सोमवार, 30 जुलाई 2012



खुली आँखों में सपना झांकता है
वो सोया है कि कुछ कुछ जागता है

तेरी चाहत के भीगे जंगलों में
मेरा मन मोर बन कर नाचता है

मुझे हर कैफियत में क्यों ना समझे
वो मेरे सब हवाले जानता है

मै उसकी दस्तरस में हूँ मगर वह
मुझे मेरी रज़ा से मांगता है

किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल
बहाने से मुझे भी टालता है

सड़क को छोड़ कर चलना पडेगा
कि मेरे घर का कच्चा रास्ता है.
                                                     - परवीन शाकिर

रविवार, 22 जुलाई 2012

चाँद मुबारक- परवीन शाकिर की क़लम से


पूरा दुःख और आधा चाँद
हिज्र की शब् और ऐसा चाँद

दिन में वहशत बहल गयी थी
रात हुई और निकला चाँद

यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तन्हां चाँद

मेरी करवट पर जाग उट्ठे
नींद का कितना कच्चा चाँद

इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हाँ होगा चाँद

आंसू रोके, नूर नहाये
दिल दरिया तन सहरा चाँद

जब पानी मे चेहरा देखा
तूने किसको सोचा चाँद

बरगद की एक शाख हठा कर
जाने किसको झाँका चाँद

रात के शानों पर सर रक्खे
देख रहा है सपना चाँद

हाथ हिला कर रुखसत होगा
उसकी सूरत हिज्र का चाँद

सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क में सच्चा चाँद

रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद

बुधवार, 18 जुलाई 2012

एक मंज़र



उफक के दरीचों से किरणों ने झाँका
फ़ज़ा तन गयी रास्ते मुस्कुराए

सिमटने लगी नर्म कोहरे की चादर
जवाँ शाखसारों ने घूँघट उठाये

परिंदों की आवाज़ से खेत चौंके
पुर  असरार  लय  में रहट गुनगुनाये

हंसी शबनम आलूद  पगडंडियों से
लिपटने लगे सब्ज़ पेड़ों के साए

वो दूर टीले पे आँचल सा झलका
तसव्वुर में लाखों दिए झिलमिलाये


                                                      - साहिर लुधियानवी

रविवार, 15 जुलाई 2012

उसने फूल भेजें हैं.......

An ill girl on a bed under cover Stock Photo - 3631971 


उसने फूल भेजें हैं....
उसने फूल भेजें हैं
फिर मेरी अयादत को

एक एक पत्ती में
उन लबों की नरमी है
उन जमील हाथों की
खुश गवार हिद्दत है
उन लतीफ़ साँसों की
दिलनवाज़ खुशबू है

दिल में फूल खिलतें हैं
रूह  में चरागाँ है
ज़िंदगी मोअत्तर है

फिर भी दिल ये कहता है
बात कुछ बना लेना
वक़्त के खजाने से
एक पल चुरा लेना
काश! वो खुद आ जाता
                                   -परवीन शाकिर 

सोमवार, 9 जुलाई 2012

तेरा मेरा नाम


तेरा मेरा नाम खबर में रहता था
दिन बीते एक सौदा सर में रहता था

मेरा रास्ता तकता था एक चाँद कहीं
मै सूरज के साथ सफ़र में रहता था.

सारे मंज़र गोरे गोरे लगते थे
जाने किसका रूप नज़र में रहता था

मैंने अक्सर आँखें मूंदे देखा है
एक मंज़र जो पस मंज़र  में रहता था

काठ की कश्ती पीठ थपकती रहती थी
दरियाओं का पाँव भंवर में रहता था

उजली  उजली तस्वीरें सी बनती हैं
सुनते हैं अल्लाह बशर में रहता था.

                                  -राहत इन्दौरी, कलामे ए राहत "नाराज़" से.

शनिवार, 7 जुलाई 2012

"बड़े अच्छे लगतें हैं.......!"

अल्लाह ख़ैर! "मारिया अब्बास वेड्स अज़हर वारसी" हाँ! था तो शादी कार्ड ही. मै ख़्वाब भी नहीं देख रही थी  और लिखा भी बिलकुल यही था. मेरे लब खुले के खुले रह गए और ज़हन भागते हिरन सा माज़ी में चला गया.  उसके बचपन की आवाज़ गूँज उठी " अप्पी! आप चा (क्या)  कल्लई हो! चा पतंग उला लही हो?" या उसे छेड़ देने पर, उसका गुस्से में कहना," एक लात पलेगी तो मल जाओगे!"   

