बुधवार, 27 अगस्त 2014

चल रे मटके टम्मक टूँ


उन प्यारे दिनों के नाम, जब माँ रोज़ ही सोने के पहले यह सब सुना करती थी : 

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक 
चलती थी लाठी को टेक 

उसके पास बहुत था माल 
जाना था उसको ससुराल 

मगर राह में चीते शेर 
लेते थे राही को घेर 

बुढ़िया ने सोंची तदबीर 
जिससे चमक उठी तक़दीर 

मटका एक मंगाया मोल 
लंबा लंबा गोल मटोल 

उसमे बैठी बुढ़िया आप 
वह ससुराल चली चुपचाप 

बुढ़िया गाती जाती यूँ 
चल रे मटके टम्मक टूँ

                                                   - बताइये  कौन है इस बालगीत का रचनाकार 

7 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ा प्यारा सा बाल गीत .... रचनाकार की जानकारी तो नहीं , पर जानना चाहूंगी

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  2. यह तो बहुत ही प्रसिद्ध बाल कविता है।
    बचपन में बालमुस्कान में पढ़ी थी।
    --
    सुन्दर प्रस्तुति।
    पुरानी यादें ताज़ा करवाने के लिए आपका शुक्रिया।

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  3. बहुत ही अच्छी कविता हे जो पुराने दिनों की याद दिलाती हे जब हम सरकारी स्कूल में गाव में पढ़ने जाते थे पढ़कर ऐसा लगता हे मानो अभी भी उसी स्कूल में उन्ही सर से पढाई कर रहे हे

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।