शनिवार, 30 अक्तूबर 2010





प्यार तुम्हारा शबनम बनकर डाली-डाली छिटका है
प्यार तुम्हारा रेशम बनकर मेरे मन पर अटका है

किसका ये उजियारा है जो रात को दिन कर देता है
प्यार तुम्हारा जुगनू बनकर मेरे आँगन उतरा है

अक्टूबर की गर्मी जैसे मेरे तन्हा जीवन में
प्यार तुम्हारा गुलमोहरों-सी ठंडी छाया देता है

क्या है ऐसा यूँ ही जो मेरे मन को महकाता है
प्यार तुम्हारा खुशबू बन कर मेरी रूह में उतरा है

मेरे सन्नाटे को जिसने पल दो पल में तोड़ दिया
प्यार तुम्हारा रागिनी बन कर इस जीवन में बिखरा है।


मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

सिर्फ तुम.....!!!!!




तुम्हारी
साँवली मुस्कराहट
और ये पगला सलोनापन!
कुछ न जानने की चाह
और कुछ भी न जान पाने की बेबसी
ये उलझी-उलझी अलकें
और सुलझी-सुलझी आँखे
कुछ न कहना
और सारे वादे कर लेना
काश!!!
तुम जान पाते
कि न चाह कर भी
मैंने सिर्फ
तुम्हे ही चाहा है

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

अम्मा वक्त निकालो न!


याद है
तुमने कहा था
आएँगे पीले फूल
मेरे लगाए पौधों में
तुम मुझे फिर मिलोगी
देखो
फूल तो आ गए हैं
पर तुम तो नहीं आई
जानती हूँ
पनियाएंगी तुम्हारी आँखें
इस ही गमले के पास
एक दिन जब
जा चुकी होगी
तुम्हारी बिटिया
इस आँगन को पराया कर
तुम पनीली आँखों से दर्द कहोगी
वह पनीली आँखों से दर्द पढेगी
बस....इतने रिश्ते रह जाएँगे
क्यूंकि तब तक
वह भी दे चुकी होगी
अपनी बिटिया को
यही पीले फूलो वाले बीज

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

"एक ख़त हमको मिला है आसुओं के गाँव से
दर्द अब चलने लगा है , नन्हे-नन्हे पाँव से ....."
-परवीन शाकिर

रविवार, 3 अक्तूबर 2010





"वो एक लम्हा कि मेरे बच्चे ने माँ कहा मुझको
मै एक शाख से कितना घना दरख्त हुई !!!!!!! "

-परवीन शाकिर


शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

बंद कर लो बयाज़ों को
अभी बहुत लंबा चलना है
फिर हिसाब कैसा!
कि वक्त की रहगुज़र में
कितने ही पडाव हैं
जहां सिर्फ दुःख ही हैं
जो तुम्हारा रास्ता देख रहे हैं
- लोरी

जब तुम पास होते हो
मेरे सारे जज़्बात अनाम रहतें हैं
और जब दूर चले जाते हो
तो तन्हाई
मेरे सारे जज्बों को
उनवान दे बैठती है
ये मोहब्बत की इन्तेहाँ नहीं
तो और क्या है
- लोरी

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010












जब से जतलाया है तुमने कि
नहीं समझती तुम्हे
मेरी लिखी
एक भी कविता
सच मानो!!!
तुम मुझे
पहले से ज्यादा
अच्छे लगने लगे हो