सोमवार, 31 जनवरी 2011

ये रिश्ता क्या कहलाता है....?

काश! मै तुम से कह पाती, मुझे तुम से कितनी मोहब्बत है. इतनी की जब, तुम्हारे माथे पर झिलमिलाती पसीने की कोई बूँद दिखती है तो जी में आता है, उसे अपने लबों से खुद में जज़्ब कर लूं, इतनी की जब, तुम्हारी उदास आँखों की खल्वतों में झांकती हूँ तो लगता है की इसे अपनी हंसी के झाड़ -फानूस से रोशन कर दूं; इतनी की जब, तुम्हारे माथे पर जमी सफ़र की गर्द देखती हूँ तो जी में ख्याल आता है कि, उसे अपने दुपट्टे से पोंछ डालूँ!; इतनी की जब, खुद को देखूं तो बस तुम ही तुम नज़र आते हो. तुम्हे पता है, जब तुम साथ होते हो तो धड़कने बेकाबू नहीं होती, मगर एहसास होता है जैसे मै ज़िन्दाहूँ!
खुद को कई बार तुम्हारे पंखों से परवाज़ करते देखा है, मैंने नील-गगन में!
मगर क्या तुम जानते हो, "हम क्या हैं?" पति-पत्नी हम हो नहीं सकते, क्योंकि तुम्हारी निगाह में यह रिश्ता बोसीदा और पुराना है, "लिव-इन" तुम हम रह नहीं सकते क्योंकि तुम इतने आज़ाद ख्याल हुए नहीं हो और मेरे संस्कार मुझे इजाज़त नहीं देते; रहा सवाल मोहब्बत का, "झुटलाया नहीं जा सकता कि वह हम में नहीं है, अब.....??? दोस्त तुम होना नहीं चाहते क्योंकि जानते हो तुम "मै अपने दोस्तों को खुद को छूने तो दूर बेकार बातें पूछने की भी इजाज़त नहीं देती!!!!"
तुम ही बताओ! क्या नाम दे दें इसे? एक दिन मैंने तुम से पूछा था, तुमने कहा था "सिर्फ एहसास है ये, रूह से महसूस करो/हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो!" मै भी मुतम'इन हो कर खुद को उड़ा उड़ा महसूस करने लगी थी ; लगता था, कितनी खुश-किस्मत हूँ मै! मुझे अपने प्रेमी में, बैरन, पुश्किन या बर्नोर्ड शा, से कम कुछ नज़र ही नहीं आता था, पर उस दिन, जब जीत सर ने कहा था, "आओ पृथा एक एक कप काफी हो जाए" और सर झुका कर मैंने बगैर तुम्हे इजाज़त मांगने वाली नज़रों से देखे, उनके पीछे अपने क़दम बढ़ा दिए थे, वापसी में कितनी जोर से चीखे थे तुम, "तुम तो धंधा कर लो पृथा!" खून के आंसू, आँखों में ही रोक पलट आई थी मै! दादी के अलफ़ाज़ बेसाख्ता कानो में गूँज रहे थे, " औरत की शान तो बस चादर में ही है बेटी! रब ने उसे सिर्फ जिस्म ही तो बनाया है, वह कितनी ही ऊंची उठ जाए, कितनी ही पढ़ लिख जाए, मर्द को बस वह अपनी पेशानी से थोड़े नीचे ही अच्छी लगती है. मालिक ने औरत को समर्पण की फितरत दी है, और मर्द को हाकिम बनाया है." अगर तुमने उससे खुद के समर्पित हो जाने का हक नहीं लिया तो तुम फितरतन जिस दीवार पर टिकी हो उसी का सहारा ले लोगी, और वह (फितरी तौर पर, जल कुढ़ कर ) तुम्हारा इस्तेमाल कर तुम्हें फेंक एक नई औरत तलाशेगा, और फिर उसको अपने शरीक-इ-ज़िंदगी बना धीरे से फुसफुसाएगा,"जानती हो! गंदी औरत है वह!" बहुत कम मर्दों में औरत को ऐसे मोहब्बत करने की ताक़त होती है, जिसे जिस्मानी मोहब्बत नहीं कहते, सही मानो में ऐसे मर्द ही, खलील जिब्रान हो जातें हैं! मर्द कम फ़रिश्ते!!! .......दस् औरतों से टिका मर्द, मर्द ही कहलाता है, और दो मर्द ही ज़िंदगी में आ जाएं न! तो, हम खुद को ही नापसंद करने लग जातीं है !"
