बुधवार, 28 अगस्त 2013

सावन की इस सुबह



सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

आँगन में पौधों पर
 
फूलों पर, पत्तों पर
बरसाती खुशबू से
मुझ पर ही क्यों छाये

खिड़की की चौखट पर
 
मौसम की आहट से
बरसाती झोंकों में
पगलाए वंशीवट से
यमुना के तीरे तीरे
श्याम सलोने नटखट से
राधा की पायल से गुंजित
वृन्दावन के पनघट से
स्मृति की नदिया में
अश्रुपूरित नीरव तट से
कालिदास के मेघ सलौने
बोलो! मुझको क्यों भाये 

सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये? 

                               

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

न राधा न रुक्मणी




प्रिय सारंग,
           खुश रहो

बारिश के बीच तुम यों मिल आये जैसे बहुत उदास दिनों के बीच कोईं मीठी सी याद.  एकदम से भरे बाज़ार में पुराने दोस्त का मिल जाना, और कॉफ़ी  की गरमागरम भांप की बीच से झांकता अतीत का एक टुकड़ा। सब कुछ कितना ख्वाब्नाक, कितना किताबी।  हर मोड़ पर इंतज़ार करते तुम और मेरी न रुक पाने की हज़ार मजबूरियों के बावजूद हमेशा रुक जाने की तमन्ना।  सारंग ! तुम्हारे हमेशा की तरह अपनी बोलती आँखों से मुझे देखना और मेरे चहरे पर तुम्हारी निगाहों की झल  लगना. सब कुछ वही है, सब कुछ
तुम्हारे पुकार लेने पर मेरा मुड़ कर देखना और मेरा "एक मिनट आयी !" कहने पर तुम्हारा लम्बी देर , मेरे इन्तेज़ार में रहना ! सारंग , सब कुछ वही का वही है, सब कुछ।  कुछ  बदल गया तो वह मेरा वक़्त और शायद  थोडा सा तुम्हारा भी।

           तुम बहुत उदास लग रहे थे, मुझसे थोड़े रूठे और थोड़े नाराज़ भी।  फिर भी मै शर्तिया कह सकती थी, ऐसा कभी नहीं होगा  कि मुझे देख कर तुम मुझे न पुकारो, जबकि मेरी हर धड़कन यह चाह रही हो कि  एक बार तुम पुकार लो.  शिकवे तुम्हारी आँखों में मचल रहे थे, कितने रंग आकर जा रहे थे, हर बार बस एक रट !  "क्यों क्यों!!  मुझमे क्या कमी थी तुमने मुझे क्यों छोड़ा? बताओ मुझे !!!"
मै  समझती उससे पहले ही मेरी आँखें जल थल, अब मै  क्या कहती , तुम इतने दिन बाद मिले थे,पता नहीं लगा पा रही थी कि हममे वह रिश्ता बाकी है या नहीं जिससे में बड़े अधिकार से कहा करती थी, "बस! अब तुम हर बार की तरह मुझ  ही पर डाल  दो"

              सारंग! 
 " तुमने जो कुछ किया शराफत में, 
                                  वह निदामत भी मेरे सर आयी "

मैंने तुम्हे बहुत सहजता से स्वीकारा था, समाज, समय ,सार, ऋतू वार सब सीमाओं से आगे, क्योंकि मैंने तुम्हे अपना दोस्त माना था. हममे कोई और ऐसा रिश्ता नहीं था, जिसे अक्सर मेरे तुम्हारे साथ होने पर लोग ढूँढ कर थोडा बहुत खुश हो लेते थे .  तुम भूल गए तुम और हम भी तो इसे देख सर ही पीटा करते थे. हां ! वक़्त बीता, मै तुम्हे, तुम्हारे नेचर, तुम्हारी आदतों को पसंद करने लगी।  शायद अब कोईं  नया रिश्ता बनने गुंजाइश होती।  लेकिन कोई था, जिसने मुझे, सारे भगवानो की दुहाई दे समझाया था कि  तुम्हारे और उसके बीच कायम दर्द का रिश्ता अब जिस्म के रिश्तों की सीमाएं भी लाँघ चुका है, और मै  सिर्फ आ ही नहीं रही, बल्कि क़यामत बन, तुम दोनों के बीच आ रही हूँ।  
 
