मंगलवार, 26 जून 2012

मेरी शादी....




"बीबी! अब तो हो लो अपने घर की,
कब तक अम्मा की छाती पे मूंग दलोगी!"

ताई अम्मा का जाना पहचाना फिकरा, और हम भी क्या कम गिरते हैं!  " अरे काहे ना दलें! हमारे अब्बू ने और जो मंगा दिए हैं!" किराने के सामान से हमने भी उन्हें मूंग की थैली दिखाते हुए ज़ुबान लड़ाई, मम्मा ने सलाम फेरा, जानमाज़ से उठीं और बड़ी बड़ी आँखों से हमें घूरते हुए, मूंग की थैली झपट बावर्ची खाने में आ गयीं. 'अरे बिट्टो! तुम्हारी अक्ल तो सास ही ठीक करेगी!' ताई अम्मा बड़बडाई. लो जी! अब हमारी सास के पीछे पड़ गयीं, शुक्र मनाओ के बड़ी अम्मी हो, ग़ैर होती ना तो हम देखते अबी! हमने भी दिल ही दिल में उन्हें धमकाया .अरे! ज़ोर से धमकाते तो मम्मा हमारा तिक्का बोटी कर देतीं.

सोचने वाली बात है, मीना गयी, रीना गयी सबकी शादी हो ली, गरज ये कि मोहल्ले की हर लम्बी-मोटी, ऐरी-गैरी सब निपट गयीं, अल्ला मियाँ! ये तू हमसे ही क्यों सारे इम्तेहान लेता है! अरे हम ही नहीं पूरे शहर, घर, मोहल्ला, खानदान, और इसका एक एक फर्द ज़ोर लगा रहा है, बिन्दु जी महाजन, अनजान बाजी, बिन्गारे अंकल, नन्हे मामू, मुन्नी आपा, शिबली भाई, संसार और हमसफ़र मैरिज ब्यूरो, हिदुस्तान मेट्रीमोनी, और समाजी रिश्ते सबने अपने अपने लेवल पे पूरा ज़ोर मार दिया है, और कहीं लोग ज़ात बिरादरी का बैर रक्खें पर हमारे केस में तो भारत की लोकतांत्रिक एकता का नमूना ऐसा दीख पड़ता है कि शर्मा , मेहरा, मिश्रा अंकल, सतनाम चचा, जूरानी आंटी सबने अपनी पूरी पूरी कोशिश करली है.  हालत ये है  कि काम वाली बाई के साथ बर्तन जमवाने खड़े हो जाओ तो वो भी एक दो रिश्ते बता देती है, फिर भी कबख्त हमारा नसीबा, टस से मस नहीं होता. सेहरे के फूल खिलने की दुआएं देते नाना मियाँ, दादी अम्मी, और नाना अब्बू सब अल्लाह को प्यारे हो गए, पर वह हमारा नौशा! अल्लाह जाने सेहरे में कौनसे बेशर्म के फूल लगा कर आने वाला है जो खिल ही नहीं रहे.

अब देखिये ना इन लड़के वालों को! अरे इनका लड़का काला होगा तो हमें आटे की सफ़ेद बोरी कह कर रिजेक्ट कर देंगे, इनका लड़का गोरा हुआ तो हमें कोयले की खान कह दिया जायेगा. इनका लड़का कम पढ़ा लिखा होगा तो हमारे क्वालिफिकेशन सुन कर कहेंगे कि " अल्लाह ! क्या सारे कुनबे के हिस्से का इन्होने ही पढ़ डाला! और लड़का भोंदू हुआ तो हमें कहा जायेगा, "बड़ी तेज़ तर्रार है.", इनका लड़का मरगिल्ला होगा तो हमें कहेंगे "मुटापे का ये आलम है कि चार पांच लड़के लगेंगे उससे शादी को!"  और इनका लड़का मुट्टा निकला तो आपको रिजेक्ट करने की वजह देखिये, " अई गोईं! कां माशाल्ला हमारा खाता पीता शाहिद! और कां वो तख्ता लडकी!. उन्हें आँख उठा कर देख लो, तो कहें कि "अल्लाह! आजकल की लड़कियों की आँखों में शर्म ही नहीं " और ना देखो तो, " अई भेन! (अरी बहिना!) हमें लगे भेन्गी है".

अब्बू बेचारे! कल ही शादी के धंधे  में नए नए उतरे मुन्ने मियाँ  अब्बू से बाते कर रहे थे, " कूँ खाँ! क्या हुआ बेटी का!" तमाखू मलते मलते अब्बू की दुखती रग पर आहिस्ते से हाथ धरा मुन्ने मियाँ ने!
"अरे कहाँ अभी! " अब्बू ने किसी हारे हुए जुआरी की तरह आसमान की तरफ देखा. "आप बी ना सा'ब! अव्वल तो लडकी को इत्ता पढ़ाना नी, और पढ़ाओ तो लोगों को बताना नी! अरे हम भेज रए हैं दो एक !! आप उनसे पढाई का तो ज़िक्र ही मत करियेगा, बाकी हम देख लेंगे,  अरे साब ऐसे हीरे लखीने हैं कि ज़िंदगी भर आप मुन्ने मियाँ को याद करेंगे हाँ! एक बखत लडकी ज़रूर दिखा देइय्ये हमें!  अब्बू ने इशारा किया "वो देखो, जो खेत में नए ट्रेक्टर का ट्रायल ले रही है ना, वही है मेरी बेटी!"  और हम! धम्म से कूदे ट्रेक्टर रोक, तो मुन्ने मियाँ सहम कर दो क़दम पीछे हो लिए. सलाम चचा! हमने एक सलाम ठोंका, " हे हे! ख़ासी अच्छी है मियाँ बेटी तो! चचा मुन्ने हिनहिनाये, तुम पोडर वोडर नई लगातीं बिटिया! कोईं आये तो ज़रा लगा लिया करो." जी चचा मियाँ! हमने भी स्टोल से सर ढांक लजाने की एक्टिंग की. "कुछ याद है आपको? " " जी बहुत कुछ "  मुन्ने मियाँ के मुंह से निकला नहीं कि हमने लफ्ज़ उचक लिए, "कार हम चला लें, बस हम चला लें, ट्रेक्टर का तो आप नमूना देख ही चुके हैं,  माशाल्ला से खासे पढ़ भी लियें हैं"  " अरे मेरा मतलब है सीना पिरोना!"  अब चचा मुन्ने ने पैंतरे बदले. "आप फ़िक्र मत करिए फटा सिला, रफू रंगाई, हम सब में माहिर हैं!  हमने निहायत भोलेपन से जवाब दिया."  चचा मुन्ने अब खुश दिखे, "अल्लाह ने हमें फ़रिश्ता  बना के भेजा है आपकी  बेटी के लिए! " "आयीं! कहीं ये चचा मुन्ने ने ही तो मुझे अपने चौथे निकाह के लिए सिलेक्ट नहीं कर लिया! " मैंने घबरा कर आँखों ही आँखों में उन्हें तौला, "हम्म! एक ठंडी सांस ली मैंने" , बहरहाल चचा मुन्ने ने अगले ही दिन एनाबाद वालों के यहाँ से जीप भर के लड़केवाले भेज दिए, हमें खबर नहीं,  हम उनकी जीपों की चिल्लपों सुनकर सोंच रहे थे, अल्लाह खैर ! कहाँ डाका पड़ गया.

