रविवार, 11 अक्तूबर 2015

अपनी रुस्वाई.......


अपनी रुस्वाई तेरे नाम का चर्चा देखूँ 
एक ज़रा शेर कहूँ , और मैं क्या क्या देखूँ 

नींद आ जाये तो क्या महफिलें बरपा देखूँ 
आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहारा देखूँ 

शाम भी हो गयी धुंधला गयी आँखें मेरी
भूलने वाले, कब तक मैँ  तेरा  रास्ता देखूँ 

सब ज़िदें उसकी मैं  पूरी करूँ, हर बात सुनूँ
एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूं

मुझ पे छा जाये वो बरसात की खुशबू की तरह 
अंग अंग अपना उसी रुत में मेहकता देखूं

तू मेरी तरह यक्ताँ है मगर मेरे हबीब ! 
जी में आता है कोई और भी तुझसा देखूं 

मैंने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस एक बार
ख्वाब बन कर तेरी आँखों में उतरता देखूँ

तू मेरा कुछ  भी नहीं लगता मगर ऐ जाने हयात !
जाने क्यों तेरे लिए दिल को धड़कता देखूँ     

टूट जाएँ कि  पिघल जाएँ मेरे कच्चे घड़े 
तुझ को देखूँ  के ये आग का दरिया देखूँ   
                
                                                                  - परवीन शाकिर 



रविवार, 30 अगस्त 2015

अमृता प्रीतम को जन्म दिवस की शुभ कामनाएं



एक मुलाकात

मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी 
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……फिर समुन्द्र को खुदा जाने 
क्या ख्याल आया 
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी 
मेरे हाथों में थमाई 
और हंस कर कुछ दूर हो गया

हैरान थी…. 
पर उसका चमत्कार ले लिया 
पता था कि इस प्रकार की घटना 
कभी सदियों में होती है…..

लाखों ख्याल आये 
माथे में झिलमिलाये

पर खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर 
अब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?

मेरे शहर की हर गली संकरी 
मेरे शहर की हर छत नीची 
मेरे शहर की हर दीवार चुगली

सोचा कि अगर तू कहीं मिले 
तो समुन्द्र की तरह 
इसे छाती पर रख कर 
हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे

और नीची छतों 
और संकरी गलियों 
के शहर में बस सकते थे….

पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती 
और अपनी आग का मैंने 
आप ही घूंट पिया

मैं अकेला किनारा 
किनारे को गिरा दिया 
और जब दिन ढलने को था 
समुन्द्र का तूफान 
समुन्द्र को लौटा दिया….

अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है 
तूं भी उदासचुपशान्त और अडोल 
मैं भी उदासचुपशान्त और अडोल 
सिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है…..

गुरुवार, 18 जून 2015

बेइरादा नज़र मिल गयी तो.......


           " अल्लाहो बाक़ी!"  न ना !! ये उसका वहम  नहीं था , देख ही तो रहा था वह !!!  नाज़िश बेबाकी से उसके यों  घूरने को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी, एक सवा घंटा तो हो ही गया था उसे यूं  घूरते घूरते! कभी  दरवाज़े  डेवढ़ी  की ओंट  से देखे , तो कभी थम्बेली-चम्बेली  की ओंट  से. कभी आते जाते दबी दबी मुस्कराहट तो कभी खुल खुल के देखे। कभी होंटो को दाँतो से दबाये तो कभी मुस्कराहट छुपाने की कोशिश। उसका यूं अजीब अजीब नज़रों से देखना, ख़ुद नाज़िश को अजीब से एहसासों से भर रहा था, बार बार पर्स में रखे आईने को हीले बहाने से तांक वह ख़ुद पर रश्क़  कर रही थी  एक तो मुई उमर  सोलह , तिस पर फ़ीचर  भी क़यामत ही दियें  हैं अल्लाह ने !पर मैं  इतनी खूबसूरत हूँ  मुझे पता नहीं था दिल ही दिल में उसे खुद पर नाज़ हो रहा था. 

              "अफ़ज़ाल हसन " उस लड़की का भाई जिसे वह अपनी भाभी बनाने  के सिलसिले में देखने आयी थी लन्दन पलट था, बेहद हसीन -जमील और लेडी -किलर टाइप का. उसका इस तरह  मुस्कुरा कर देखना किसी भी लड़की को पागल बना सकता था , फिर नाज़िश तो एक बेहद ख़ुश -फ़हम  लड़की थी।  दिल ही दिल में उसका बावला हो जाना  लाज़िमी भी था, एक तो उम्र सोलह तिस पर  ख़्वाबों  के ख़रगोश ! "लिल्लाह!! ये क्या चाहता है " अपना आप छुप छुप के दरपन में देखती "वह " बिना बात लाल हुए जा रही थी , " शायद  मेरी आँखों पर मर रहा हो " उसने मुस्कुरा के  पर्स खोला और खुद को शीशे में देखा,  वाक़ई हैं भी मर मिटने लायक ! अपनी नरगिसी आँखों और मुड़ी मुड़ी पलकों पर निहाल हो गयी  वह।
                  "अरशी  हसन " वह लड़की जिसे वह अपनी भाभी बनाने को देखने आयी थी, एक सादा सी शख्सियत की घरेलू लड़की थी. अल्लाह मियाँ से अपना जोड़ा माँगते माँगते उम्र के अट्ठाईसवें में दस्तक देती न जाने कितनी दफ़े  मेहमानो के आगे नाश्ते की प्लेटें सजा -उठा चुकी थी। पढ़ी लिखी बेहद सलीक़े मन्द और ख़ुश-अखलाक़। अपने  भाई के बरक्स थोड़ी गन्दुमी।  उसकी सँवलाहट  उसके भाई की झल मारती ख़ूबसूरती के आगे अक्सर हैरतज़दा सवाल खड़े कर देती थी और लोग उसकी अम्मी से यहाँ  तक पूछ बैठते थे , " आपकी बिटिया अस्पताल में बदल तो नहीं गयी कहीं!"  "जी! आप पानी लेंगीं ?"  अफ़ज़ाल हसन ने अपनी शरारती आँखों को सीरियस बनाने की कोशिश कर नाज़िश के हाथ में ग्लास थमाया , "अल्लाह ! ये कमबख्त  तो मर ही मिटा है दिखे मुझ पर" नाज़िश ने फिर गुलाबी होकर  पर्स में रखा शीशा देखा और एक हाथ से ग्लास थाम लिया। 