सारंग ! दो रूहों का रिश्ता 'माफ़ करने का ज़र्फ़ जानता है, पर दो जिस्मों का रिश्ता……." इसमें माफ़ करदेने के लिए बड़ा कलेजा चाहिए, यह वही अमल है जिसके बारे में रब ने कहा है "और अंत में वही अमल भारी होते हैं, जिनको यहाँ करने में बड़ा भार लगे"
उसके बाद, सच मानो!  मै  बहुत डर  गयी थी और अपनी वजह से तुम्हे किसी आज़माइश में डालना नहीं चाहती थी। मेरी वापसी ही सबके लिए मुफीद थी सो सो क्या करती! मै पलट आयी।  प्यार मरता नहीं और जो मर जाता है वह प्यार नहीं होता! मेरा प्यार हवाओं में बिखर कर संगीत में बदल गया जो अब तक ताज़ा है.
 
                     बेशक जब किस्मत ने हमें तुम्हे मिलाया , मै  एक अधूरी इबारत थी और तुम तुम्हारी ज़िदगी के मुखड़े पर अंतरा  जमाने की कोशिश में थे. मै  नहीं जानती कि कितनी पंक्तियाँ  थीं जो तुमने गाहे-ब -गाहे लिख कर मिटाई थीं ,(शायद वह वैसी ही एक पंक्ति थी )  तुमने  किस किस पंक्ति  को अपने साज़ पर संगत देने को सम  पर उठाया, कितनों  की सरगम में अपनी लय  ढूँढने  की कोशिश की मगर इतना ज़रूर जानती हूँ जब मेरी लय  तुम्हारी ताल से अनजाने ही अपनी ताल मिला बैठी थी हर सुनने वाला झूम उठा था हर कोईं  किसी न किसी रूप में इस सम  को कायम रखने की सलाह भी दे बैठता था. मै  क्या करती, बस्स ! मुस्कुरा कर रह जाती , जानती थी, जिस दिलचस्प नोवल को पढने के लोग ख्वाब देख रहें हैं, हम दोनों ने मिल कर कभी उसका प्रीफेज़ भी नहीं लिख पायेङ्गे.
                             सारंग!  मै रुक्मणी नहीं बन सकती थी जिस्मानी रिश्तों की सरहदों के आगे मै राधा बन गयी।  बेशक तुम अपनी राधा से जुड़े रहे और अपनी रुक्मणी के दर्द धोते रहे, पर क्या तुम जानते हो की तुम किसके लिए थे?   राधा तो अधूरे नसीब लेकर आयी थी, पर रुक्मणी! उसे क्या मिला !!!  तुमसे जुड़ कर भी वह तुम्हे पूरा कहाँ पा सकी ?

आज  जब तुम मुझ से शिकवा कर रहे हो, मै  भी  तुमसे शिकवा करना चाहती हूँ।  मुझे ज़िन्दगी के तमाम उजड़े रस्ते मुबारक, तमाम बेचैनियाँ मुबारक , तमाम गहन मुबारक !!! पर तुम अपनी रुक्मणी को खुदारा! इस रास्ते पर मत डालो कि  यहाँ चलना सब के बस का रोग नहीं !
                                                                                             पूरे हो जाओ सारंग!
                                                                                                         और उसे भी मुकम्मल कर दो
                                                                                                                                     तुम्हारी
                                                                                                                                                राधा         

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

अबके बरस भेज भैय्या को बाबुल .....

                   

 वही सावन, वही राखी ,वही झूले,  वही मेले 
मगर एक हम नहीं है बस, खलिश भी है तो इतनी सी 
वही सखियों का झुरमुट है ,वही आँगन ओ पनघट हैं 
मगर एक हम नहीं है बस, खलिश भी है तो इतनी सी

 कंहाँ  बाबुल को फुर्सत है, जो भेंजें भाई को हम तक
कंहाँ  हम पास ही में हैं!  जो आयें बस यों हिचकी पर 
भुआ भी आ गयी हैं और   घर में तीन बहिने हैं,
मगर एक हम नहीं है बस, खलिश भी है तो इतनी सी 