नाश्ते सजाये गए, घर की सुथराई भी हो गयी, दालान की बेलों से मधुमक्खियों के छत्ते हठाये गए, और मेहमान भी आ गए. जीपें सय्यदवाड़ी के परले सिरे खड़ी करवा दी गयीं, वाह! एक जीप पे हमारा दिल भी आ गया. सब लोग मेहमानों की खातिर में लगे थे और हम छत से जीप देख रहे थे, इत्ते में भाईजान टपक पड़े, पके आम की तरह, "तुम यहाँ क्या कर रही हो? "  बेमौसम के सवाल.
"अरे! क्या कर रही हो का क्या मतलब है, हमारे लड़केवाले, और हमीं नई देखें! वाह मियाँ! " " हम्म! देख लो, मगर ज़रा जल्ली कल्लेना" भाई ने जवाब में कुछ ऐसे कहा कि लगा कि मै बाथरूम के दरवाज़े के 'इस' तरफ खड़ी हूँ और भाई,  'उस' तरफ. मेरी लार जीप को देख बेसाख्ता टपक रही थी, कि अल्लाह ने एक नन्हे को नाजिल कर दिया, छोटू! मैंने धीमे से आवाज़ दी. "हमें बुला लही हो? " जवाब में नन्हे ने सवाल दागा. "हमाला नाम छुम्मन है" निहायत नवाबी अंदाज़ में उसने जवाब दिया. "छुम्मन! मेरी जान! ये जीप किसकी है." मै मुंडेर से पूरी लटक गयी.  "फ़य्याज़ भाई की! उनके लिए ही तो दुल्हन भाभी ढूंढ़ने आये हैं हम! " ":अच्छा! पुचु पुचु मेरा बच्चा! जाओ जाकर फ़य्याज़  भाई से चाबी लेकर आओ, कहना दुल्हन भाभी मंगा रही हैं." "नहीं देंगे! किछी को नहीं देते!" उसने अपनी गोल गोल आँखों को और गोल करते हुए कहा, "अरे तो मियां! उड़ा लाओ, घूमना है कि नहीं! " कहते हुए मैंने उप्पर से एक चोकलेट फेंकी . अल्लेवा! हमें भी ले चलोगी; उसने चोकलेट लपकी, " अबी लातें हैं."  जियो मेरे लाल! काम हो गया!! मै पिछले दरवाज़े से नीचे भागी, कहाँ जा रही हो, "तुम्हारी बात आयी है बन्नो!" ये ताई अम्मा ट्रेफिक पुलिस की तरह गलत जगह ,गलत वक्त ही टपकती हैं; "जजी! इस्तरी ख़राब हो गयी,खान आंटी के यहाँ से प्रेस लाऊं ना अब! क्या सोचेंगे वो लोग!" जाओ! मेरी बेटी! ज़बरदस्ती बालों में हाथ फेर दिया  ताई अम्मा ने! अरे सुन! लुकछुप की जाइयो! कोई देख ना ले. मैंने जवाब में एक मुस्कराहट उन पर फेंकी और पिछले में पार्क गाड़ियों के पास! ":छुम्मन मेला लाजा बेता!" मैंने उसे गोद में लेकर सालसा की पोज़ीशन बनायी, उसे गाडी में पटका और चाबी लगाते हुए उससे पूछा ! " ये नेक काम अंजाम कैसे दिया आपने छोटे मिया! " गोदी में लतक गए ओल धीले छे ले ली, हम ऐछ्यी कलते हैं" अर्ररे!! मैंने हैरत से उसे देखा और स्टार्ट कर के रिवर्स डाला. उह्ह! गाडी! धम्म से जाकर सय्यद वाड़ी के मज़बूत पिलर से टकराई, ओह्ह! उसकी आवाज़ से लग गया था की जीप की पिछली लाईट शहीद हो गयी है. डर के मारे मेरा कलेजा मुह को आने लगा, मैंने गाडी को इंसानियत से पहले वाली पोज़ीशन में पार्क किया और कहा, "उतरो छोटू! " "कूँ! तुमने तो कहा था छैल कलावोगी !, घुमाव ना अब!" उसका मुह पूरा चोकलेट में भर रहा था. "अरे! तुम्हारे उन कंजूस भाई ने पेट्रोल डलवाया  नहीं! क्या पानी से चलाऊँ गाडी! " मै भाई छे पूछूं!" उसने धमकाने वाले अंदाज़ में कहा, अरे! मैंने चोकलेट आगे की. " मंच!"  उसने बुरा मुह बनाया, " नई मै तो पूछूंगा"  मेरा दिल धडकने लगा, मैंने डेरीमिल्क का बड़ा सा पैकिट उसकी जानिब बढाया, आज सुबह ही पप्पा से वुसूला था, लड़ लड़ के. तुम तो बड़े रिश्वतखोर हो! मैंने रुआंसे होकर कहा. "काम भी तो जोखिम का था."