               बड़े बुज़ुर्ग खानदान का जायज़ा ले रहे थे, औरतें और अम्मा लड़की के नोंक-पलक पर जमे हुए थे और नाज़िश ! इन सब से बेख़बर चोरी चोरी अफ़ज़ाल को देख रही थी,  अल्लाह ! कहीं ये लड़का जो मुझ पर सच में मर मिटा तो!  इस ख़याल से ही उसका जिस्म अजीब से जज़्बों से भर गया. तब तो ये मेरे लिए " वो " होंगे !  लाल लाल हो उसने दिल ही दिल में सोंचा। "आप तो बोर हो रही होंगी लाइए में टीवी ऑन कर देता हूँ , आप इस तरफ आ जाइए " वह उठ कर एक दो क़दम ही चली होगी की अफ़ज़ाल फिर उसे देख मुस्कुराने लगे , " ओह्ह! कहीं  मेरी पतली कमर का बल खाना , तो नहीं पसंद आ गया इसे !" नाज़िश दिल ही दिल में लजा रही थी, " न न!! मेरी चाल ही पसंद आयी होगी"  अल्लाह तूने मुझे इतना खूबसूरत क्यों बना दिया, जैसे ही दीवार पर लगे शीशे में उसने अपना आप निहारा , पीछे अफ़ज़ाल का मुस्कुराता चेहरा नज़र आने लगा , " अल्लाह! इतना मुस्कुरा रहा है , मुझे लगे भैया का हो न हो, मेरा हाथ ज़रूर अम्मी से मांग ही लेगा यह!" इतना सोंचना था कि  दिल बेसाख्ता धक धक करने लगा " कितनी बद्तमीज़ हूँ मैं ! यह तो मुझे अपने साथ लन्दन ले जाने की सोंच रहा है और मैं !! मुझे "इसे " इसे नहीं, "इन्हें " कहना चाहिए"   " जब से तुम जवान हो गए / शहर भर की जान हो गए " टीवी पर गाना आ रहा था।  " ये ठीक रहेगा " अफ़ज़ाल मुस्कुरा कर बोला  " अल्लाह मियाँ !!! दिल की बातें ग़ज़लों में कह रहें हैं" अबकी बार तो दुपट्टा अँगुलियों में लपेट ही बैठी नाज़िश। 

             "पता नहीं शायद मेरी आवाज़, या फिर मेरे सलाम करने का अंदाज़ या कौन जाने मेरे हौले से हिलना, या फिर शरमा के बैठना....क्या पसंद आया होगा इन्हें …हम तो हैं ही प्यारे" वह एकदम से ही " मैं " से "हम" हो गयी थी।  अल्लाह ! उसने शरमा के हौले से अफ़ज़ाल पर निगाह डाली,  अफ़ज़ाल उसके घुटनो की तरफ देख मुस्कुरा रहा था , "लिल्लाह! हमें लगे सोंच रहे होंगे कि  हमें शादी के बाद कहाँ रखेंगे " माथे पर पसीने की बूंदे पोंछ वह अपनी सोंच से पल्ला छुड़ाने लगी. 
"कौन जाने!  मेरे दाहिने टख़ने पर मौजूद तिल पर ही दिल आ गया हो " छुड़ाते छुड़ाते भी एक ख़याल  चिपक ही गया. उफ़्फ़ ! ये बेहया ख़याल !
दो मिनट को सबको अकेला छोड़ सारे लड़की वाले हीले- बहाने बाहर हो गए. " कैसी है " अम्मा ने दादी- अम्मी की तरफ सवालिया निगाहें फेंकी।  " सब  माफ़िक  का है, बस  ज़रा सांवली है !" दादी ने आहिस्ते से कहा। और इन सबसे बेखबर  नाज़िश सोंच रही थी , अम्मी उसके और अफ़ज़ाल के निकाह की दावत शहर के सबसे महंगे होटल में ही देंगी।  हनीमून के लिए अफ़ज़ाल ज़रूर मॉरीशस  ही पसंद करेंगे और जी ! बच्चों के नाम तो उनके अब्बू की तर्ज़ पर हिलाल और बिलाल ही रखे जायेंगे। 
                     " कहाँ  गुम  हो !" अम्मा ने नाज़िश  के कोहनी मारी तो वह एकदम अपने ख़याली  ससुराल से मैके  में आन गिरी। " क्या है !" बुरा सा मुँह  बना उसने अम्मा को तका। उसे अम्मा का यूं  कोहनी मारना ज़रा न सुहाया। " हम कहें कैसी है ?"  "हम्म ! " उसने एक मुतमईन सी सांस ली.  " सांवली नहीं लगी ??" अम्मा ने सवाल उठाया। " " लगी क्या! अच्छी खासी सांवली है बीवी!" दादी अम्मी ने जवाब लपका और दोनों ही नाज़िश की तरफ देखने लगीं। 