ददिहाल की मै आख़िरी विकेट थी, और ननिहाल की सेकिंड लास्ट. मारिया सबसे बड़ी ख़ाला, जिन्हें हम ख़ाला अम्मा कहते थे की नातिन. उम्र में मुझसे आठ नौ साल छोटी, लिहाजा उसका बचपन मुझे कुछ ऐसे हिफ्ज़ था जैसे हिस्ट्री के लेसन. मारिया उसके खानदान की सबसे बड़ी बेटी और उससे छोटा उसका चचाज़ाद उर्फी. पहली दफे मारिया के ददिहाल गयी तो ( वह छः एक बरस की और मै चौदह पंद्रह की)  मारिया हाथ में "चम्पक"  लिए उर्फ़ी से बतिया रही थी,  "भैया! आओ हम आपको एक कहानी पढ़ कर सुनाये- चुत्रू मुत्रू की कहानी." चुत्रू मुत्रू! ये कौनसा लफ्ज़ है? मेरे ज़हन ने मुझसे ही सवाल किया. मुझसे रहा न गया मै उठ कर गयी, और चम्पक में देखा, वह थी 'चुन्नू मुन्नू की कहानी' . लिखने का अंदाज़ कुछ ऐसा  था कि बच्चे उसे चुत्रू -मुत्रू ही पढने पर आमादा थे. बहुत समझाने पर भी नहीं मानी वह. चुत्रू मुत्रू ही चलता रहा, और हमसब बड़े "चुत्रू मुत्रू की कहानी" का  लुत्फ़ लेते रहे.  खूसूरत, जिद्दी, गोल मटोल गुडिया सी मारिया.उसने मुझे कभी ख़ाला नहीं कहा बस अप्पी ही कहती थी..
 
                      मेरे आते ही बैग बंद, बातें चालू. मुझे भी लाड दुलार करने और रोब गांठने को वही एक थी, मेरी प्यारी मारिया.
 
 बच्चों को कुरआन पढ़ाने वाली आपा आतीं उन्हें पढ़ातीं तो क्या! बिना समझाए अरबी भाषा रटातीं और चली जातीं. दालान में तख़्त पर हिल हिल कर क़ुरान रटती मारिया और तीखे तेवरों वाली उस्तानी बी. तेज़ छडी की तड तड पड़ती मार और बेहद खुराफाती मारिया! "चलो पढो ! अइया का न'बुदू, व अइया का नस्त'इन (ऐ रब! हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझसे ही मदद मांगते हैं). "आईं! ये अइया क्या होता है! शायद उस्तानी बी भूल गयीं हों! मै खुद सही कर लेती हूँ" , उसके नन्हे ज़हन ने सोंचा और उसने पढ़ा, "भैया का न'बुदू, व भैया का...." साथ ही भाई पढ़ रहा था, उसे लगा शायद अरबी में उसे कुछ कहा जा रहा है. यह कह रही है तो ज़रूर कोई संगीन मामला है, अभी सही करता हूँ!!!  "लो बीबी! हमारा कायका न'बुदू!! तुमारैयी होगा, मारिअका न'बुदू.... " अब हो गयी जंग शुरू, इसने उसे मारा, उसने इसे नोचा, धींगा, मुश्ती, मार कुटाई.  हम सब लोगों का हंस हंस के बुरा हाल. दादी अम्मी ने उस दिन , दिन भर इन्हें धूप में खड़े रखने का फतवा जारी किया, उस्तानी से माफ़ी मंगवाई और अल्लाह से भी माफी मंगवाई, कुरआन के लफ़्ज़ों की बेहुरमती पर.