मैंने राहत की सांस ली. अब सीधा उप्पर जाकर मगरिब अदा की और मेरा फरमान आ गया. पाहिले चचा मुन्ने ने मुझे देखा और समझाइश दी, "बिटिया! नौकरी तो आपने की ही नहीं" क्यों जी! बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनीज़ में अच्छी वर्कर होने के झंडे गाड़ चुकी हूँ और आप!" मैंने गुस्से में मुन्ने मियाँ को घूरा, मगर पापा ममी का चेहरा देख हार मान ली. "ओके! और बताइये!" चचा ज़रा मुस्कुराए  अब, थोडा पास आये, और सुनो! दस जमा'अत पढी भी हैं, और हाँ! थोडा कम्पकपाना, लड़के के सामने थोडा ज्यादा. "

मैंने उन्हें देखा उन्होंने अपना अंगूठा मुझे दिखाया और आगे के दरवाजे से अन्दर आ गए. लो जी! आ गयी लडकी. मै बड़े से चादरनुमा फिरोजी दुपट्टे में लिपटी, आहिस्ते आहिस्ते नीची नज़रे किये  हाल में दाखिल हुई.  मेरे हाथों ने कम्पकपाना चालू कर दिया था. "ओह्ह! कित्ती घबरा रही है बेचारी!" किसी औरत की आवाज़ थी. अब तो हंसी रोकने के चक्कर में हाथ और ज़ोर ज़ोर से कांपने लगे. लड़के के सामने जब पानी के ग्लास की ट्रे आगे की तो हाथ इतनी ज़ोर से कांपे कि पानी उस बेचारे पे. ओह्ह! साथ आयी एक मोहतरमा उठीं, "अल्लाह! बेटी बैठ जाओ!  कितनी शर्माती है, आजकल की लड़कियों में कहाँ ऐसी शर्मो हया!  हम कहें, हम केयी साथ हुआ था ऐसा, इनके बाउजी देखने आये थे ना हमें." बड़ी बी खामख्वाह जज़्बाती हो गयीं थी.  "हें हें! ज्यादा बाहर नहीं निकली ना," चचा मुन्ने भी हिनहिनाये. मै बैठ गयी.

लड़के ने टावेल से खुद को सुखाया. उसके कुरते पाजामे का कलफ उसके मूड की तरह ही गारत हो गया था. "वैसे सा'हब ! आपके यहाँ काम क्या होता है?" अब्बू ने लड़के के वालिद से पूछा. "अब आप से क्या छुपा है सर! अपना दो नंबर का काम है लकड़ी का. अच्छा पैसा है"  वो संभले. ऐसी बात नहीं है, हम अल्लाह वाले लोग हैं , ज़कात दे देते हैं, माशाल्ला से दो हज हो गए हैं. वे चचा मुन्ने से भी ज्यादा इर्रीटेट  करने वाले अंदाज़ में हिनहिनाये, गोयां अल्लाहताला को खरीद लिया हो. "पुलीस वुलिस का डर..?" मेरे सीधे सादे मास्टर अब्बू ने भोलेपन से पूछा, अरे जनाब! काम बड़े जोखिम का  है, रिश्वत है ना! लाखों खिलाने पड़ते हैं, गोदी में लटक गए, धीरे से डाल दी हम ऐसई करते हैं. ओह्ह! मेरे कानो में छुम्मन के अलफ़ाज़ गूंजने लगे, "गोदी में लतक गए, धीले छे......" लिफाफा देख मैंने मज़मून भांप लिया था. तभी मेरे कानो ने सुना, "भाई! ये लियए चाबी, आप भूल गए थे गाली में, हमने उथा ली. " छुम्मन फ़य्याज़ को चाबी थमा रहा था. अह्हा ! मेरा समझदार बेटा! उसके दादा ने उसे चूम लिया और उसकी जेब में एक ५०० का नोट फंसा दिया. मेरी और छुम्मन की नज़रें मिली और छुम्मन  ने मुस्कुरा कर एक आँख दबा दी. "अल्लाह! मेरा दिल ज़ोर से धडका.  ऐ परवरदिगार! मेरे ना हुए बच्चों को इस दादा से बचा लीजियो तुझे मरियम अलस्सलाम का वास्ता!!! ( अगर हम वो ना कर पाए जो तू चाहता है तो हम वह भी ना करें जो तू नहीं चाहता. मेरे ज़हन में अम्मा कि दुआ गूँज उठी)

अब्बू ने मेरी तरफ देखा, मैंने उनकी तरफ. "जी बात यह है कि इसने कॉलेज में पढ़ा है, थोडा ज्यादा, आगे नौकरी करना चाहती है." नई साब बिलकुल नहीं, होई नई सकता, खैर अल्लाह ने कहीं तो लिखा होगा, फय्याज का जोड़ा"  उसके अब्बू मायूसी से उठे. चचा मुन्ने ने मुझे मायूसी से देखा. मै और अब्बू मुतमईन थे. सब लोग मेहमानों को दरवाज़े तक छोड़ कर आये . चचा मुन्ने मायूस लग रहे थे. "क्या है चचा! मैंने उनके मुह में चाकलेट फंसाते हुए कहा घबराइये नहीं, अभी तो बैग में और भी हीरे लखीने होंगे ना! आखिर अल्लाह मिया ने आपको मेरे लिए फ़रिश्ता  बना कर जो भेजा है."  





(इमेज के लिए गूगल को, और पोस्ट चलाने के लिए अज़ीज़  दोस्त डॉक्टर साहब का तहे दिल से शुक्रिया, वर्ना मेरे बीमार होने की वजह से इस पोस्ट को आवाज़ नहीं मिल पाती.)

शुक्रवार, 22 जून 2012

इसीलिये मम्मी ने मेरी तुम्हे चाय पे बुलाया है.......


http://4.bp.blogspot.com/_IIUXg4PXyqk/S6808rKQMDI/AAAAAAAAAGk/UyLiaioU8_M/s1600/coffee%2520love.jpg 


 जिसके बगैर आगाज़े सुबह ना हो, जिसके बगैर दिन ना ढले, जिसके बगैर तन्हाइयां बुझी बुझी लगें, और जो नज़दीक हो तो अपना आप मुकम्मल लगे. जी हाँ! उसी का नाम  है चाय. वही जिसके बगैर हम ना रिश्तों की कल्पना कर पायें, ना गपियाने की. ना लम्बी दोपहर  के काटने का कोई बहाना हो ना स्टडी से थक आये ज़हन का कोई ठिकाना हो. सच जिसके बगैर कायनात का हर रंग फीका हो, ज़िन्दगी रुकी रुकी सी लगे ,वही तो है चाय. 