    " सांवली ! मतलब ना!,"  "ना मतलब दुबारा कभी अफ़ज़ाल को न देख पाना !!!" अल्लाह , लन्दन , मॉरीशस, रिसेप्शन , हिलाल बिलाल एक ही झटके में पूरी दुनिया ख़त्म थी , बी नाज़िश की ! " क्या कर रही हो अम्मी! दो ही रंग बनाये हैं अल्लाह ने गोरा या काला, इनका एजुकेशन देखिये, सलीक़ा देखिए, खानदान देखिए, घर देखिए, सफाई देखिये, अख़लाक़ देखिये !! आप भी ! कोई रंग देखता होगा आजकल, सबसे बढ़ कर  बहुत ही प्यारी लड़की लगी मुझे यह , हम कहें आप तो  बस्स !! " हाँ " कह दीजिये "  जोश जोश में तक़रीर कर डाली नाज़िश ने.
हर बार लड़की की रंगत पर बाज़ी पलटती नाज़िश को क्या हो गया , अम्मी की  अक़्ल  हैरत में थी।  
                                  "जी ! माशा अल्लाह से , हमें तो पसंद आ गयी  है, बाक़ी और बुज़ुर्गों से मश्विरा कर के जवाब देते हैं !"  दादी अम्मी ने लड़की वालों का दिल रखते हुए इजाज़त ली। सब उन्हें बाहर तक छोड़ने आये और गुलाब की महकती झाड़ियों की औंट  में बुला अफ़ज़ाल ने सबकी नज़रें बचा धीरे से नाज़िश के हाथों में एक चिट्ठी थमा दी।  जिसे बेहद शर्माते हुए लेकर नाज़िश ने पर्स में  डाल लिया ! "लिल्लाह ! कर ही दिया  प्रपोज़ !! मुझे तो पहले ही पता था, और कमी भी तो कुछ नहीं मुझ में ! बाक़ी  तो सब ठीक है , आख़िरी की तक़रीर  ने तो  जान ही डाल  दी होगी बन्दे में! अल्लाह ! इस ख़त  को तो जाते ही कलाम-ए -पाक में रख छोडूंगी, आख़िर  होने वाले बच्चों के अब्बू का पहला  ख़त  है " ऐसे ही ख्यालों में गुम कार घर  तक कब आन खड़ी हुई खबर तक न हुई।   "अरे भाई ! चाबी किसके पास है ?" बंगले के पास पहुँच  दादी अम्मी  भीतर दाखिल होने की जल्दी सी मचाई , नाज़िश को याद आया , जल्दबाज़ी में उसने अपने शलवार के नाड़े से उसे बाँध लिया था . फ़ौरन नाड़े से चाबी अलग कर उसने दादी अम्मी को थमाई। भट -भट्ट  करती तेज़ क़दमों से दादी जान के पीछे पीछे। कमरे की तन्हाई में जिगर थाम  के  चिट्ठी  खोली तो एक सांस में ही पढ़ , सर पकड़  रह गयी।  उसमे लिखा था : " बी! आप जो भी हैं ,माफी चाहूंगा , गैर इरादी तौर पर नज़र चली गयी ,  शार्ट कुर्ती से झााँकती आपकी नाड़ी और उसमे लटकी बाबा आदम के ज़माने  की चाबी आपको खासा मज़ाक का मौज़ू बना रहे हैं , कोई और हँसे इससे पहले , रब के  लिए उसे अंदर कर लीजिये " 
बेचारी नाज़िश ! अपने तसव्वुरात के बच्चों समेत , घड़ों पड़ते पानी में गोते  लगा ग़ुस्से ग़ुस्से  में चीख़  रही थी  " अम्मा ! लड़की वालों के घर इत्तिला कर दें , बुज़ुर्गों ने "  ना " कह दी है!"  
     
    


शनिवार, 13 जून 2015

बारिश हुई तो........