छुट्टियों में मारिया हमारे हाँ आती तो बस, अब्बू की तो उड़ के ही लग जाती! पता नहीं क्या क्या उगनी- तुगनी सिखाया करते मारिया को! मसलन " बेटे घर में कोई मेहमान आये तो कहो, "आओ थको!" , और जाए तो कहो: "टाटा टलो !" " और मारिया अगर उसे मेहमानों पर एप्लाई कर देती तो अम्मी अब्बू की वह जंग छिड़ती की इतिहास की सारी जंगें शर्मा जाएँ!!
और जब वह स्कूल में दाखिल हुई तब!स्कूल का नाम था "अरिहंत पब्लिक स्कूल"  बिलकुल शाकाहारी स्कूल. मैडम ने बच्चों को सवाल दिया: "राईट द नेम ऑफ़ थ्री थिंग्स यू ईट?" पहला दिन, लिहाज़ा बच्ची समझी नहीं, उसने मेडम से पूछा " इसमें क्या लिखना है?"
                                                 - "आप जो खातीं हैं, उसका नाम लिख दीजिये"  मेडम ने समझाया!
                                                 "मच्छी (मछली) , गोस (गोश्त) , मुलगा( मुर्गा)  उसने लिखा.
                                                 -"आप ये सब खा लेतीं हैं! मेडम का मुह  हैरत से खुला ही था कि उसने चट से जड़ा: "न! मै तो बछ बोती -बोती (बोटी बोटी) खाती हूँ!"



मै मुस्कुरा उठी.हाथ में पकडे शादी कार्ड को भाभी बेगम को थमाया, "लीजिये! मारिया के निकाह का दावतनामा! "
                            - "अरे निकाह तो होना ही था, गादी वाली कोठली के क़िस्से के बाद! " भाभी ने तंज़ किया.
                                 - क्या किस्सा!!! मै हैरत से बुत बन गयी.
" बेगम! हम ही नहीं सारा खानदान कह रहा है, वरना वह लन्दन पलट, एक से एक लडकियां रिजेक्ट करता फिर रहा, उम्र में उससे दस साल बड़ा!!! उसे इस मुटल्ली में क्या ख़ूबी नज़र आयी होगी भला!!!" भाभी ने मुझे लताड़ा.
-  "ये खानदान है या देवकी नंदन खत्री का  नोवेल! अरे! क्या होगा भला उस मुई कोठरी में !  मैंने भाभी को सुनाया.
-"बीबी! बिना गादी के भी बहुत कुछ हो जाता है, तो फिर उस कोठरी में तो गादियाँ  रक्खी हुई थीं, तुम ही सोच लो! क्या हुआ होगा. " भाभी ने हाथ नचाये.
मै बुरी तरह उबल कर रह गयी. पूरा खानदान गादी वाली कोठरी के काण्ड को रो रहा था. सब दूर बातें बनायी जा रहीं थी, मुझसे रहा न गया, मैंने फोन घुमाया: " मारिया! अप्पी बोल रही हूँ!तुझे मेरी जान की कसम! तेरे मुगलों, पठानों के खून  का वास्ता! बता मुझे , उस दिन गादी वाली कोठली में क्या हुआ था!"
"अप्पी! " उसकी आवाज़ से मेरा दिल धडका! अप्पी, जब इनकी अम्मी हमें देखने आयीं न! तो उन्ने अम्मी से कहा 'ऐ भेन! अल्लाह ने भी इत्ता हक तो दिया है , लड़के की लडकी से बात करा दो!" हम गादी वाली कोठली में बैठे, आपको तो पता है, संदूक पर जमी तमाम गादीयों  पर हम एक झटके में उचक के चढ़ जाते हैं, बस! वईं पे बैठे  थे. ये बात करने आये, हमने कहा 'यईं पे बैठ जाइए!' जब ये बैठे तो क्या कहें! सारे गद्दे रजाइयां फिसल कर नीचे, एक तरफ ये पड़े एक तरफ हम. 'सुनो! हमें कुछ बात करनी है', ये कपडे झाड़ते बोले, " कुछ नई सुनना हमें! जब चढ़ना नयी आता था, तो क्यों चढ़े, हमें उतरा लिया होता!!!"  हमने बी इनकी फ़िलुम खेंची! "अब पहले गादी जमवाओ, फिर सुनेंगे तुम्हारी बातें!"  लिहाज़ा वे गादियाँ  जमवाने लगे, और आख़िरी गादि पे बोले 'सुनो! किसी से कहना मत गादी वाली कोठली में क्या हुआ था' अगले दिन इनकी अम्मी ने रस्म करदी! अप्पी! हमें दिखे! ये बिचारे डर के मारे मुस्से शादी कर रहें हैं कहीं मै इनका राज़ न खोल दूं कि लन्दन पलट लड़का गादियों पे चढ़ना भी नहीं जानता!!! " 
अल्लाह! मैंने माथा पीट लिया, अट्ठारह साल एक माह की दुल्हिन! मेकअप से  पाक चेहरा, शैतान मगर हद दर्जे की मासूम!! गोल मटोल साफ़ ज़हन और साफ़ दिल की शफ्फाफ लडकी. इतना हुस्न किसी को भी पागल बना दे, फिर  अज़हर तो इंसान है! मुझे भाभी बेगम पर शदीद गुस्सा आया.
मैंने सुना, रेडियो पर गाना आ रहा था : "बड़े अच्छे लगतें  हैं, ये धरती, ये नदिया, ये रैना और तुम....."          