आज महसूस हुआ दादी सही थी, वाकई जीत सर से नोट्स हासिल करने के लिए तुम्ही ने तो मुझे उनसे मिलवाया था, और जब मेरी ज़हानत की तारीफ़ करते करते उन्होंने तुम्हे नोट्स दिए थे, तब तो तुम्हे कुछ नहीं लगा था, शुक्र है रब का, बोट क्लब में साथ साथ खड़े होकर कोफी पीते वक्त जब तुम मुझे हाथ लगाने की मिन्नत कर रहे थे, मैंने तुम्हे छूने नहीं दिया! हालांकि पिंकी ने मुझे कहा था,"क्या पृथा! तुम अपने नाम की तरह ही पुरानी हो! हाथ नहीं लगाने दोगी तो, तुमसे शादी कैसे करेगा वह!" (तब पता नहीं था, कि शादी तुम्हारी नज़र में आउट आफ फैशन है, पर तुम्हारी मर्जी के बगैर कहीं चले जाने पर तुम आसमान सर पर उठा लेते हो ) समीकरण बहुत तेज़ी से बदल गए हैं दोस्त! आज जाना कि चादर में सुकून है, बहुत सुकून! मै कोई धर्मात्मा नहीं हूँ ,जो अपना शरीर ,मन, आत्मा और प्यार तुम्हे दान दे दूं !अगर कोई सामाजिक सम्बन्ध कायम करने की हिम्मत है तो ही मुझसे कुछ भी चाहने की इच्छा करना, वरना दादी ने कहा है, "बेटी! मर्द वही होते हैं जो ख़म फटकार के औरत को इज्ज़त, घर और मोहब्बत दे सकते हैं, वरना औरत का साथ तो भ....ड....(जाने दो!) को भी मिल जाता है,
और हां! एक बात सुन लो! मुन्नू हलवाई तुम्हारी तरह इंजिनीअर नहीं, मगर उसे मेरे रहन सहन, तौर तरीकों से कोई गुरेज़ नहीं , वह मुझे परदे में भी रखेगा और पढने भी देगा! मैंने खूब सोंच समझ कर फैसला लिया है कि जब दादी के अनुसार मेरी फितरत ही मोहब्बत है, तो क्यों न ये किसी सही आदमी को दी जाए, वह मुझसे शादी करने को तैयार है, हम अगले माह की दो को शायद तुम्हारा मूह भी मीठा करवा दे, "क्योंकि दादी ने कहा है, आदमी डिग्री या काम से बड़ा नहीं बनता, बल्कि ज़हानत या आदमियत से बड़ा बनता है,"
सुनो! तुम दुआ करना उप्पर लिखा सारा प्यार मैं मुन्नू से कर सकूं, शायद आगे की ज़िंदगी जीने में आसानी हो जाएगी! और हाँ! कभी कभी दादी के पास आ जाया करना, मेरे जाने के बाद वह बहुत अकेली हो जाएँगी! शायद तुमसे खुश होकर वह तुम्हे भी बता दें कि "सही मर्द" क्या होता है, भई! मेरी ज़िंदगी तो उन्ही की सलाहों से सुधरी है, "शुक्रिया दादी" कहे बगैर मत आना ,उन्हें अच्छा नहीं लगता,, हाँ! दोस्त तो तुमने मुझे कभी कहा नहीं, पर अगर दुशमन नहीं मानते तो मेरी सलाह मान कर देखना! एक बार दादी के पास ज़रूर जाना, ज़िन्दगी ठीक ठाक जीने का हुनर आ जाएगा! अच्छा अब ख़त्म करती हूँ
कहा सुना माफ़ कर देना.
तुम्हारी
मैं .


