गुरुवार, 7 जून 2012

"ये छत बहुत हसीन है......"

"दालानों की धूप, छतों की शाम कहाँ
घर के बाहर, घर जैसा आराम कहाँ...."
कितने दिनों बाद घर की सुबह नसीब हुई, कल रात जब छत पर टहल रही थी यही तो सोच रही थी, मेरे लगाये दरख़्त अब बड़े हो चुके थे, गुलाब फूलने लगे थे, मोगरा लहलहाने लगा था, और रातरानी के चटकते शगूफे पहली बारिश की खुशबू से सराबोर हो रूह में घुलते से लग रहे थे. मेरा पाला कछुवा भी बड़ा हो चुका था. कल शाम लग रहा था जैसे मै चाय के साथ शाम भी घूँट घूँट करके पी रही हूँ. आज सुबह जब छत पर आयी मेरे आने से पहले कबूतरों का जोड़ा, सामने के पीपल का कव्वा, और दो प्यारी गौरय्यें फुदक कर मुंडेर पर आ पहुँची, मैंने उनके लिए पानी के बर्तन में पानी, और खाने की परांत में कुछ बाजरे के दाने डाल दिए. वे चहक चहक कर मेरा इस्तकबाल करने लगीं. मुझे खुशी थी वे मुझे अब भी नहीं भूलीं थीं. थैंक्स गोड! मैंने मुस्कुरा के एक ठंडी सांस ली. आज मामा ने फजिर के लिए नहीं उठाया कल रात के मेहमान बड़ी देर से जो गए थे. मै आराम से उठ कर टेरिस पर  हवा का लुत्फ़ उठा रही थी.

भाभी को पौधों में कोई दिलचस्पी नहीं  पर काम वाली खाला बी ने मेरी गैर हाजिरी में इन सबके लिए अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं थीं, इसी से लौटती दफे में इन सब के लिए अच्छे अच्छे तोहफे लेकर आयी थी. मै अपने बोगनबेलिया से बातें करने लगी, 'आई मिस यूं जानू', मैंने गुलाब से कहा " शोना! आयी लव यू" और कहते कहते मेरी आँखें गीली हो गयीं. तुलसी में तो मेरा दुपट्टा खुद ब खुद जा अटका बेसाख्ता मेरे मूंह से निकला " हम अपने दिलपसंद पनाहों में आ गए.." बरगद की बोनसाई ने मुझे देख कर आशीर्वाद में हाथ उठा दिए, क्रोटन ने मुस्कुरा कर मुझे गले लगाया, चायनारोज़ तो  मारे खुशी के अपना एक लाल फूल भी गिरा बैठा,  कूकू फ्लोवर्स अलबत्ता अकड़े बैठे थे, जैसे ही मैंने छुआ बेल लकड़ी से मेरी गोदी में आ गिरी, " माय लव"  मैंने उसे धागे से बाँध कर फिर खडा किया.
मोर्निंग वाक् से बीन कर लाया और मटके में इकठ्ठा किया गोबर अब जैव खाद में तब्दील हो गया था. मैंने मिट्टी पलट, थोडा थोडा सब में डाला, गिलकी, लौकी, करेले की बेलों ने भी "राम राम" किया, मै उनसे भी मिल आयी. ऑफिस टाइम के फूल मुझे कनखियों से देख रहे थे, काला लंबा मोगरा अपनी अपील से अच्छी तरह वाकिफ था, बेवजह मुझे लाइन मार रहा था. मैंने "लिन्डेन डस्ट" की एक शरीर मुस्कराहट उन पर फेंकी और आगे बढ़ गयी. अनार के लाल फूल, एलोवेरा की "लश ग्रीनरी" और घास के नन्हे जवारे सभी खुश थे, मानों कह रहे हों, "जहां चार यार मिल जाएँ, वहीं रात हो गुलज़ार". माल्वेसी फेमिली के लाल गुलाबी फूलों के प्यार को तो मै ज़िंदगी  में कभी  नहीं फरामोश कर सकती और चमेली!  जैसे ही उसके मंडवे के  पास से गुज़र हुई, कागज़ से भी हलके फूल हवा की तरह मेरे आँचल में आ गए, बेसाख्ता मेरे मूह से निकला:
                                                                "अब भी मिलतें हैं हमसे यूं, फूल चमेली के
                                                                 जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है....."

टूटे मटके में लगी रक्त चम्पा के पास ही बड़े भैया ने टूटे  टब का इस्तेमाल कर एक नकली पौंड बनाया था, जिसकी नन्ही रंगीन मछलियों की शोभा देखते ही बनती थी. मेरे इंजीनीयर भांजे ने कुछ अक्ल भिड़ा,  कबाड़ से जुगाड़ लगा एक नकली फाउन्टेन भी बना डाला था, हमने इसके आसपास वाटर लिली के गुलाबी फूल लगा रखे थे, कुल मिला कर सब परीकथाओं सा. मुझे वह दिन याद आया जब एक छुट्टी के दिन भइया इसे बनाते बनाते गा रहा था " ये घर बहुत हसीन है......"