बारिश हुई तो फूलों के तन  चाक हो गए 
मौसम के हाथ भीग के सफ्फ़ाक  हो गए

बादल को क्या ख़बर है कि  बारिश की चाह में 
कैसे बुलंद-ओ -बाला  शजर ख़ाक हो गए  

जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें 
बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए 

लहरा रही है , बर्फ की चादर हठा  के घास 
सूरज की शह पे तिनके भी बेबाक हो गए

बस्ती में जितने आब गुज़ीदा थे, सब के सब 
दरिया का रुख़  पलटते ही तैराक हो गए
  
सूरज दिमाग़  लोग भी अब्लाग़ -ए -फ़िक्र में
ज़ुल्फ़ें -शब-ए -फ़िराक़  के पैचाक हो गए 

जब भी ग़रीब -ए -शहर से कुछ गुफ़्तगु  हुई 
लहजे हवा-ए-शाम के , नमनाक हो गए 
                                                      - परवीन शाकिर
सफ़्फ़ाक़ -साफ़ , आब गुज़ीदा -पानी से डरने वाले , अब्लाग- ए -फ़िक्र - फिक्रमन्द , पैचाक - घेरे, 

मंगलवार, 2 जून 2015

" ही" " शी" " इट "















​हे ईश्वर !
अगर तुम " ही "
 हो
तो पुरुषों के लिए हर्ष का विषय 
है
अगर " शी " हो तो
और भी अच्छा कि
जीवन और जीवन शक्ति दोनों
तुम से हैं
देखो!
मैं  तो डरती हूँ
नपुंसकता से, कायरता से
तुम्हारे कुछ नहीं रहने से
और उन बदलते ढंगों से
जिससे तुम
आहिस्ते -आहिस्ते
"इट " हो रहे हो
           - लोरी 

रविवार, 10 मई 2015

"अम्मा का घर अम्मा के बाद"


जगह जगह परछांई  सी है 
     अपने घर अँगनाई सी है 
             न होने के बाद भी अपने
                        पूरे घर पर छाई सी है 

हल्दी-मिर्ची , तेल -शकर सी,
        गंध में महके पूजा घर सी 
              पिछवाड़े से अगवाड़े  तक 
                           पूरी बसी- बसाई सी है

अजवाईन , तुलसी, पौदीना
         उसका आँचल झीना झीना
              भौर के राग में चिड़ियों के सुर 
                              वह घुलती शहनाई सी है
ठंडी रातें बिना अलाव 
     मन पर लगते घाव- घाव
           रूठ के सोयी नींद के ऊपर 
                 पड़ती गरम रज़ाई सी है 

  भण्डारे  के अंधियारे से 
        दालानों के उजियारे तक 
               ग़ौर  से देखो गयी नहीं वह
                      हर बच्चे में समाई हुई है 
                                                      - लोरी 


बुधवार, 6 मई 2015

मैं कौन हूँ





मोज़े  बेचती, जूते बेचती औरत  मेरा नाम नहीं 
मैं  तो वही हूँ 
जिसको तुम दीवार में चुन कर 
मिस्ले सबा बेख़ौफ़ हुए 
ये नहीं जाना 
पत्थर से आवाज़ कभी भी दब नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ 
रस्म व रिवाज़ के बोझ  तले 
जिसे तुमने छुपाया 
ये नहीं जाना 
रोशनी घोर अंधेरों से 
कभी  डर  नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ 
गोद  से जिसकी फूल चुने 
अंगारे और कांटे डाले 
ये नहीं जाना 
ज़ंजीरों से फूल की 
ख़ुश्बू  छुप नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ 
मेरी हया के नाम पर तुमने 
मुझको खरीदा, मुझको बेचा 
ये नहीं जाना 
कच्चे घड़े पे तैर के 
सोहनी मर नहीं सकती 
मैं  तो वही हूँ  जिसको तुमने डोली बैठा के 
अपने सर से बोझ उतारा 
ये नहीं जाना 
ज़हन ग़ुलाम अगर है 
क़ौम उभर नहीं सकती 
पहले तुमने मेरी शर्म-ओ-हया पे 
खूब तिजारत की थी 
मेरी ममता , मेरी वफ़ा के नाम पे' 
खूब तिजारत की थी 
अब  गोदों  और ज़ेहनों में 
फूलों के खिलने का मौसम है 
पोस्टरों पर नीम -बरहना 
मौज़े बेचती , जूते बेचती औरत मेरा नाम नहीं 
                                                             किश्वर नाहिद 

रविवार, 12 अप्रैल 2015

तुम्हारी आमद पर


मौसम -ए -वीरां का , बहक कर यूं शराबी होना 
तेरी आमद पे ' फ़ज़ा  का ,       यूं गुलाबी होना  

शहर का शहर ही , रक्साँ  है , तेरे इश्क़ में यूं तो 
उसपे पाँवों  में मेरे यार !         यूं गुर्गाबी  होना 

इश्क़ सचमुच  ही खुदा ही की रज़ा से है  रोशन 
सब पे अफ्ज़ा   नहीं  यूं ,   राज़े -शिहाबी होना
 
मैं  तो मुन्किर हूँ, कि  तुझ में ख़ुदा  पाया है   
आपने देखा यूं आबिद का       वहाबी होना!  