हमेशा की तरह इस बार भी छोटू घर सजाएगी 
मंझली तो किचन में ही अपने रंग जमाएगी 
 गुड्डी कूदती आँगन में भैय्या को खीजायेगी 
ऐसे खुशनुमा घर में हमारी  याद आयेगी ?
वही गुडियें ओ चिड़ियें  हैं, वही  पीपल ओ बुलबुल है 
मगर एक हम नहीं है बस, खलिश भी है तो इतनी सी 

क्यों बाबुल तुमने ब्याहा और हमें परदेस को बाँधा 
तुम्हारे दिल के टुकड़े को किसी के देस को बाँधा 
सभी साखियें हमारी तो हवा का हाथ पकड़ें हैं,
हमहीं  बस यूं  बड़े  गुमसुम,कड़े बंधन में जकड़ें हैं
मिली है धूप हमको बस उतनी सी या इतनी  सी 

 अबके आयेंगे तो हम, न घुघंटा आड़ ओढेंगे
तितली और चिड़िया संग बच्चों से ही दौड़ेंगे 
कहे देतें हैं बाबा हम न जल्दी भेजना हमको 
  लुकेंगे हम वो पहले से, और तुम खोजना हमको 
यहाँ तो मौज भी बापू मिली हमको तो कितनी सी 
मगर एक हम नहीं है बस. ………… 
  
-लोरी 


   



बुधवार, 14 अगस्त 2013

आज़ादी और नीम

                         

अम्मा के हाथों पनपा और  देस के जितना बूढा था
अंगनाई का नीम हमारा  दिखता  रूढ़ा  रूढ़ा  था  

एक गुलामी एक आज़ादी , कितने  मौसम देखे थे 
 बाबा के संदूक में ज्यों , कईं पुराने लेखे थे 

नीम के नीचे पंछी थे और, दानो का अम्बार  लगा 
सारे मिलकर चुगते थे,  भगवन  का दरबार सजा 

लकड़ी सबकी, पत्ती सबकी और निबौली सबकी थी 
 उसकी छाँव में घुलती मिलती , बानी बोली सबकी थी 

शाम  पड़े गय्या का  खूंटा, संजा गरबे नीम तले 
दादी की तस्बीह के दाने, और तक़रीरें  यहाँ पले 

रामशरण या गुरुचरण हो सबकी पट्टी यहीं  पुजी 
मीरां  की आवाज़ भी गूंजी, श्याम की बंसी यहीं बजी 

सबसे पहले चूल्हा गढ़ कर  दादी दाल पकाती थी 
गाँव की सारी बुढ़ीयें मिल कर रोटी सेंकने आती थीं

इसका उसका, मेरा तेरा चूल्हा सबका अपना था 
हरियाता  चढ़ता यौवन को,  नीम भी सबका अपना था

धूप  हवा और पानी पंछी  जैसे अपने सबके थे 
पीर का हलवा सबका था और ठाकुर जी भी सबके थे

कौन है कौनसे दीन धरम का फाग  में ढूंढना मुश्किल था 
गोरों के आने के पहले , राग ये ढूंढना मुश्किल था

न कोईं राजा, न कोईं  परजा, न कोइ पहरेदार ही था 
न तो सियासत बिकती थी न नेता कोई खरीदार ही था  

 बात ये तब की है जब हम सब साथ में रोते हंसते थे 
हिन्दू मुस्लिम कहाँ हमारे  मुल्क में इन्सां  बसते थे 
                                                                  
                                                           -लोरी अली 



शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

शिकवा चाँद का



चाँद बादलों की ओंट ही राह ताकता किया 
और रस्म-इ-ईद ज़मीन पर आकर चली गयी 

ईद तो नाम था, दीद ए  माहताब का 
अपने चाँद को ये कैसे भुला कर चली गयी

ऐ ज़मीं ! ये मोहब्बत तेरी चाँद से !
तू अन्धेरे में ईदें मनाकर चली गयी

माना खुशियाँ  तुझे भी तो दरकार थीं 
माना, तू भी तो खुशियों की हक़दार थी

मैंने  खुशियाँ भी बाँटी थी तुझको कभी 
तू तो ईद में भी मुझको रुला कर चली गयी

तू ही कहती थी मुझसे कभी प्यार में 
तेरे दम से ही ईदें हैं संसार में

ये ईद जानां! कोई  ईद है 
जो तेरे  बगैर आयी और आकर चली गयी  

 - सहबा जाफरी