 माँ  को चाय बिलकुल पसंद नहीं, पापा सुबह चाय की जगह छांछ पीते हैं, अक्सर जब हम भाई बहिन चाय पीतें हैं, दोनों नाक भौंह सिकोड़ते हुए कहते हैं, "नशीले! हमारे बच्चे हैं यह!"  "पता नहीं, अस्पताल में बदल गए शायद!" दोनों ही मुस्कुराते हुए इस नतीजे पर पहुँचते हैं. बाजी को किसी के हाथ की नहीं जमती, सो बड़े मज़े हैं, वह जल्दी उठ गयी तो सुबह से शाम तक चाय की छुट्टी, कोई मुझसे नहीं कहेगा, "गुडिया! जाओ चाय बनालो, मंझली और चाय के इश्क के किस्से बड़े मशहूर हैं, जब बड़े मामू ने अपने बेटे के लिए उसका प्रपोज़ल माँगा तो उस वक्त वह चाय पी रही थी, वक़ार भाई ने जब बड़ी अदाओं से उन्हें बताया कि 'फुप्पी जान से अब्बू उन्हें वकार  भाई के लिए मांग रहे हैं'  तो जवाब में पूरा ग्लास वह भी चाय का, उन्होंने वकार भाई  पे देमारा. शादी तो खैर बहिना की गैरों में हुई पर, वक़ार भाई के टखने पर उस ग्लास का निशान जूं का त्यूं है. बड़े भैया को कोफी ज्यादा पसंद है, पर रोज़े अब्र और शब् ए माहताब में  दिल चाय पर ही आता है, खुद बनाते भी हैं और सब भाई बहिनों को पिलाते भी हैं. छोटा भैया बचपन में ही दूध को तलाक दे चुका था, और उसके साथ ही चाय एक महबूबा सी लग गयी थी, अक्सर स्कूल से आकर चाय मांगता तो माँ कहती, 'चाय नहीं मिलेगी, खाना खाओ पहिले', जवाब में वह मुस्कुराते हुए माँ के गले में बाहें डाल कहता, "चाय बिना चैन कहाँ रे!"  माँ पट भी जाती थी, अमूमन अम्माएं ऐसी ही होती हैं.

मेरी कोई फ्रेंड आती जनाब चाय लेकर हाज़िर! सीमा स्मिता से लगा कर स्मृती दी या कीर्ती सबको अपने हाथो चाय बना कर दी है इसने, बदले में कम भी कहाँ पड़ा!  इसके दोस्त कितने नालायक थे, ऑर्डर से, लाड से ,मान से या मनव्वल से मुझसे चाय बनवा ही लेते थे, प्रदीप भैया, गोपाल भैया, शैलेष भैया , गौरव भैया, सचिन भैया, वैभव भैया, फरीद भैया, विक्टर, प्रवीन, छोटू सिंधी और भैयाओं की नाख्त्म होने वाले फहरिस्त और शाम की चाय के धमाल. 

कोई लडकी सेट करनी है, दिलशाद का घर, और चाय का टाइम, किसी को पीटने का प्रोग्राम बनाना है, शाम पांच बजे दिलशाद का घर और चाय का टाइम, किसी की गर्ल फ्रेंड के बिछड़ने का मातम शाम को चाय के वक़्त दिलशाद के घर. अब तो सब ज़िन्दगी की दौड़ धूप में उलझे हैं, सबके बीबी बच्चे हैं नाखतम होने वाले काम हैं, पर साल में एकबार ज़रूर मिलते हैं सब वही दिलशाद का घर चाय का टाइम.
दिलशाद (छोटा भाई) और चाय अब एक दूसरे के पर्याय थे, प्रदीप भैया की मम्मी को पता था, दिलशाद आने वाला है, चाय ज़रूर बनेगी, अच्छा गुडिया भी आ रही है, चाय बढ़ा लो, और बारिश के मौसम में घर का लैंड लाइन खनखना उठता, "गुडिया! हम सब आ रहे हैं, जोशी के पकौड़े लेकर, चाय बना ले बेटू! " शाम को अक्सर, "ए भैया! कल मैंने बनायी थी, आज तेरा नंबर है, " "ओये! आज मेरा नहीं, भैया का टर्न है" चल बढ़ ले यहाँ से, मै वे नहीं बनाने की! "  इतने में पिम्पले क्लास से लौट कर घर में दाखिल होती कीर्ती /"लाइए भैया! मै बना दूं," करके खुद ही चाय बना देती थी.  

शाम की चाय के साथ भेल, मेरी एक्साम के टाइम पर गौरव भैया ही बनाते थे, रात को अक्सर रूम मै नाना मियाँ  के साथ शेयर  करती थी, अक्सर रात के दो या तीन बजे वे उठते और कहते, "मेरी  बच्ची ! पढ़ रही ही, आ तेरे लिए चा बना दूं!" मै जवाब में मुस्कुराते हुए उठती नाना मियाँ को वाशरूम ले जाती, पानी पिलाती, वुजू करवाती और तहज्जुद गुज़ार नाना मियाँ के मुसल्ले पर एक प्याली चाय रख जाती, गोयां यह नाना मियाँ का चाय पीने के लिए कोई इशारा हो. एक दिन मैंने माँ  से पूछा " मामा! नाना मिया ऐसा क्यों करते हैं, जवाब में माँ की ऑंखें गीली हो गयी, कहने लगीं, "बेटे वह दौर शदीद ग़रीबी का था, घर में गैस नहीं था, मै बीएससी कर रही थी, और मुझे स्टोव जलाना नही आता था, अब्बू जी चार बजे उठ कर मेरे लिए चाय बनाते थे, आज मै जो कुछ हूँ सिर्फ उनकी कुर्बानी और मोहब्बत की वजह से वर्ना, छः बेटियों के बाप ने अगर छटी बेटी को नहीं पढाया होता तो!" जवाब में मेरी भी आँखे भीग गयी. मै जब तक नाना मिया के साथ रही, अपने हाथों से उन्हें चाय पिलाती रही, अम्मा का कर्ज़ समझ कर और बदले में नाना मिया ने मुझे हमेशा एक दुआ दी, "अल्लाह ! मेरे इस बच्चे को सूरज सा मुनव्वर कर, और चाँद सा नूरानी कर दे." नाना मिया की दी हुई दुआ घर में सबको रट गयी थी, जब भी मै उन्हें चाय की प्याली से तश्तरी में चाय ढाल कर देती, मेरा भाई चुहल करता, "अल्लाह इस लडकी को चुड़ैल सा चीपड़ा, और  सिंगी गाय सा भारी......" फिर तो हमारी वह फ्री स्टाईल  होती कि बस ..!!!
  