इश्क़ में कोई तो तासीर छुपी होती है सच्ची सी 
वरना दहकती सी तपिश का यूं  इंक़लाबी होना 

सोंच ये मोजज़ा बस  तेरी ही खातिर तो है जानां ! 
झुलसी सी तपिश रुत में  बारिश का नवाबी होना
                                                                     सहबा जाफ़री   
गुर्ग़ाबी - कांच के क़ीमती जूते , अफ्ज़ा - ज़ाहिर होना , मुन्किर- नास्तिक , वहाबी - इंकार करने वाला , मोजज़ा - करिश्मा , शिहाबी - प्रकाशमान 
                                                        प्रस्तुति : लोरी 

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

फ़रवरी



















कमरे में हर चीज़ 
अपनी जगह मौजूद थी 
सब ठीक ठाक था 
फिर भी 
यूं लग रहा था 
जैसे कोई चीज़ 
चोरी हो गयी है 
मैंने एक बार फिर 
कमरे का जायज़ा लिया 
अल्मारी और मेज़ के खानों में 
हर चीज़ ज्यों की त्यों रखी हुई थी 
लेकिन केलेंडर से 
अट्ठाइस के बाद की तारीख़ें 
चोरी हो गयी थीं 
- मोहम्मद अल्वी 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

कैसे कटे दिन हिज्र की धूप में



कितनी मुद्द्त बाद मिले हो, वस्ल का कोई भेद तो खोलो 
कैसे  कटे दिन हिज्र की धूप में, कैसे गुज़री रात तो बोलो 

क्या अब भी, इन रातों में ख़्वाबों के लश्कर आते हैं
क्या अब भी नींदों से नींदों पुल जैसे बन जाते हैं
क्या अब भी पुरवा कानो में गीत सुहाने गाती है 
​​क्या अब भी वह मीठी आहट, तुम्हें  उठाने आती है 

क्या अब भी छू जाती है , तुमको भरी बरसात तो  बोलो
कैसे  कटे दिन हिज्र की धूप में, कैसे गुज़री रात तो बोलो 
  
क्या अब भी सोते में तुम बच्चों से जग जाते हो 
क्या अब भी रातों में तुम देर से घर को आते हो 
क्या अब भी करवट करवट, बिस्तर की सिलवट चुभती है 
क्या अब भी मेरी आहट पर सांस तुम्हारी रुकती है 

क्या अब भी है लब पर अटकी , कोईं  अधूरी बात तो बोलो 
कैसे  कटे दिन हिज्र की धूप में, कैसे गुज़री रात तो बोलो 

क्या अब भी मेरी खिड़की से तेरी सुबह होती है 
क्या अब भी तेरे शीशे की धूप किसी को छूती है 
क्या अब भी होली के रंग में एक रंग मेरा होता है 
क्या अब भी यादों का सावन तेरी छत को भिगोता है 

क्या अब भी मेरे होने का,  होता है एहसास तो  बोलो
कैसे  कटे दिन हिज्र की धूप में, कैसे गुज़री रात तो बोलो
 
   
नींद से जागे नयन तुम्हारे, क्या आज भी बहके लगते हैं 
रजनीगंधा " मेरे वाले " क्या आज भी महके लगते हैं?
मुझको छू कर आने वाली हवा तुझे महकाती  है ?   
मेरी चितवन की चंचलता, नींदें तेरी उड़ाती है ? 

अब भी जाग के तारे गिनती होती है हर रात तो बोलो !
कैसे  कटे दिन हिज्र की धूप में, कैसे गुज़री रात तो बोलो 
                                                                         -सेहबा जाफ़री 

  
   

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

हैप्पी वैलेंटाइन डे



सहरा सहरा, गुलशन गुलशन गीत हमारे सुनियेगा 
याद बहुत जब आएंगे हम, बैठ के सर को धुनियेगा 

आज हमारे अश्क़ों से दामन को बचा लें आप मगर 
ये वह मोती हैं कल जिनको शबनम शबनम चुनियेगा 

हमसे सादा -दिल लोगों पर ज़ौक़े असीरी १ ख़त्म हुआ 
हम न रहे तो किसकी ख़ातिर , जाल सुनहरे बुनियेगा 

दिल की बातें तूलानी हैं, और ये रातें फ़ानी हैं 
मैं कब तक बोल सकूँगा आप भी कब तक सुनियेगा 

जिस 'सेहबा ' के दिल देने के क़िस्से से नाराज़ हैं आप
उसने आख़िर जान भी देदी , ये भी एक दिन सुनियेगा 
                                                       - सेहबा  अख़्तर   
१ -क़ैद का मज़ा 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

कश्मकश



आँखों में  अब न नींद है, सोएं किधर से हम 
ख्वाबों की रहगुज़र में , खोएं किधर से हम 