 शायद कुछ ही दिन और हैं, ये सब फिर मेरे लिए एक याद बनकर रह जाएगा. पता नहीं वक्त मुझे कहाँ  ले जाये, और मै इस घर के लिए एक याद बन जाऊं, फासले शायद सब गुम कर दें, इस छत पर गुजारी हम भाई बहिनों की चांदनी रातें, हमारे हंसी ठहाके, पापा मामी के साथ खेली अन्ताक्षरी, और बड़ी भाभी की गोदी में सर रख कर बतियाने वाले दिन.....
मगर इतना ज़रूर है, मै कहीं ना कहीं ज़रूर मुस्कुराउँगी, इन क्यारियों के फूलों के नए नए शिगुफों में या फिर क्रोटन के नए पत्तों में.
                                                                                                         लोरी.

12 टिप्‍पणियां:

  1. शुक्र है जो बात , जहां कहीं भी होने की शर्त पे ही सही , मुस्कराने पे जा अटकी , उम्मीदें हमेशा लहलहाती रहें !

    जिन्हें आपने रोपा , पानी दिया और जिनकी परवाह की , आखिर को वे तमाम भी जहां हैं , वहीं , अपनी खुशबुयें बिखेर ही रहे हैं !

    बहरहाल जुगाड़ू इंजीनियर साहब का फाउंटेन नहीं दिखाया आपने और छत पर फुदकती हुई गौरैया के दाने पे नियत गड़ाये हुए पीपल वाले कव्वे का फोटो भी नहीं लगाया ! मुमकिन है हमारी शिकायत पे , ये फोटोग्राफ्स , आप इस पोस्ट पे चस्पा भी कर दें तो फिर उस चांदनी और उन खुशबुओं का क्या होगा :)

    कछुवा तो हमने भी पाला था , उसके बाद कमबख्त एक बार ही नज़र आया वो भी सुबह सुबह ! हम तो ये कह भी नहीं सकते कि वो बड़ा हो गया है , क्या पता ? वो अब उस टैंक में है भी कि नहीं जिसे हम उसका बसेरा समझ रहे हैं :)

    घर का जो हाल जाना उससे तो यही लगा कि आपके भाईजान गाना ठीक ही गा रहे थे ! अब आप जहां भी जाइयेगा , उस जगह को गाने एन मुताबिक ढाल लीजियेगा :)

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    1. शुक्रिया अली जी!
      मुस्कुराना औरत की मजबूरी होती है,
      क्या आप जानते हैं, जब एक औरत मुस्कुराती है तो ज़मीन पर ज़िन्दगी की एक और कोंपल लहलहाने लगती है,
      रंग जी उठते हैं और कायनात इसके वजूद के संगीत पर रक्स लगती है.
      कायनात को रिदम में रखने के लिए ही सही, हर हाल में मुस्कुराना औरत होने की पहली शर्त है.
      दुआ किजीये अल्लाह मुझे हर रंग में ढल जाने की ताक़त दे और मै अपने तमाम रंग, तमाम अच्छाइयां
      तमाम नेकियाँ और तमाम ख्वाब उस चौखट को नज़र कर सकूं, जिस चौखट से मै जुड़ने जा रही हूँ. कछुए की आजादी पर ख़ुशी, कछुआ खो जाने पर अफ़सोस!
      आप आये, अच्छा लगा, साथ बना रहे- लोरी.

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  2. फूल पत्तों के लिए आपकी दीवानगी हमें हम जैसी लगी....
    :-)

    अनु

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  3. अपनी छत तो इन दिनो गर्म तवे की तरह झुलसा रही है। आँगन के पौधे सूखते जा रहे हैं तो छत के खाक होने ही थे। फूल-पौधों वाली छत तो नसीब वालों को ही मिलती है। शुभकामनाएं...

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    1. "हो के मायूस ना, आँगन से उखाड़ो पौधे
      धूप निकली है तो बारिश भी यहीं पर होगी..... "
      जी! मानसून ने दस्तक दे दी है, इंशाल्लाह फिर सब हरा होगा.
      साथ बना रहे .

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  4. यकीनन वह घर बहुत हसीन है, लेकिन मैं सोचता हूं वह वक्‍त बहुत हसीन था। :)


    हम पलों को जीते हैं, बस वही खास होते हैं। ये पल बदलते हैं और यादें बाकी रह जाती हैं।

    दुआ करता हूं आपको बार बार ऐसे पल मिलते रहें, हर कहीं मिलते रहें। हर वह छत हसीन हो जहां आप पहुंचें।

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।