चांदनी रातों में चाय का कप थामे हम तीनो भाई बहिन सियारों की तरह छत पर बैठ चाँद तांकते, नयी ग़ज़लों पर तब्सिरे होते, जगजीत साहब, गुलाम अली साहब, महदी  हसन साहब या अहमद हुसैन मोम्मद हुसैन साहब की आवाज़ का जादू धीमे धीमे चलता रहता, बारिश या सर्दी की कोहरे वाली कितनी सुबह हैं जब ज़फर भाई  को साथ ले, अपनी अपनी गाड़ियां उठा, थर्मस में चाय डाल हम लॉन्ग राइड पर निकल जाते थे. चाय गोया वह बुढिया थी, जिसने हमें रोते हँसते, गाते झूमते हर रंग में देखा था . कितनी झील सुबहें, नील शामें, हम और चाय बस!!!! 

और अब! होने वाले मियां ने फरमान भेजा है, "आई हैट  टी." ऐसे कैसे हो सकता है!!!
क्क्क्य! मुझे मेरा लिखा एक शेर याद आ गया:
"तुझ से बिछड़ कर डूबती, चाय के प्यालों में शाम
हमने यूं गम को भुला कर मुस्कुराया देर तक..."
 
चाय के लिए मेरी मोहब्बत जोश मारने लगी, मुझे कुछ करना होगा.
 
  घर  में कोई नहीं था, हमने भी  मौक़ा देख उन्हें चाय पे  बुलाया, कान के नीचे कट्टा अड़ाया और खुले लफ़्ज़ों में समझा दिया है,  "बचपन से क्या पिया सुबह! अरे चाय ही पी ना! अरे २ दिन से कोफी क्या मिली मियाँ अँगरेज़ हो गए!!! आज चाय को कह रहे हो कल हमें कहोगे, "आई हैट यू"  मिया! हम तो चाय पियेंगे वक्त बेवक्त पियेंगे, हमसे शादी करनी हो तो चाय से मोहब्बत करनी होगी, वरना, टीमटाम उठाओ, हमारे जैसी बीबी का मियाँ होने के लिए बड़ा जिगरा चाहिए हाँ! अभी तो बेचारे उठ कर गए ही हैं, बड़े रोमांटिक मूड से आये थे, और बड़े बुझे बुझे जा रहे हैं. हम मूड ठीक करने के लिए चाय बनाने जा रहे हैं, उसके बाद सोचेंगे इनका क्या करना है....     


 



 

बुधवार, 13 जून 2012

पप्पा की खातिर

"सुन! मै शादी कर रहा हूँ, तू आयेगी ना!" सुबह सुबह मोबाइल खनखनाया  और यासिर कि जानी पहचानी आवाज़ ने समाअतों की फिजा में रंग घोले.

हर बार की तरह इस बार भी कुछ नया और चौकाने वाला. "चलो! तुम्हे और शीरीं को मुबारकबाद" मेरे मूह से निकला ही था कि उसने बात काटी, "शीरीं नहीं यार! अज़रा निशात नाम है मेरी होने वाली बीवी का."  क्या बात कर रहे हो तुम! शीरीं का क्या होगा, पागल हुए हो क्या, वो तो सदमे से मर जायेगी यार! तुम मर्द एक नंबर के कमीने होते हो, मै तुम्हे शूट कर दूंगी मै तो जैसे उबल पडी." डांट मत लगाओ यार! आज शाम की फ्लाईट से इंदौर आ रहा हूँ, उसने फोन डिस्कनेक्ट किया और मेरे दिमाग में हथौड़े बरसने लगे. पहले यासिर के आने पर प्रोग्राम होता था, क्या करना है, कहाँ कहाँ घूमना है, कितने दिनों सोनकच्छ, कितने दिनों इंदौर. अब  यासिर के आने पर मै सबसे तेज़ चाकू तलाश रही थी.

यासिर से मुलाक़ात के पहले पहले दिन मेरे ज़हन में घूमने लगे,  वेरोनिका इंटर प्राईज़ेस  के भोपाल ऑफिस की तरफ से मै, हैदराबाद ऑफिस  की तरफ से यासिर और चैन्नई ऑफिस की तरफ से सालई कोलामणी. "थर्ड ए.सी. का टिकट भेज कंपनी समझ रही है कि अहसान किया." वह फोन पर किसी से बात कर भुनभुना रहा था, 'आईं! हम भोपाल वालों  के साथ तो और भी सौतेलापन किया गया है,स्लीपर में ही....मैंने तुरंत भाई का नंबर डायल किया. "हां! वापसी की फ्लाईट बुक है यार, परीशान मत हो !" मेरे बिना पूछे उसने बगैर औपचारिकता के जवाब दिया. 

  मीटिंग ख़त्म हुई, मै महीने भर का एजेंडा हाथ मै थामे, कलाई घड़ी को घूरने लगी, ६ बजे की फ्लाईट है, और अभी ४: ३० हुए है, अभी से अरोड्र्म जाकर क्या करूंगी, क्यों न  लाजपत मार्केट तक होकर आया जाये, एरोज़ इंटर नेशनल होटल की सीडियां उतरते उतरते मै सोच रही थी. गूगल मैप्स की मदद से रास्ता तलाशते तलाशते जब लाजपत मार्केट आयी तो रोडसाइड पर एक शॉप में एक कैप्री पर मेरा दिल आ गया. मै उसकी मोहब्बत में बावली दुकान में घुसी कि अन्दर दुकानदार से भावताव करते यासिर पर निगाह गयी, वह झेंपा, झिझका, और मुस्कुराता हुआ करीब आया. "मुझे रोडसाइड शोपिंग का मेनिया है" , मैंने उसका बड़ा हुआ हाथ थामा, "मी टू" मै मुस्कुराई. और कैप्री उठा पेमेंट करने लगी. हम साथ साथ दुकान से बाहर आये, इधर उधर टहले, उसकी ट्रेन शाम आठ बजे की थी.  हम बेवजह गपिया रहे थे. इस उस के भाव ताव कर छोटे मोटे दुकानदारों को तंग कर रहे थे, हैदराबाद और भोपाल की बातें कर वक़्तगुजारी का लुत्फ़ उठा रहे थे. अब भूक लगने लगी थी, उसने एक रोडसाइड शॉप पर कुछ मोमोज ऑर्डर किये और बेंच पर बैठ पास खड़े सॉक्स वाले से भाव ताव करने लगा. मै मुस्कुरा कर पास खड़े मटका कुल्फी वाले से दो कुल्फियां ले आयी, और अब हम दोनों साथ मिल कर उसे तंग करने लगे, उसने कुल्फी वाले को पेमेंट किया, हमने साथ में मोमोज खाए और अब चलने की वेला.
 मैंने रस्मी बातें कर उससे विदा लेते वक्त एक पैकेट उसकी तरफ बढाया और एरोड्रम के लिए एक रिक्शा पकड़ा. रास्ते भर मै यासिर के बारे में सोंच रही थी, इतना हाई फाई मगर जरा भी क्लास कॉन्शियस नहीं, स्टेटस कॉन्शियस नही, अभी इंदौर भोपाल के लड़के होते न तो....सच प्रोफेशनल माहौल का बड़ा फर्क पड़ता है. 