ख़ुशियों के जो शजर थे, ख़ाली थे, बेसमर थे
इस रुत में नए आसरे , बोयें किधर से हम 

टूटे हैं इस क़दर कि, खाली हैं अब तो आँखें 
आंसू में तेरा दामन, भिगोएं किधर से हम 

चाँद के बरक्स ख़्वाब, बढ़ते ही ढल गए 
टूटी हुई आरज़ूएं , पिरोएँ किधर से हम 

शब के अगर क़रीब हों, तो चाँद भी मिले 
शब के मगर क़रीब होएं , किधर से हम 

सिलसिलए- परिशानिये- हयात देखिये 
ये सोंच मुस्कुराएं हाँ, की रोएँ किधर से हम 

                                                       सहबा जाफ़री 

रविवार, 25 जनवरी 2015

धड़कनों के सम पर मुहब्बतों के सुर : माण्डव

कपूर तालाब 
वक़्त कैसा भी हो इसकी ख़ासियत  है, यह ठहरता नहीं, गुज़र जाता है. गुज़र कर कभी अफ़साने की शक्ल ले लेना , कभी गीत हो जाना, कभी एक ठंडी सी सांस लेकर, किसी अनकहे जज़्बे सा ही चमक कर बुझ जाना इसकी तासीर है.  इसी तासीर को हवा देने के लिए शायर गज़लें लिखते हैं और मुसव्विर अपने कैनवास को आवारा रंगों से भर देते हैं ; भले आदमी और पुजारी मंदिरों और मस्जिदों की तामीर करवाते हैं और राजे-रजवाड़े महल -दुमहले।  वक़्त, एहसास और ज़िंदगी को बाँध लेने की ऐसी ही एक कोशिश है 'मध्य भारत के मालवा अंचल का माण्डव ' , तारीखों के बनने और मिटने के बीच मुहब्बत को हमेशा हमेशा के लिए वक़्त की पेशानी पर नक़्श कर देने  की एक नन्ही सी कोशिश और रक़्स और राग को ज़िंदगी के रंगों में घोल देने की मीठी सी ख़्वाहिश।
और माण्डव है भी क्या!!!  सुरों की कशिश से ज़िंदगी के दर्द को भुला देने की ख़ातिर बसाया गया उदास आरज़ुओं  और नामुकम्मल तमन्नाओं का ख़्वाब-नगर।  

वनस्पति 
​​महलों मज़ारों, नदियों और किनारों से आबाद , ऊँची -निचली ज़मीन के फूलों, पौधों , पत्तों  और मुहब्बतों से अटा पड़ा एक ऐसा ज़खीरा जहां कहीं गुल-ए -अब्बास है तो कहीं  गेंदा। कहीं चांदनी तो  कहीं सूरजमुखी। कहीं बेले हैं तो कहीं गुलाब। अलसाये अमरूदों नीम और बबूलों के बीच बौराये आम हैं  तो कहीं नर्मदा के किनारे किनारे जंगली झाड़ियों, घासों और बांसों के झुरमुटों के बीच उग आयी खुरासानी  इमली। कहीं खटियाती अम्बराइयों पर घिर आये झूले हैं तो कहीं ज़िंदगी के तल्ख़ एहसासों सी ही नीम की पीली- ललछौहीं निम्बोलियाँ। मालवी वनस्पति से अटा पड़ा माण्डव सोंचने को मजबूर करता है , माण्डव मालवा से आबाद है या मालवा माण्डव से गुलज़ार ……!  

मालवा  की माटी के गुलाब 
मालवा की अलसाई नींदों में ख्वाब के धागों से बंधी यह नगरी मध्य -प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर से ९० किमी के फ़ासले पर मौजूद है।  अमूमन मुहब्बतों की नगरियों के रास्ते एक जैसे ही होते हैं, ख़ूबसूरत , ख़्वाबीदा  और ख्यालों से अटे पड़े।  माण्डव के घुमावदार रास्ते भी बिल्कुल  ऐसे ही हैं।  ख़ैर जी! खाइयों से ऊँचाइयों  का यह सफर ऐसे ही करने नहीं मिलता , रास्ते में चक्कर भी आते हैं, उल्टियाँ भी होती हैं, और इसका सिला यह मिलता है कि  माण्डव पाँच -पाँच दरवाज़ों में पलकें बिछाए आपका इस्तक़बाल करता है , आलमगीर औरंगज़ेब की यादों से गुलज़ार 'आलमगीर दरवाज़ा' , हर तबके को इज़्ज़त देने की ख़्वाहिश  लिए खड़ा  'भंगी -दरवाज़ा', आपकी आमद पर कमर को कमानी सा झुकाये कमानी दरवाज़ा, गाड़ियों के लिए 'गाड़ी -दरवाज़ा' और साहिबों के लिए दिल्ली का रुख करता 'दिल्ली दरवाज़ा'। इतने दरवाज़ों में खुद का इस्तक़बाल करवाते, अपने आप को 'शाही' मान आखिरकार आप माण्डव पहुँच ही जाते हैं. 

काँकड़ा खोह 
माण्डव की फ़िज़ा में पाँव रखते ही आपका सामना होता है काँकड़ा खोह के बेहद दिलफ़रेब जल्वों से।  ऊँचाइयों से गहराईयों को जाता पानी, कुहासे की चादर से ढंके दरख़्त, कड़वाती सी जंगली ख़ुश्बू, वादी में हर सिम्त उग आयीं  झाड़ियाँ, पथरीली, बेहद चटियल सी नुकीली चट्टानों में बूँद बूँद रिसता पानी और यहाँ -वहाँ  घूमते शरीर बन्दर।  हरियाती उमंगों पर धूप का पर्दा काँकड़ा - खोह में आने वाले सैलानियों में से उन लोगों के जज़्बातों पर हैरत अंगेज़ असर डालता है, जिनकी नस-नस में क़ुदरत से मुहब्बत रक़्स कर रही हो।  काँकड़ा- खोह माण्डव के हुस्न का वह दुर्ग है जहां मालवा और निमाड़ की तहज़ीब बड़े ही गंगो-जमुनी अंदाज़ में मिली हुई दिखती है.  भीलों के नन्हे बच्चे धनुष से निशाना साधने का लालच देते हैं और मक्के के निमाड़ी भुट्टों की सौंधी सौंधी महक ख़ुद -ब- ख़ुद अपनी ओर  खींच लेती हैं बस्स ! रूह पर वही असर होता है , जो पंचमढ़ी में प्रवेश के दौरान 'अप्सरा- विहार' देख कर होता है। आपकी गाड़ी और काफ़िला धूप छाँव के खेल से खुद को सरशार करता आगे बढ़ता है और आप मालवा की माटी में खिल आयी गेंदे गुलाबों के साथ पोई -चौलाई  की क़िस्में गिन  डालते हैं. घास -कास की हज़ारों क़िस्मों के बीच क़िस्म क़िस्म के दरख्तों को देख आपको  उन गधों पर भी रश्क़ आने लगता है जो शहरी दुनिया से दूर , क़ुदरत की इस हरियायी गोद में बड़े ही लाड से चर  रहे हैं. ऊंचे -नीचे खपरैलों वाले इक्के दुक्के घर, छप्परों पर पड़ीं 
बाज़बहादुर का महल और मांडू की प्राकृतिक सुंदरता 
मौसम की सब्ज़ बेलें, चूल्हों से उठता, इठलाता धुआँ।दालपानियों पर पड़ने वाले घी की सौंधी महक और खण्डहरों की ज़िंदा ठंडक !कुल  मिलाकर माण्डव गर्मियों की शाम, ठन्डे फालूदे सा ही रूह को तरबतर कर जाता है।   