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

सावन की इस सुबह



सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

आँगन में पौधों पर

फूलों पर, पत्तों पर
बरसाती खुशबू से
मुझ पर ही क्यों छाये

खिड़की की चौखट पर

मौसम की आहट से
बरसाती झोंकों में
पगलाए वंशीवट से
यमुना के तीरे तीरे
श्याम सलोने नटखट से
राधा की पायल से गुंजित
वृन्दावन के पनघट से
स्मृति की नदिया में
अश्रुपूरित नीरव तट से
कालिदास के मेघ सलौने
बोलो! मुझको क्यों भाये 

सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

                               

बुधवार, 4 जुलाई 2012

"उफ़! ये लडकियां!!!"

              

सावन आये दो दिन गुज़र गए हैं. भरे सावन में मरे टाईफाइड की मार झेल रही मै जलकुढ़ कर बेकार ही कोयला हो रही थी कि अब्बू का फोन आया, "नईम भाई आ रहें हैं, गाडी भेज दी है, तुम आ जाओ." मै जानती थी, अब्बू को मेरी नहीं, प्याज़ और अजवाइन के पकौड़ों की याद आ रही थी, अपनी सूनी अमराई में मल्हार की तानों की याद आ रही थी, और याद आ रही थी, छत पर सावन की झड़ियों में चाय के कप थामे गप्पेबाज़ी करने की. सच्ची! अब मुझे लगता है, मम्मा सही कहतीं हैं, "हरकतों में तो पूरी अपने बाप पर पडी हो तुम!" मै भी कौन यहाँ बड़ी खुश हूँ! फ़ौरन बैग में दो एक केप्री, एक दो टी-शर्ट ठूँसे, घर के लोअर- टी शर्ट पर ही अपने पहनावे को थोडा तहज़ीब वाला बनाने को बुर्का डाला,खास खास दोस्तों को अपने ना होने की इत्तेला दी और तैयार. नईम भाई बड़े अच्छे ड्राइवर हैं, पूरे रास्ते उनसे बतियाने में, गाँव और मोहल्ले भर की ख़बरें लेने में रास्ता कैसे कट गया मालूम ही नहीं चला.

                मौसम सुहाना, घर की छत, गुलमोहरों के मंज़र, लिपीपुती ज़मीन से उठती सौंधी सौंधी महक, और मज़े की बात! मामा स्कूल गयी हुई थी." आज तो उड़ के लगी है हम बाप बेटी की!" अब्बू हमेशा की तरह मुस्कुराए, और मुझसे बैग लेकर निगाहों ही निगाहों में बोले, मै भी मुस्कुराई गोयाँ कह रही हूँ, "अभी हाथ मुह धोकर आती हूँ  फिर करते हैं धमाल." सामान रक्खा ही था कि देहलीज़ पर से "सर! कहाँ हो!!! भाभी जी कह गयीं थी दूध लेने का, ये लेओ लेलिये हम!!!" की जानी पहचानी आवाज़ करती सावित्री चाची. "का हो चौखट पर खडामे (चप्पल)  किसकी धरी है! " उन्होंने टीवी लाउंज में झाँका."मै आयी हूँ चाची! " मै भाग कर उनके गले लग गयी. "ई लेओ! दौनों बिटिया आ गयीं!  अरी! मोना भी आयी है ससुराल से, बिब्बो, नीतू, छोटी, चरखी, रिहाना, सबैयी हैं बिटिया!  मिर्ची के डंठल तोड़ते तोड़ते, फुलवारी सुधारते , अंगनाई  लीपते खूब संगत होगी ढोलक पे! हमरी कोयल जो आ गयी है!!" चाची ने गोयाँ अगले कामो की लिस्ट ही थमा दी,  क्या क्या करना है, किस किस से मिलना है, कौन कौन आया है ससुराल से, और गाना तो गाना ही है, बहाना नहीं चलेगा!!!. ये अमीर खुसरो ज़रूर हमारे ही गाँव के रहे होंगे, "आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा" मेरे ज़हन में बरबस ही खुसरो का कलाम गूंजा!!!

