बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

भेजो ना




धूप बहुत है, मौसम जल-थल भेजो ना
बाबा मेरे नाम का बादल भेजो ना !

मोल्सरी की शाखों पर भी दिए जले
शाखों का केसरिया आँचल भेजो ना!

नन्ही-मुन्नी सब चेह्कारें कहाँ गयी
मोरों के पैरों की पायल भेजो ना !

बस्ती बस्ती दहशत किसने बो दी है
गलियों बाज़ारों की हलचल भेजो ना !

सारे मौसम एक उमस के आदी हैं
छावं की खुशबू, धूप का संदल भेजो ना!

मै तन्हाँ हूँ आखिर किससे बात करूँ
मेरे जैसा कोईं पागल भेजो ना !

- राहत इन्दौरी

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

प्रतीक्षा

काश! तुम्हे कुछ याद आता..कुछ भी थोडा सा ही सही, वह गुलाबी फरवरी जो सिर्फ तुम्हारे होने के अहसास से ही ज़िंदा थी, वह जब तुम मुस्कुराते हुए, दहकते गुलाबों, और महकते अमरूदों पर बौराई, बौराई नज़र डाल कर मुस्कुरा कर बस मुझे देखते ही रहते थे, मै तो बस ज़िंदा ही यों थी, "कि तुम थे" वर्ना......!
धड़कने धक् धक् करतीं थी तो तुम्हारे क़दमों कि आवाजों से; साँसों को उमंगें मिलती थी तो बस इसलिए कि इस ज़मीं पर तुम भी कहीं सांस लेते हो. वरना इसके पहले तो जैसे मुझे अपने पैदाइश का भी होंश नहीं. मै ज़िंदा कब थी तुम से पहले, और क्यों जियूं त्तुम्हारे बाद !!!! "मसला है न?" मुझे एक एक लम्हा क्यों याद आता है, जब कि ज़िंदगी के सिस्टम से तुम्हारी फ़ाइल डिलीट हो चुकी है, तुम कहीं नहीं हो, कहीं भी नहीं हो!
याद है तुम कहा करते थे, वक्त कटता नहीं, मै कहती थी, वक्त काटो मत! कट जाएगा तो मै तुम्हे और तुम मुझे, याद कैसे करेंगे, हमें तो वक्त संजो लेना है, जुर'आ जुर'आ (घूँट-घूँट) पीना है, आज जब ज़िंदगी एकदम प्यासी है, मुझे तुम्हारी चाहतों का हर घूँट याद आता है, और माजी की यादों से महके इस दिल में हाल के कांटे कुछ इस तरह चुभन देतें हैं मानो .........ज़िंदगी गुलाब का कोई बगीचा हो! जिसकी हर याद एक नए रंग का गुलाब हो, जो तुम्हारी खुश्बू से मोअत्तर हो, मुझे जीने को मजबूर कर रही हो! कितनी ही सरफिरी शामें, चांदनी रातें और अधूरी बातें हैं! आज लगता है जो हम नहीं कह पाए, नहीं जी पाए, बस ज़िंदगी जैसे वहीं अटक कर रह गयी है. सच है अक्षय! मेरी तो आगे बड़ी नहीं, क्या तुम आगे बढ़ पाए?
वही की वहीं जमीं 'मुझ' को अहिल्ल्या के उद्धार में राम का महत्व आज समझ आया!

मगर तुम ही बताओ अक्षय! क्या तुम राम के पैरों की धूल भी थे? अरे तुम तो वह भीरु और कायर मनुष्य थे जिसने मुझे पत्थर कर के छोड़ा था! मुझे लगता है प्यार भी नसीब से ही मिलता है, प्यार कर तो हर कोई सकता है, पा हर कोई नहीं सकता. मै भी प्यार के मामले में "ओथेलो" की देस्दिमोना ही निकली जिसने एक गलत आदमी से प्यार करके ज़िंदगी को नरक बना लिया था!
याद है साहित्य की कक्षा के बाद मैंने जब तुमसे पूछा था, "शक राज "की प्रेमिका "कोमा" की क्या गलती थी? तुमने मुझसे कहा था, "डियर! ग़लती कोमा की नहीं नसीब की है, कोमा नहीं लिखवा कर लाई होगी उसे नसीब में!" मुझे आश्चर्य हुआ था; ज़रा भी द्रवित नहीं हुए थे तुम कोमा के लिए.

आज लगता है तुम सही थे. सब मुकद्दरों के खेल हैं, मगर शिकवा मुझे तुमसे, मुक़द्दर से या अपने आप से नहीं,शिकवा मुझे मुक़द्दर लिखने वाले से है.एक तरफ इन्द्र है, अपने छिछली कामुकता के तहत, रूप बदल कर, देवराज आतें हैं; भोली-भाली अहिल्ल्या से छल कर, अपने प्यास बुझा मस्त अपने दुनिया में लौट जातें है. दूसरी तरफ गौतम ऋषी उस ही अहिल्ल्या को शापित कर, युगों युगों तक पत्थर बन कर जीने पर मजबूर कर देतें हैं. एक तरफ इन्द्र का मुक़द्दर है, दूसरी तरफ अरविन्द का! मुक़द्दर की सारी मार अहिल्ल्या की झोली में ही क्यों आती है? क्या मुक़द्दर लिखने वाला जगतपाल भी पुरुष है इसलिए? सालों में कोई राम अवतरित होता है, जो उसका उद्धार तो कर देता है, किन्तु उसके पास भी अहिल्ल्या के पथराये युगों का कोई हिसाब नहीं होता.

अक्षय! कलियाँ आज भी चटक रहीं हैं, आम फिर बौरा रहें हैं, मधुर मादक मौसम का असर प्रकृति के कण कण में उन्माद जगा उसे उल्लासित कर रहा है, पर मै पत्थर हो चुकी हूँ, (और सच मानो, पत्थर होकर जीना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है). अब एक लम्बी प्रतीक्षा है, और मै हूँ........देखना है कि मेरे मुक़द्दर में किसी "राम" के आगमन की गुजाइश भी या नहीं क्योंकि:
"हज़ारो साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा "
तुम्हारी शिवी


शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

"चलो...."



चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों

चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों

ताल्लुक बोझ बन जाए तो
उसको तोड़ना अच्छा
तार्रुफ़ रोग हो जाए तो
उसको भूलना बेहतर

वो अफसाना जिसे तकमील तक
लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर
छोड़ना बेहतर

चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों


आपने सुना है साहिर साहब का ये कलाम!
कहिये तो!!!