वैसे तो माण्डव में क़दम- क़दम पर क़ुदरत के हुस्न को इंसान की ज़हानत के हाथों संवार कर महलों की शक्ल में ढाल देने के सुबूत मिलते हैं पर महलों की इस नगरिया को इत्मीनान से देखें तो हम इसे ३ हिस्सों में तक़सीम कर सकते हैं: 
1 ) पहला हिस्सा : अ) राम मंदिर ब) जामा मस्जिद  स) होशंगशाह का मक़बरा  द ) अशरफ़ी  महल  
2 ) दूसरा हिस्सा : यह अमूमन नर्मदा किनारे का हिस्सा है जिसमे आते है: अ) ईको  प्वाइंट, दाई का महल ब) रेवा कुण्ड  स) बाज़बहादुर का महल  द ) रानी रूपमती का महल। 
3 ) तीसरा हिस्सा : यह शाही हिस्सा कहलाता है , जो कि अ) जहाज़ महल ब) हिण्डोला महल स) जल महल  द ) हम्माम, नील कण्ठेश्वर, सूरजकुंड , संग्रहालय  आदि हिस्सों से मिलकर मुकम्मल होता है। 
  
अशर्फी महल 
हिन्दू और मुस्लिम वास्तुकला का मिलाजुला नमूना 'जामा मस्जिद'  परमारों और ख़िलजियों की सभ्यता की ज़िंदा मोहर है तो बाल्कनी , महराब, चबूतरे, आर्च और गुन्बद , माण्डव की साड़ी  में मुगलों द्वारा टांकी गई ज़री की झालर; मकराना के पत्थरो से बना दायी का महल  मुगलिया आर्ट में राजस्थानी जालियों का सुंदर संगम है तो  रानी जोधा के लिए अकबर द्वारा बनाया गया, क़ुरानी आयतों से सजा 'नीलकंठेश्वर' हिन्दुस्तान के सूफ़ी जज़्बों का वह राज़ है जिसके लिए कभी अल्लामा इक़बाल ने लिखा था , "कुछ बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी / सदियों रहा है दुश्मन, दौरे- जहां हमारा '; अशर्फी महल अपने आप में एक अनूठा महल कमसिन रानियों को अशर्फी के ज़रिये दुबला -पतला और चुस्त दुरुस्त रखने का आकर्षक रानीवास है तो कपूर तालाब रानियों के कपूर से सने बाल धोने का वाहिद कोना, इन तमाम इमारतों के जानने समझने के लिए इतिहास की किताबें भरी पड़ी हैं. इनका हुस्न, इनकी कुशादगी और शिल्पकारी परमार, ग़ौरी, ख़िलजी और मुग़लों समेत उन तमाम रजवाड़ों की तारीख का एक ऐसा  हिस्सा है जिसके बग़ैर  हिन्दुस्तान का इतिहास  अधूरा ही है।   
                               
हिंडोला महल 
पहाड़ियों ,ऊंचाइयों और खाइयों के दीवानों के लिए माण्डव बेशक दिलचस्पी का सामान है पर पत्थरों और इमारतों से मुहब्बत करने वालों के लिए भी यह कोई काम कुतूहल नहीं समेटे है! सीरिया की दमिश्क़ मस्जिद से होड़ रखती। लाल संगमरमर , उड़दिए और काले पत्थरों से बनी अनोखी सी जामा मस्जिद, कभी ख्यालों के आर्किटेक्चर में पत्थर मारती लगती है तो कहीं ताजमहल से २० साल क़ल्ब बना होशंगशाह का मक़बरा अचम्भित करता दिखता है।  कहीं सितारापाक  बाबा और मीरां दातार के मज़ार बुलाते हैं तो कही राम मंदिर और नील कण्ठेश्वर के गुंबद अपनी ओऱ खींचते लगते हैं।  हिंडोला महल, जहाज़ महल और रूपमती मंडप भी कोई  कम  खूबसूरत चीज़ नही! अपने जल्वे  बिखेरने पर आएं तो समाँ बाँध कर रख देते हैं, पर मुहब्बत !!! मुहब्बत वह वाहिद कैटेलिस्ट (उत्प्रेरक) है जिसके दम पर इतना लंबा इतिहास, माण्डव के इतने छोटे से हिस्से में सिमट कर रह गया है. 