                 "अब्बू! चक्कर से आ रहे हैं थोड़े" वाकई कमजोरी की वजह से मुझे चक्कर आ रहे थे, मैंने कमरे में आकर फिर आँख लगाने की कोशिश की ही थी कि बहुत सारी पायलें बहुत सारी चूड़ियाँ  और बहुत सारी आहटें, एकदम से मेरे सर पे. अरे!!!! छम्मी, छोटी, चरखी, नीतू, रेहाना, पायल, मिन्नू सब की सब मेरे सर पे सवार! क्या क्विक सर्विस है चाची की भी! " क्यों री!!! अकेली छुपी बैठी है, मरी सोंच रही थी, हमें नहीं मालूम चलेगा! " "अरे दोगली भूल गयी ना हमें!" " अरी! पांचे-गट्टे, हंडे कुलिये, गुड्डे गुडिया , संजा गरबे सब भुला दिए ना!!!" मै कुछ कहूं उसके पहले ही, लानत-मलामत, आंसू और इल्ज़ामों की बौछार सी होने लगी.  "हाई दैया!!! ताप है इसे तो" चरखी ने मेरा हाथ थामा. मुझे बेसाख्ता मुनव्वर राणा याद आने लगे: "तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कान्धा नहीं देते!/ हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं..." लगता है एक फेरा लिया होगा इस गाँव का उन्होंने!!! अल्लाह! मरियों!!! मुझे टाईफाइड हो गया है तुम  सब की सब भी ना!!! हम सब की सब सतबहिनियों  जैसी एक दूसरे में उलझ पडीं कि एकदम से मिन्नू को सूझी, "क्योँ री!!! अन्ग्रज्जी बुखार तो नहीं हुआ तुझे! (पिछली दफे उसकी शादी पर आयी थी तो उसे एड्स के बारे में समझाते हुए मैंने ही उसे एड्स का नया नाम बताया था.)  कहने की देर थी कि सब फिक्क से हंस पडी. नीतू मेरी इस बेईज्ज़ती को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी. "खबरदार! तोहका बाबा जी की कसम, जो हमरी बबुनी के ऐसन बोली" उसने ठेठ देसी अंदाज़ में मिन्नू को घुड़का. "लेओ देख लिओ अपने ही अखियन से! अरे गाँव भर में कित्ते जोड़ी चाचा जी-चाची जी, और कित्ते दर्जन चचा जान- चची जान हैं जिनका तोहार ब्याह से मतबल है!!!! , फिर कहे ना कर लिओ!" मै हंस दी , "हमें कौन्हूँ इनकार है,अरे हमें हेए कोई पसंद ना करे!" हमें भी नीतू की ज़ुबान सुन कलकत्ते के  कोल्हू टोले  से निकलने वाले अखबार उदन्तमार्तंड की ज़ुबान याद आ गयी. "अरे तो हम् सबैयी मर गयी का, या सांप सूंघ गया हमें! एक बार तो याद किया होता सखियों को !!" मीतू फट पडी. "ई लओ! अब तोह से ब्याह करेंगी हम! अरी! तोहका धनी इस सावन में हमरा राम नाम सत ही कर देगा." सब की सब खिलखिला कर हंस पडी. "सच्ची गुडिया! तू बिलकुल नहीं बदली, अब भी देसी इत्ती अच्छी बोल लेती है." " लो! जैसे तुम लोग बदल ही गयी हो!" अब्बू सबके लिए कुछ हल्का नाश्ता ले आये, "लो मेरी बीरबहुटियों! खिलखिलाती रहो" 'आपने क्यों ज़हमत की अब्बू जी! हम क्या कोई गैर हैं! ' सबका अब्बू से एक ही शिकवा था. सब की सब अब्बू की स्टूडेंट  थीं. मीतू (मिताली) डोक्टर थी, चरखी (रक्षा शर्मा) का अपना स्कूल था, मिन्नू (मीनाक्षी झा) वकील थी,  छम्मी (अज़रा एजाज़ ) जर्नलिस्ट थी, छोटी (सारा थोमस) नर्स थी, रेहाना सय्यद टीचर थी, और मै! टीचर, फ्री लांसर, ट्रांसलेटर, मार्केटिंग मैनेजर, लेक्चरार, और पता क्या क्या होकर फिर कुछ भी नहीं!  यानी, जॉब छोड़ कर घर की ज़िंदगी जीने वापिस घर आयी थी. मिन्नू के वकील साब ने ही उसे आज यहाँ तक पंहुचाया था, वरना उसकी शादी तक तो उसे एड्स के बारे में भी कुछ पता नहीं था. हम सबने उसकी खूब खिचाई की थी, इसी से आज वह बदला निकाल रही थी. "अच्छा सखियों! शाम भी होगी, रात भी होगी, बात भी होगी, अब जाओ न! " मैंने जम्हाई ली, वाकई मुझे नींद आ रही थी,  "वाह गोईं, ऐसे कैसे, अरी अभी तो हमें कितनी बाते करनी हैं, ए गुडिया! तू बता न, कोई पसंद है तो धीरे से कान में कह दे, बिन्नो! अब तो कर डाल शादी."  " हाँ पसंद है! वो लंबा ऋतिक रोशन पसंद है, बोल करवा देगी मेरा उससे ब्याह, वो राहुल गांधी पसंद करता है मुझे, चल पढवा दे हमारा निकाह!  सलमान, मेरे नाम की ही तो आँहें भरता है, बता दे कब तारीख पक्की कर लूं!  और तो और अटल जी और कलाम साब भी ..... अरी बस कर !!! मोना ने मेरा मुह भींचा, "वाकई बेचारी थक गयी होगी अब चलो आराम करने दो उसे."