सोमवार, 24 जनवरी 2011

" कैसा है बंधन.........!!!! "







कभी कभी ज़िंदगी जिन अनुभवों से दो चार करती है, उन्हें भुला पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन हो जाताहै, मेरे "नेट-भाई" से मेरा जुड़ जाना इतना ही प्यारा अनुभव है.जी हाँ! इस हाई टैक युग में, चचेरे, ममेरे. मौसेरे का स्थान भी मोबाइल भाई, नेट भाई, चैट भाई ने ले लिया है. और रिश्ते की गरिमा में रत्ती भर फर्क भी नहीं पडा है."शैमी" से मेरा जुड़ जाना एसा ही एक टैक्निकली-एक्सपेरिमेंटल" अनुभव है. बात उस समय की है, जब मै घोर शारीरिक एवं मानसिक अनुभवों के दौर से गुज़र रही थी, एक के बाद एक अचानक से इतनी समस्याओं से अकेले कोई निबटे भी तो कैसे निबटे? वह वक्त जो कभी अपने थमने के सपने सजाया करता था, वही वक्त अचानक से इतना थम गया था कि मै रो -रो पडी थी, बिस्तर पर पड़े- पड़े बस एक ही दुआ करती थी:
"मै तन्हाँ हूँ आखिर किससे बात करूँ?
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न "
अल्लाह ने एक दिन मेरी सुन ली मुझे मेरे जैसा, अपने उम्र से पांच एक साल छोटा, एक "इन्टर नेट भाई " मिला, मेसेज से आगे निकले, खैर- ओ - खैरियत पर आए, सुख- दुख, स्कूल , कोलेज, बाजार, बगीचे, किताबे, गीतों, गज़लों और नज्मो की पगडण्डीसे होते हुए कब् जिन्दगी की फिलोसफी पर आ गए, मालूम ही नही हुआ.
हम दिन दिन भर गपियाते, देर रात तक गपशपाते, कभी कभी चाँद देखते, कभी ठंडी हवा और बदलते मौसमों का तब्सिरा करते. मै अक्सर ही चाय बना कर लाती और दूर बैठे, उस अनदेखे अजनबी भाई से गुहार लगा कर पूछती भी!!! "सुनो छोटू!! चाय पियोगे?" "हँ हाँ! क्यों नही, जरा मलाई मार कर लाना" वह भी उसी मोहब्बत से जवाब देता! हम "चीयर्स !!! " करके पीते भी! अम्मी हमारी इन हरकतों को देख कर मुस्कुरा कर रह जातीं!
कल तक जो मेरी बीमारी की वजह से दुखी थी, आज मेरे एक प्यारे से भाई को देख कर बड़ी मोहब्बत से कहतीं : "मै तो समझती थी, अब तुम्हे मै कभी छोटा भाई नहीं दे पाउंगी! सच है भाई, अल्लाह जिसे चाहे जो अता फरमाए!!!
अपनी ज़िंदगी की जंग में, बेहद तन्हाँ "मुझ" को अचानक ही, अम्मी अब्बू के घर गुज़ारे बचपन के वह दिन याद आ जाते जब, हम सब भाई-बहनों का कमरा साझा हुआ करता था, सबके पलंगो के बीच सरहद का काम करती उस टेबल की याद आते ही मुझे लगता, इसके एक ओर के पलंग पर मै हूँ और दूसरे बाजू शैमी (यों नाम तो उसका एहतेशाम है, पर मैंने उसे "शैमी" कर दिया है ), हम दूर नहीं हैं, मानो एक ही कमरे में बैठे , एक माँ जाये दो सग्गो से भी सग्गे भाई बहन!
