सर के ऊपर. ज़ुहर की नमाज़ का वक़्त. मर्द हज़रात मस्जिद मे नमाज़ अदा करने गये. औरतों ने घर में पढी. नानीअम्मी का फरमान जारी हुआ, “ बाई! रोज़दार बच्ची को हवा में लिटा दो. चचियां, मुमानियां और फुफियां नमाज़ के बाद बावर्चीख़ाने में अम्मां की मदद करने लगीं.  नसीम आपा एक बडे से टोकरे में गर्मागरम पकौडे उतारने मे लगीं तो क़ुरैश आपा पापड तलाई को बैठ गयीं, मुहल्लेभर से झारे पल्टे मांग इफ्तारी की तैय्यारियां होने लगीं. पडोस की यास्मीन और तस्नीम बाजी पपिते और तरबूज़ काटने को मुक़र्रर हुईं और छम्मी आपा लगीं ख़्वान परातों की सफाई में.  हम उम्र सहेलियां घर के वाहिद कूलर ( जिसे दादीजान “भड् भड ख़ूंटा” भी कहती थीं )  के सामने मुझे लेकर बैठ गयीं. बबलीबाजी ने फौरन मेहंदी घोली और मेरे हाथ पैरों में बेलबूटे लगा डाले. हम उम्र लड्कियों बालियों को भी मेहंदी लगा वह किचन में गयी और मैं घडी की तरफ़ देख वक़्त का जायेज़ा लेने लगी. सारी सहेलियां ठंडी हवा मे सो पसर गयीं इतने में पडोस के बच्चे भी आगये. भाई लोगो मे पूछा, “रोज़ा तो नही लग रहा? बस चार पांच घन्टे और हैं फिर जी भर के खाना! बाहर तो सिर्फ तुम्हारे रोज़े की खुशी में ही शामियाने लगे हैं, टैरेस गार्डन की सफाई की है और जमातख़ाने से बडे बर्तन भांडे मंगवाकर गांव भर की दावत और रोज़ाकुशाई का इंतेज़ाम किया है. सुनते हैं दुल्हेभाई और बडी बाजी के ससुराल वाले तुम्हारे लिये नोटों का हार लाने वाले हैं!” मैं मारे खुशी के और फूल फैल गयी. दोपहर की नमाज़ में खूब दुआ की कि ऐ अल्लाह! तू मेरा रोज़ा क़ुबूल फरमा!

       दिन के चार बजने आये दोपहर ढलने की नमाज़ में थोडा वक़्त होगा कि पडोस के मेह्नाज़ और गुल्नवाज़ आ धमके. मुझे डाले गये हारों को बाजी ने क़रीने से एक ढेरी की शक्ल दे, चादर से ढांक दिया था. उन दोनो शैतानो की नज़र जब हार पर गयी तो गुल्गेंदे की पत्तियां  तोड वह उसके फूलों की नमकीन जडे खाने लगे. लो तुम भी खाओ, कहने की देर थी और मैं भी खाने लगी, एक जड खायी ही थी कि याद आया मेरा तो रोज़ा है! हाय अ‍ल्लाह !! अब क्या होगा!!! मेरे चेहरे के रंग उडते देख दोनो आंखे तरेरते हुए बोले, “ होगा क्या! तुमने रोज़ा तोड दिया है!! हम अभी सब से कह आते हैं शामियाने निकालो, तोहफे हमे दे दो, खाना पकाना बंद करो, भटियारों घर जाओ, इफ्तारी मुहल्ले पडोस में बांट दो, नोटोका हार फैंक दो कि लडकी रोज़ा तोड चुकी है!!!”

       मेरा दिल बैठ गया और मै ख़ुद का तस्सवुर कोर्ट मार्श्ल किये गये कैप्टन सा ही करने लगी. आंखो से आंसू की बूंदे छलक पडी और  जी में आया मैं ख़ुद्कुशी कर लूं. इतने में उन दोनो का बडा भाई “ शाहनवाज़”  जो उम्र में हमसे कोई साल दो साल बडा होगा आया और रोने का सबब पूछ्ने लगा. मै कुछ कहती उससे पहिले वह दोनो उसे नमक मिर्चे लगा सब कह गये. उसने गौर से सुना और मुझे समझा के कह्ने लगा, “जाओ! दौड कर गुस्लख़ाने मे जा कर कुल्लियां कर लो और तौबा कर लो, भूल में तो सब माफ़ है” मैं फौरन तौबा करती हुई गुस्लख़ाने की जानिब दौड गयी, वापस आयी तो दोनो शैतान फिर बोले, “ अ‍ॅल्लाह मियां  तो ठीक हैं , तुम दुनिया को क्या जवाब दोगी!!! हम अभी सब से बोल आते हैं!” शाह्नवाज़ ने आंखे तरैरी और बेंत दिखाते हुए उन्हें धमकाया, “ ख़बीसों! आज सुबह हदीस की क्लास मे आलिम साहब ने समझाया था न कि जो किसी के एक ऐब पर पर्दा डालेगा, अ‍ॅल्लाह आख़िरत में उसके ऐबों से पर्दापोशी कर उसे ज़लील होने से बचायेगा!!!” दोनो के दोने डर कर भाग ख़डे हुए.


       मगरिब हुई, मैंने गोटे टका नया सूट पहिना. लाल हाथों में चट मेहंदी रचायी, रोज़ा इफ्तारा गया, मुझे कपडे, खिलौने और तोहफे सभी कुछ मिले. खिलौने मैने शाह्नवाज़ को दिखाये और इफ्तारी के बचे हुए पापडों का टोकरा मैंने और शाह्नवाज़ ने कच्ची सीढियों पर साथ बैठ कर निबटाया.