मै सोंचों में गुम थी कि एक  मैसेज " विल आलवेज़ मिस दिस सिल्वर डे -थैंक्स, यासिर."  मै मुस्कुरा दी. उसके बाद हर मीटिंग के बाद दोस्ती बढ़ती ही गयी और कब मैंने यासिर की बड़ी बहिन का दर्जा पा लिया मुझे अहसास ही नहीं हुआ. हम अक्सर ६ महीनों में एक दिन पूरा साथ बिताते, जिसमे सिर्फ और सिर्फ बातें. खलील जिब्रान की कहानियां,, ओस्कर वाइल्ड के नगमे और पता नहीं क्या क्या!
दिन भर यासिर के लिए सोंचते सोंचते गुजरा, और शाम को वह आया तो बुझा बुझा सा था, सोफे के नीचे बिछे कालीन पर तकिये से सर टिकाये निढाल हो गया यासिर. मैंने पानी पिलाया, और कुछ देर उसे कमरे में अकेला छोड़  किचन में आ गयी.  मगरिब पढी, दुआ में हाथ उठाये और यासिर पास आकर बैठ गया, " जानती है, उसके अब्बू केंसर के पेशेंट हैं, मेरे अब्बू हार्ट पेशेंट दोनों नहीं चाहते हम शादी करें, अम्मा सारी उम्र न बख्शने की धमकी दे रहीं हैं, मै अगर बगावत कर भी लूं, हम भाग भी जाएँ और मान लो उसके वालिद नहीं रहे तोउसके तीन छोटे भाई बहिनों  का क्या होगा, उसके अब्बू की आख़िरी स्टेज है, और मेरे अब्बू की ८०% आर्टरीज ब्लोक हैं , मुझे भी तो गुडिया की शादी करनी है. और फिर तू एक दिन नहीं बोली थी, मियाँ बीबी के रिश्ते में सब कुछ होना चाहिए, सिवा मोहब्बत के, बड़ा प्रेक्टिकली जीना होता है यह रिश्ता!!! खुश रहना हो तो कभी उससे शादी मत करना जिससे बहुत मोहब्बत हो."  हमने साथ बैठ के तय किया हमारा शादी न करना ही बेहतर है, हमने उस दिन साथ साथ पहली बार ओपेरा देखा, साथ घूमे, साथ साथ रोये और..... कल उसकी भी शादी है."
वह आदत के अनुसार एक सांस में सब बोल गया, उसकी आँखें पनिया रही थी और वह दुखी था, "यासिर! मेरा बच्चा!"  मैंने आंसू पोछे और उसका सर अपने गोदी में रख लिया.
"यासिर!" - खाना लगाते लगाते मैंने पूछा

-"हूँ!"  उसने जवाबन मुझे घूरा.

-"तुम न! अच्छे पप्पा बनना!!!"

और वह  मुस्कुरा दिया

गुरुवार, 7 जून 2012

"ये छत बहुत हसीन है......"

"दालानों की धूप, छतों की शाम कहाँ
घर के बाहर, घर जैसा आराम कहाँ...."
कितने दिनों बाद घर की सुबह नसीब हुई, कल रात जब छत पर टहल रही थी यही तो सोच रही थी, मेरे लगाये दरख़्त अब बड़े हो चुके थे, गुलाब फूलने लगे थे, मोगरा लहलहाने लगा था, और रातरानी के चटकते शगूफे पहली बारिश की खुशबू से सराबोर हो रूह में घुलते से लग रहे थे. मेरा पाला कछुवा भी बड़ा हो चुका था. कल शाम लग रहा था जैसे मै चाय के साथ शाम भी घूँट घूँट करके पी रही हूँ. आज सुबह जब छत पर आयी मेरे आने से पहले कबूतरों का जोड़ा, सामने के पीपल का कव्वा, और दो प्यारी गौरय्यें फुदक कर मुंडेर पर आ पहुँची, मैंने उनके लिए पानी के बर्तन में पानी, और खाने की परांत में कुछ बाजरे के दाने डाल दिए. वे चहक चहक कर मेरा इस्तकबाल करने लगीं. मुझे खुशी थी वे मुझे अब भी नहीं भूलीं थीं. थैंक्स गोड! मैंने मुस्कुरा के एक ठंडी सांस ली. आज मामा ने फजिर के लिए नहीं उठाया कल रात के मेहमान बड़ी देर से जो गए थे. मै आराम से उठ कर टेरिस पर  हवा का लुत्फ़ उठा रही थी.