अब वह आम भाई बहनों के जैसे मुझ से लड़ने और लाड भी लड़ाने लगा था, मसलन कभी कहता, "यार अप्पी! कित्ती मुटल्ली हो गयी हो आप!" या फिर "सच्ची अप्पी! काले कपड़ों में तो भूत ही नज़र आती हो आप!" मुझे भी आम बहनों की तरह उसकी फिक्र होने लगी थी; मुक़र्रर वक़्त पर, उसके आन-लाइन न होने से, मै घबरा जाती! बिलकुल ऐसे ही उसकी राह देखती जैसे कोई बड़ी-बहिन, रात को देर से घर आने वाले भाई के लिए, दहलीज़ पर फिक्रमंद खड़ी हो; उसके लिए दुआएं करते मेरे लबो पर बरबस ही थिरक उठता," ऐ अल्लाह! इसको इम्तेहानो में कामयाब कर "
कभी हमें एक दूसरे को देखने की ख्वाहिश नहीं हुई, पर ऐसा भी नहीं लगा कि हम निरे अजनबी है, एसा लगता था, जैसे एक-दूसरे को इतना नज़दीक से जानते हैं कि बिना कहे सुने सब देख लेते हैं, मुझे लगता जैसे एक ही किचन में, बड़े से उस पटले पर बैठ हमने साथ साथ खाना खाया हो , जिस पर अम्मी छुटपन में मुझे और चार साल बड़े भाई को साथ साथ खिलाती थीं, अक्सर काम पर जाने की जल्दी में, रोटी के नन्हे-नन्हे टुकड़े कर, उसे सालन में डुबो कर निवाले बना रख दिए जाते थे, जो अम्मी की मजबूरी समझ हम बेमन से निगल लिया करते थे, और लगता है, जब मै, अम्मी की कमी को शिद्दत से महसूस कर अह्सासे-तौहीन से रो पड़ती थी, तो जो नन्हे- नन्हे हाथ मेरे आसूं पोछा करते थे, शायद वो भी तुम्हारे ही थे.
अब मै धीरे धीरे अच्छी होने लगी थी, बिस्तर से मेरा राबता और फुर्सत में गपियाने के मेरे पल भी कम होने लगे थे, ऑफिस भी पार्ट- टाइम ज्वाइन कर लिया था, शैमी भी गले-गले वकालत की पढाई में डूब गया था, साथ धीरे धीरे कम होता जा रहा था एक रिश्ता था जो किसी बंधन में न जुड़ कर भी एक प्यारे बंधन में दिन पर दिन गुन्थता जा रहा था. एक ऐसा रिश्ता जो, निह्स्स्वार्थ भाव से बंधा बस किसी अनदेखे "उस" के सुख, "उस" की शान्ति और "उस" की खुशी के लिए था, वही, सच मानो तो, मेरे उन अकेले, और अधूरे दिनों की ताक़त था.
.जानती हूँ शैमी! वक्क्त के जिस बहाव ने हमें मिलाया, एक दिन वह हमें अलग भी कर देगा. पर मेरे नन्हे अजनबी दोस्त!!! तुम्हारी इस मदद को ज़िंदगी में कभी नहीं फरामोश कर सकूंगी मै! सच मानो!! तुम्हारी कामयाबी और कामरानी के लिए, हवा में मेरी सब अंगुलियाँ, शादाबियाँ लिखती रहेंगी......दुआओं के ज़रिये....
तुम्हारी अप्पी
लोरी.