                       थकान से कब नींद लगी कब खुली हिसाब नहीं. आँख खुली तो मामा थर्मामीटर से मेरा टेम्प्रेचर ले अब्बू से कह रही थी, बुखार नहीं है अभी, आप थोड़े एपल ले आइये इसके लिए. हम माँ बेटी बतियाने को हुए ही थे कि मोना, छम्मी और छोटी फिर धमक पडीं. " सुन न! मेरे हाथों थोड़े भुने चने थमाती हुई बोली मोना, वह पिपलेश्वर मंदिर के पुजारी को माता रानी की सवारी आती है, चल न! वहाँ पूछ कर आयें तेरा ब्याह क्यों अड़ जाता है"  "तेरी मौत मेरे हाथों लिखी है लगता है ! तुझे पता है मुझ सख्त चिढ है ऐसी बातों से" मैंने उसे चने खाते खाते घुड़का. चल छम्मी! यह तो मानेगी नहीं, हम ही कुछ करते हैं, उसने चने वाला टीमटाम उठाया और चल निकली.

                  अगले दिन संडे था, मामा मेरी तबियत को लेकर फिक्रमंद थीं, और अब्बू मुझे रिलैक्स करने की कोशिश कर रहे थे. कोई नहीं आया था, सिवा दूधवाले, कचरे वाले, अखबार वाले और सब्जी वाले के, लिल्लाह! कितना सुकून है यहाँ की ज़िंदगी में. हम लोगों ने साथ मिलकर अब्बू  और मामा की ऑल टाइम फेवरेट मूवी "बूदरिंग हाईट्स " का लुत्फ़ उठाया. एक दिन खामोशी से निकल गया. और अगले दिन फिर वही सखियों की टोली, बातों की होली, हंसी ठिठौली." ":सुन! कर आयीं हम तेरा पक्का बंदोबस्त, तू तो चली नहीं! देख अगले सावन कैसी हरी भरी होकर आयेगी घर."  "कक्या! क्या कर आये तुम लोग!" मैंने हैरत से उन्हें तका. "जानती है, क्या बोली मातारानी! अरी पहले रिश्ते को ठुकराने के कारण ही हो रहा है ऐसा, सच्ची गुडिया! पहिला रिश्ता मंगल के घर से आता है  और तू! मंगल से दंगल कर बैठी!!!  "अरी कमबख्तों! जला दो अपने  डिग्रियां!!" मेरा गुस्सा अब सातवें आसमान पे था, " मै पूछती हूँ करके क्या आयी हो !"  "गुस्सा काहे करती हो, अरे तुम्हे याद है वह भूरे खाँ! हिस्ट्री के किसी राजा की नहीं, चाँद मियाँ चूड़ीवालों  के लड़के की बात कर रहें हैं हम!!!"  