भाभी को पौधों में कोई दिलचस्पी नहीं  पर काम वाली खाला बी ने मेरी गैर हाजिरी में इन सबके लिए अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं थीं, इसी से लौटती दफे में इन सब के लिए अच्छे अच्छे तोहफे लेकर आयी थी. मै अपने बोगनबेलिया से बातें करने लगी, 'आई मिस यूं जानू', मैंने गुलाब से कहा " शोना! आयी लव यू" और कहते कहते मेरी आँखें गीली हो गयीं. तुलसी में तो मेरा दुपट्टा खुद ब खुद जा अटका बेसाख्ता मेरे मूंह से निकला " हम अपने दिलपसंद पनाहों में आ गए.." बरगद की बोनसाई ने मुझे देख कर आशीर्वाद में हाथ उठा दिए, क्रोटन ने मुस्कुरा कर मुझे गले लगाया, चायनारोज़ तो  मारे खुशी के अपना एक लाल फूल भी गिरा बैठा,  कूकू फ्लोवर्स अलबत्ता अकड़े बैठे थे, जैसे ही मैंने छुआ बेल लकड़ी से मेरी गोदी में आ गिरी, " माय लव"  मैंने उसे धागे से बाँध कर फिर खडा किया.
मोर्निंग वाक् से बीन कर लाया और मटके में इकठ्ठा किया गोबर अब जैव खाद में तब्दील हो गया था. मैंने मिट्टी पलट, थोडा थोडा सब में डाला, गिलकी, लौकी, करेले की बेलों ने भी "राम राम" किया, मै उनसे भी मिल आयी. ऑफिस टाइम के फूल मुझे कनखियों से देख रहे थे, काला लंबा मोगरा अपनी अपील से अच्छी तरह वाकिफ था, बेवजह मुझे लाइन मार रहा था. मैंने "लिन्डेन डस्ट" की एक शरीर मुस्कराहट उन पर फेंकी और आगे बढ़ गयी. अनार के लाल फूल, एलोवेरा की "लश ग्रीनरी" और घास के नन्हे जवारे सभी खुश थे, मानों कह रहे हों, "जहां चार यार मिल जाएँ, वहीं रात हो गुलज़ार". माल्वेसी फेमिली के लाल गुलाबी फूलों के प्यार को तो मै ज़िंदगी  में कभी  नहीं फरामोश कर सकती और चमेली!  जैसे ही उसके मंडवे के  पास से गुज़र हुई, कागज़ से भी हलके फूल हवा की तरह मेरे आँचल में आ गए, बेसाख्ता मेरे मूह से निकला:
                                                                "अब भी मिलतें हैं हमसे यूं, फूल चमेली के
                                                                 जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है....."

टूटे मटके में लगी रक्त चम्पा के पास ही बड़े भैया ने टूटे  टब का इस्तेमाल कर एक नकली पौंड बनाया था, जिसकी नन्ही रंगीन मछलियों की शोभा देखते ही बनती थी. मेरे इंजीनीयर भांजे ने कुछ अक्ल भिड़ा,  कबाड़ से जुगाड़ लगा एक नकली फाउन्टेन भी बना डाला था, हमने इसके आसपास वाटर लिली के गुलाबी फूल लगा रखे थे, कुल मिला कर सब परीकथाओं सा. मुझे वह दिन याद आया जब एक छुट्टी के दिन भइया इसे बनाते बनाते गा रहा था " ये घर बहुत हसीन है......"

 शायद कुछ ही दिन और हैं, ये सब फिर मेरे लिए एक याद बनकर रह जाएगा. पता नहीं वक्त मुझे कहाँ  ले जाये, और मै इस घर के लिए एक याद बन जाऊं, फासले शायद सब गुम कर दें, इस छत पर गुजारी हम भाई बहिनों की चांदनी रातें, हमारे हंसी ठहाके, पापा मामी के साथ खेली अन्ताक्षरी, और बड़ी भाभी की गोदी में सर रख कर बतियाने वाले दिन.....
मगर इतना ज़रूर है, मै कहीं ना कहीं ज़रूर मुस्कुराउँगी, इन क्यारियों के फूलों के नए नए शिगुफों में या फिर क्रोटन के नए पत्तों में.
                                                                                                         लोरी.

बुधवार, 6 जून 2012

एलीज़ा


मेरे घर के सभी रास्तों को काट गयी
तुम्हारे हाथ की कोई लकीर ऐसी थी

घर आये हुए चैन की सांस ली भी ना ली थी, कि अम्मा का वही "लड़का देखो पुराण" चालू हो गया. इस बार ताई अम्मा, अप्पी और भाई जान के फंदे  में आ ही गयी मेरी भोली भाली मामा! एक तो वैसे ही इत्ते लम्बे सफ़र के बाद भोपाल उतर जाओ का राग, फिर भोपाल वाला लड़का; फिर इंदौर वाला लड़का, ( कल मुंबई वाला भी आने वाला है!!!!)
अब अम्मा को कौन समझाए कि माँ प्यारी! ताजमहल को भी इतने लोग नहीं देख गए जितने मुझे! टैक्स लगवा दो ना अम्मी!!!

          इस बार जब माँ भोपाल वाला लड़का देख कर इंदौर वाला देखने आयी ना तो सच्ची एक बड़ा मज़ेदार वाक़ेया हुआ. ऐसा कि भुलाए नहीं भूल पाउंगी. इंदौर आने पर ऐसा लग रहा था कि बस!! मामा ने क्यों बुल्वालिया. अभी सेशन एंडिंग पार्टी की धूम हो रही थी, सर सय्यद लाइब्रेरी में सजावट, कांफ्रेंस हाल में हँसी ठहाके, और अपने खुद के एक्टिव पार्टिसिपेशन का नशा उतरा भी ना था, कि माँ ने वापसी का फरमान जारी कर दिया, दिल हुआ सब से लिपट लिपट कर रो लूं!! मगर मसला संजीदा था, डैडी अब मेरी शादी का टेंशन लेने लगे थे, और मामा भी थोडा थोडा. सो आना बड़ा ज़रूरी था एक तो घर में मेरे अलावा काम करने के लिए कोई मौजूद नहीं था, तिस पर भैया भाभी खंडाला गए हुए थे. उफ़ तौबा! मैंने दिन भर घर की सफाई की, ब्लॉग अपडेट किया, और जले पैर की बिल्ली  की  तरह घर भर में घूमती रही, शाम हुई, रात हुई और महमान हज़रात का खैर मकदम भी हुआ. (वैसे मै एन्जॉय करती हूँ इसको मगर......) इतने दिनों से बुर्का पहन कर मुझे वापस मेहमानों में मर्द हज़रात के  सामने जाने में हल्की सी कोफ़्त हो रही थी. माहौल खुद ब खुद भारी भारी होने जा रहा था कि मेह्नानो के साथ आयी एक नन्ही मुन्नी गुडिया एलीज़ा तितली की तरह ठुमक मटक कर बिन बुलाई बरखा की ठंडी फुहारों सी अन्दर आ गयी. पहले पहल दिल हुआ इससे बातें करूँ या नहीं, जज़्बात की रौ में बह निकली और हम मिल कर हल्ला मचाने लगे ना तो मेहमान इस नन्ही को डांटेंगे और मेज़बान अपनी नन्ही  को. सोचों में गुम ही थी कि एलीज़ा ने मेरा दुपट्टा पकड़ कर ऑर्डर किया, भाभी  मुझे एक बुक दे दो ना!!! आईं!!! "मै ! भाभी!!! " शायद एलिज़ा ने कहीं भाभी लफ्ज़ सुन लिया हो, मगर उसके लफ़्ज़ों के यूं इस्तेमाल के टेलेंट को देख कर तो दंग रह गयी मै!!! 