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

तुम मै और वह

पुरुष होना कित्ता आसान है न प्रीतिश!!! तुम जब पहली बार मिले थे, धडके तो हम दोनों ही थे पर तुम्हारी हिप्पोक्रेसी ने छीन लिया मेरा वह प्यार जो अब भी कायम है (प्यार मरता नहीं है, कही गुम हो जाता है, किन्तु तुम्हारा तो गुम ही नहीं हो रहा है ) जब तुमसे पहली बार मिली थी तब ही से मन में तुमने जगह बना ली थी , क्किन्तु जैसे ही जाना, रुचिका और तुम्हारे प्रेम के घरौंदे पर मेरा पाँव अनजाने ही पड़ रहा है, मैंने अपने क़दम खींच लिए, मै जानती हूँ तुम उसका पहला प्यार हो, शायद वह भी तुम्हारी!! न प्रीतिश! मुझे गलत मत समझना, मै तुम्हारे और उसके बीच नहीं आयी थी, बस!!! एक दोस्त के नाते आयी थी, जिस दम उसने बताया कि तुम और वो बहुत आगे निकल .....,!!! (आज भी अपने गर्दन पर तुम्हारे स्पर्श को महसूस करके पागल हो जाती है वो ) बस!!! उसी लम्हे तुम पर गुस्सा आया था मुझे!!! जब ज़िंदगी में , वह स्थान खाली है ही नहीं तो मेरे साथ क्यों खेल रहे हो तुम!!!! और अब तुम ऐसे पागल पन भी करोगे कि मेरे उदगार जानने के लिए स्पीकर ओन करके, उससे मेरी बात करवाओगे, फिर जब मै चाह कर भी तुम्हारे फेवर में कुछ न कह पाउंगी तो तुम उस "कुछ -नहीं " को हकीकत मान लोगे? जब कि तुम जानते हो कि मै भी जानती हूँ कि "सुन रहे हो तुम सब कुछ."
रुचिका भी खेल सकती है मुझे पता है, वह खेल रही है मिझे यह भी पता है बस शर्म आती है तो इस बात पर कि यह बिलकुल एकता कपूर के नाटक जैसा हो रहा है, प्रीतिश!!! कई बार शब्द सच नहीं होते! (मैंने तो आँखों पर भरोसा किया था, तब भी हारी हूँ ) मै हर बार तुम्हारे लिए बेहतर कहते कहते रह जाती हूँ क्योंकि जानती हूँ, "रुचिका बर्दाश्त नहीं कर पाएगी " और अगर इसे तुम मेरी कमजोरी या उदगार समझ कर रुचिका के ज़रिये, स्पीकर ओन कर के सुन रहे हो तो , मै मानती हूँ कि यह तुम्हारी कमजोरी है! हाँ रुचिका से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध है तो उसे निभालो, "वक्त खुद अपने परिभाषाएं, और ज़रूरतें तय कर लेता है!
ज़िन्दगी भागती गाडी की खिड़की से धुन्द्लाये मंज़रों जैसी होती है, कुछ भी ज़हन के पल्लों पर ज्यादा देर नहीं टिकता! इसलिए मेरे दिल की परवाह किये बिना एक सही फैसला जल्दी ले लो, पर रब के लिए किसी से खेलो मत!!! क्योंकि खेलने वाले से ज़िन्दगी खेल जाती है, मै जहां रहूँगी, तुम्हारे लिए दुआगो हूँगी, क्योंकि प्यार तो मैंने तुमसे किया है, चाहे अनजाने ही!!! बस जहां रहो खुश रहो!!! रब तुम्हे दोस्तों और दुश्मनों के बीच का फर्क जानने की तहजीब अता करे!
- आमीन!!!
लोरी

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

अकेलापन



उसी रह-गुज़र पर
जहां से गुज़र कर
न वापस हुए तुम
बिचारा सनोबर
झुकाए हुए सर
अकेला खडा है
-मोहम्मद अल्वी

रविवार, 2 जनवरी 2011

"शी वाज़ नॉट वर्जीन "



याद करूँ क्या बोलो
उन रिक्त रीते क्षणों को
जबकि तुमने
चूमा था मुझको
पहली बारिश के नशे में

याद करूँ क्या बोलो
जबकि मुस्कुराए थे तुम
पहली बार उस क्षण को याद कर

याद करू क्या बोलो
उस गुलाबी अहसास को
जो जिया था मैंने
जबकि तुमने मुझे लाड से
बुलाया था, एक नया नाम देकर

याद करू क्या बोलो
जबकि तुमने मुझे अपना कह कर
मांग ली थी एक पूरी शाम

याद करूँ क्या बोलो
उस शाम के बाद बदले तुम्हारे तेवर
या मेरी रोती -बिलखती बेबसी
महीनो तुम्हारे बंद हो गए दरवाज़े पर

या कि याद करू
मेरा निराश हो, किसी और का
हाथ थाम चले जाना
और तुम्हारा पीछे यह कहना
"तुम्हे पता है!
शी वाज़ नॉट वर्जीन "
(दोस्त राधिका के नाम जिसने इस घटना के बाद आत्म-हत्या कर ली )