रूपमती झरोखा 
मुहब्बत के ज़िक्र के बगैर माण्डव का ज़िक्र अधूरा है और क्यों न! मुहब्बत के बग़ैर क्या पूरा है ! परियाँ चाँद के इश्क़ में मुब्तिला हैं , चाँदनी  शायरों के  दम से   रोशन है, सितारों के जल्वे  चाँदनी  के शैदाई हैं, तो सूरज ज़मीन के इश्क़ में गिरफ्त हो उस पर अपनी शुआयें  फैंक रहा है , भौरा फूल का आशिक़  है तो फूल हवा की मुहब्बत में इतरा रहा है, जब पूरा आलम ही इश्क़ इबादत में गुम है तो माण्डव जैसा इश्क़ अंगेज़ फ़िज़ा वाला शहर इश्क़ के जादू से कैसे अछूता रह सकता है !! रूपमती और बाज़बहादुर का वह रूहानी इश्क़ जिसमे जिस्मानी ख्वाहिशों की  कोई मिलावट नहीं , मांडू को 'प्रेमियों के स्वर्ग' के ख़िताब से भी नवाज़ता है. यह वही इश्क़ है जो सुरों से शुरू होता है, रक़्स में घुलता है और सुरूर में ढल कर यों मुकम्मल होता है कि  रूह उसके जादू में कसक कर ख़ुद ब ख़ुद  गा  बैठती है " ऐ काश! किसी दीवाने को , हमसे भी मुहब्बत हो जाए………।"

कहते हैं धरमपुरी की राजकुमारी रूपमती सुरों की  देवी थी  और  माण्डव के राजकुमार वायज़ीद अली शाह उर्फ़
रूपमती महल 
बाज़बहादुर सुरों के शैदाई। रक़्स और राग के ये दोनों रूप बेशक पैदा अलग अलग हुए थे  पर इनके दिलों के टुकड़ों पर, जन्मते ही, नूर के बादशाह ने  'राधा' और 'श्याम' लिख दिया था. क़ुदरत के निज़ाम में इनका मिलना तय था, माँ नर्मदा की पूजा इनके मिलने की महज़ एक वजह हो गयी थी. राग दीपक और राग भैरवी के सुरों को संगत देते बाज़बहादुर के सुर जब, नर्मदा किनारे, राग बसंत गाते रूपमती के सुरों को छू जाते, मुहब्बत का हैरतअंगेज़ नग़मा फूट कर माण्डव की फ़िज़ा को गुलज़ार कर दिया करता था।  जिस्मों ने जिस्मों को न छुआ न चक्खा , पर रूहों ने रूहों के आग़ोश में जन्नत ज़रूर पा ली थी।  आवाज़ ने आवाज़ , अंदाज़ ने अंदाज़ और एहसास ने एहसास को कुछ ऐसे  छुआ कि रूपमती की तड़प ने बाज़बहादुर के सूने पड़े संगीत को आबाद कर ही दिया। कहते हैं, " प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं , बिजलियाँ अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं" की तर्ज़ पर खुद माँ नर्मदा की आज्ञा से रूपमती बाज़बहादुर के पास गयी थी।  
इस अफ़साने की हक़ीक़त से बस वही आश्ना हो सकता  है, जिसने मुहब्बत की हो, इश्क़ की आग में  ज़िंदगी को होम कर दिया हो और जिसे मेहबूब की बेचैनी आधी रात को तड़पा कर बिस्तर से उठा  तहज्जुद के लिए खड़ा कर देती हो.……। 
जहाज़ महल का आंतरिक सौंदर्य 
रूपमती की पूजा आराधना अधूरी न रह जाए , वायजीद अली शाह ने इसका माकूल इंतेज़ाम  किया था. रूपमती के इश्क़ को उसने इतनी ऊंचाई पर संभाल कर रखा कि आज भी रूपमती मंडप की सीढ़ियाँ उतरते , हाफ़तें -कांपते सैलानी कह बैठते हैं, " लिल्लाह! यह मुहब्बत क्या क्या करवा दे। " 

रूपमती महल आकर, माण्डव सीमा समाप्त हो जाती है. यह आख़िरी पड़ाव , इश्क़ की दावत देता , मांडव को अलविदा कहने को मजबूर करता है. सैलानी सोंचते हैं, सच है! क़ुदरत की कारीगरी के बीच मुहब्बत के बिखरते रंग सिर्फ माण्डव में ही देखे जा सकते हैं , कहीं वादियों में गिरते झरने की शक्ल में, कही कोहरे में उठते कलमे की शक्ल में।  कहीं निकलते सूरज की लाली के रूप में, कहीं अंधेरी शाम, जुगनुओं के झुंडों के बीच मनती  दिवाली की शक्ल में. 
जब अनमने क़दमों से घाट पार करते , चढ़ते चाँद की चाँदनी  को पीछे छोड़ , आप माण्डव से विदा लेते हैं, आपके होंठ बरबस ही गुनगुना उठते हैं, "रब की क़व्वाली है इश्क़-इश्क़ ......."  सच !! बेख़ुदी  में चूर करदेता है माण्डव का कालजयी सौंदर्य।