 
                             बमुश्किल अपने हंसी रोकी ही थी, कि नन्ही ने एक और आर्डर किया, "परना बी आता है या युई  लक्खी है?" उसकी तीखी तीखी नाक किसी पारखी टीचर की तरह चढी हुई थी, और मासूम आँखों में शैतानी  के डोरे हरकत कर रहे थे. मै खिलखिलाने को हुई, कि मामा की आवाज़!!! " गुडिया! पानी वानी पिलवा दो ज़रा!" " उफ्फ्फ अल्लाह ये अदा!" मै बोलने ही वाली थी कि मुझे याद आया कि बाहर बैठे  मेहमान मेरी ज़िंदगी का फैसला लेने आयें हैं, और मै!!! मुझे थोडा सीरीयस होना चाहिए, ये एलिज़ा भी ना!  मैंने पानी देने के बाद किचन का रुख किया, नन्ही अब किचन में आ धमकी! "यां क्या कल्ली हो? उसकी नमकीले चेहरे पर फैली हैरानी और आँखों में घुली मासूमियत ने मुझे फिर जकड लिया. मेरे  ध्यान नहीं देने पर उसने मुझे फिर डपटा, " चाचू! इदल बैठो, मेले साथ खेलो!" अबकी बार उसने मुझे चाचू कहा, मैने बड़े जतन से हंसी रोकी ही थी, कि  एलिज़ा ने फिर हुक्म दिया! "मुझे खेलना है, तुमको बेत के खेलने वाला खेल नई आता?" कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि एक मिनट के लिए मुझे लगा कि मुझे अपनी सारी डिग्रीज़ जला देनी चाहिए, लानत है मुझ पर!!! बैठ के खेलने  का एक भी खेल मुझे नहीं आता.!!  
   मै इस संजीदा मसले पर गौर फरमा ही रही थी कि मम्मा की आवाज़! " बेटी! ज़रा इधर आकर बताइये कि आपने क्या क्या किया है? " जी में आया कहूं "अम्मा! मैंने कुछ नहीं किया, अरे!!! मुझे तो बैठ के खेलने का खेल भी नहीं आता"  मगर निहायत शराफत से मुझे बताना पडा कि  मैंने भी गुज़ारे लायक पढाई की है.

 मेरे पीछे पीछे परछाई सी डोलती एलीज़ा अब मेरे साथ किचन में आ गयी, मैंने उसे थोडा सा नाश्ता ऑफर किया जवाब में उसने मुझे घूर कर देखा, और पानी की तरफ इशारा किया, मैंने  प्योरिट से पानी निकाल, एक ग्लास उसकी ओर बढाया वह खड़े खड़े एक सांस में पानी पीने लगी, " बुरी बात! बैठ कर पीजिये" मेरे समझाने पर वह भाग कर डाइनिंग हाल तक आयी, ठुमक कर तख्त पर बैठ गयी और बोली, "लाओ यहाँ लाकर दो!" (मेरी सासू माँ! लो पियो) मैंने मुस्कुरा कर उसे ग्लास थमाया. उसने एक नज़र ग्लास पर डाली, " कांच का ग्लास क्यूँ लिया! तोलोगी (तोडोगी)  क्या???  अब तो मै हंस ही दी, एसा लगा जैसे कि हल्की हो उठी हूँ, नाश्ता लगा दिया गया था, लिहाजा मै और एलिज़ा डांस करने लगे, थोड़ी देर बाद रुक कर उसने हाल की  कुक्कू क्लोक़ की तरफ इशारा किया, उसमे चिरिया नई आती? मै जवाब देती इतने में तो दूसरा सवाल तय्यार हो गया था जो राहदारी के खिलौनों को लेकर था, "इत्ते सब से तुम अकेली खेलती हो" मासूम सी नन्ही को बेवजह अल्लाह मिया से शिकवा हो आया, मानों कह रही हो " अकेली एक तुम और इतने खिलौने."  मैंने उसे बेसाख्ता चूम लिया, उसके ओब्ज़र्वेशन, उसकी ऊर्जा, और उसकी मासूमियत!!!  जी में आया, इसकी नज़र उतार कर इसे अपने पास रख लूं, खिलौने वाली चुलबुली गुडिया के जैसी.

          उसके निहायत एटिकेट-पसंद अब्बू और नफासत -पसंद अम्मी को उसके यह सहासिक कारनामे शायद बिलकुल पसंद नहीं आ रहे थे, इसी से लगातार 'नहीं- नहीं' कहते वह एलिज़ा को भीतर से बाहर बुलाने की कोशिश कर रहे थे, पर नन्ही की डिक्शनरी में "नहीं" लफ्ज़ था ही नहीं. उसे किसी की कोई परवाह नहीं थी, दुनिया के तन्ज़ों से गाफिल वह मेरे घर के कोने कोने का लुत्फ़ उठा रही थी.
मुझे नहीं पता देखने आये लोगों में कौन लड़के  से क्या क्या रिश्ता रखता था, पर एलिज़ा! थोड़े ही वक्फे में उसने मुझे, आंटी, अप्पी, भाभी, चाचू, और पता नहीं क्या क्या बना डाला था.


वंडरलैंड की एलिस, पंचतन्त्र के साधू- महात्मा, एंडरसन के भूत, परी और मेज़ पर रखी तमाम किताबों से एक रिश्ता कायम करके एलिज़ा चली गयी पर कमरे में उसकी खुश्बू अब भी ताज़ा है गुलदान के फूलों जैसी.
जियो नन्ही, और नूर किरन बन कर सारी दुनिया पे छ जाओ
तुम्हारी आंटी
लोरी .