और बरबस ही मेरा गुस्सा हंसी में बदल मेरे लबों पे आ गया, बिलकुल गोरा-चिट्टा, कोई दस बरस का और मै सात एक   की, मेरा खासम खास  दोस्त. टायर चलाना, फिरकी घुमाना, चव्वे (कच्ची इमली) बिनना, और इक्की दुक्की अम्मा बहिन की गालियाँ, कित्ता कुछ सिखाया था उसने मुझे, "भूरे खाँ!  मेरे अच्छे भूरे ! मेरी पतंग बढ़ा दे, और बस पतंग  आसमान पे,  भूरे! तेरी सायकल का एक चक्कर लगाने दे न , और सायकल हाज़िर. चल वो गंदे पानी की कुल्फी खिला न, और कुल्फी गोयाँ खास मेरे लिए हाज़िर. पढाई में भूरे सिफ़र था और मेरा शाब्दिक ज्ञान शुरू से ही बेजोड़. एक दिन मुझे इम्प्रेस करने के चक्कर में टीवी से कोई फिल्म का डाईलोग याद कर उसने चिपकाया, "गुडिया सुन!" वह और मै अंगनाई  में बैठे बैठे इमलियाँ चुग रहे थे, "हूँ!" मैंने जवाबन उसकी तरफ देखा, "मेरे रक्त से मै तेरी मांग भर दूंगा!"  क्क्य!! मेरे ज़हन में इस मुहावरे का मतलब बड़ा साफ़ था, "कमीने, कम्बखत, तेरा नास जाए, निगोड मारे तुझे कुत्ते उठा ले जाएँ, तेरी अम्मा का फ़लाना, तेरे  अब्बा का ढमाका....मैंने पता नहीं कौन कौन सी गालियाँ इजात करलीं, चप्पल निकाली, उसे मार मार वो कुटाई की, कि बेचारा! पिटने के दौरान वह बार बार पूछ रहा था, "काहे मार रही हो, उहाँ टीवी मां तो खुस हुई थी वो!!" जवाब में मै मारने की रफ़्तार और तेज़ कर देती थी. जब मार मार कर थक गयी तो बुक्का फाड़ कर रोती हुई घर को गयी गोयाँ मैंने भूरे को नहीं भूरे ने मुझे मारा हो. दादी अम्मी के कोर्ट में मस'ला  पेश हुआ, दादी लकड़ी टेक भूरे के घर गयीं और भूरे के अब्बू ने उसकी तबियत से कुटाई की. मेरे बड़े भाई बहिनों ने अलबत्ता बड़ा लुत्फ़ उठाया इस वाक़िये का और वे सब के सब भूरे को कँवर सा'ब  कह कर पुकारने लगे. यह नाम इतना फेमस हुआ कि  पूरा गाँव ही उसे कवर सा'ब कहने लगा. "अरी  सुन"! मीतू की आवाज़ ने मुझे फिर माज़ी से हाल में ला पटका, "खूब सोंच समझ कर हमने आज, एक पुतला बनाया, उस पर लिखा " भूरे  की मोहब्बत" उसे विधी विधान से  फूँक आये शमशान में! अब देख इंशाल्ला, मातारानी की कृपा रही तो अगले सावन तू तेरे मियाँ के साथ आयेगी."
मेरा मुह खुला का खुला था, और मै सोच रही थी, "उफ़! ये लडकियां!!!"