मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012


कितना सहल जाना था
खुशबुओं को छू लेना
कितना सहल जाना था
बारिशों के मौसम में शाम का हर एक मंज़र
घर में क़ैद कर लेना
कितना सहल जाना था
जुगनुओं की बातों से फूल जैसे आँगन में
 रोशनी सी कर लेना
कितना सहल जाना था
उसकी याद का चेहरा
ख्वाब्नाक आँखों की
झील के जज़ीरों पर देर तक सजा लेना 
कितना सहल जाना था
ऐ नज़र की खुशफहमी!
इस  तरह नहीं होता
तितलियाँ पकड़ने को दूर  जाना पड़ता है .
                                                      -  हुमा शफीक हैदर

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012



यादों का एक झोंका आया, हमसे मिलने बरसों  बाद 
पहले इतना रोये नहीं  थे,  जितना रोये बरसों  बाद
 
लम्हा लम्हा घर उजड़ा  है , मुश्किल से अहसास हुआ 
पत्थर आये बरसों पहले, शीशे  टूटे  बरसों बाद