बुधवार, 6 जून 2012

एलीज़ा


मेरे घर के सभी रास्तों को काट गयी
तुम्हारे हाथ की कोई लकीर ऐसी थी

घर आये हुए चैन की सांस ली भी ना ली थी, कि अम्मा का वही "लड़का देखो पुराण" चालू हो गया. इस बार ताई अम्मा, अप्पी और भाई जान के फंदे  में आ ही गयी मेरी भोली भाली मामा! एक तो वैसे ही इत्ते लम्बे सफ़र के बाद भोपाल उतर जाओ का राग, फिर भोपाल वाला लड़का; फिर इंदौर वाला लड़का, ( कल मुंबई वाला भी आने वाला है!!!!)
अब अम्मा को कौन समझाए कि माँ प्यारी! ताजमहल को भी इतने लोग नहीं देख गए जितने मुझे! टैक्स लगवा दो ना अम्मी!!!

          इस बार जब माँ भोपाल वाला लड़का देख कर इंदौर वाला देखने आयी ना तो सच्ची एक बड़ा मज़ेदार वाक़ेया हुआ. ऐसा कि भुलाए नहीं भूल पाउंगी. इंदौर आने पर ऐसा लग रहा था कि बस!! मामा ने क्यों बुल्वालिया. अभी सेशन एंडिंग पार्टी की धूम हो रही थी, सर सय्यद लाइब्रेरी में सजावट, कांफ्रेंस हाल में हँसी ठहाके, और अपने खुद के एक्टिव पार्टिसिपेशन का नशा उतरा भी ना था, कि माँ ने वापसी का फरमान जारी कर दिया, दिल हुआ सब से लिपट लिपट कर रो लूं!! मगर मसला संजीदा था, डैडी अब मेरी शादी का टेंशन लेने लगे थे, और मामा भी थोडा थोडा. सो आना बड़ा ज़रूरी था एक तो घर में मेरे अलावा काम करने के लिए कोई मौजूद नहीं था, तिस पर भैया भाभी खंडाला गए हुए थे. उफ़ तौबा! मैंने दिन भर घर की सफाई की, ब्लॉग अपडेट किया, और जले पैर की बिल्ली  की  तरह घर भर में घूमती रही, शाम हुई, रात हुई और महमान हज़रात का खैर मकदम भी हुआ. (वैसे मै एन्जॉय करती हूँ इसको मगर......) इतने दिनों से बुर्का पहन कर मुझे वापस मेहमानों में मर्द हज़रात के  सामने जाने में हल्की सी कोफ़्त हो रही थी. माहौल खुद ब खुद भारी भारी होने जा रहा था कि मेह्नानो के साथ आयी एक नन्ही मुन्नी गुडिया एलीज़ा तितली की तरह ठुमक मटक कर बिन बुलाई बरखा की ठंडी फुहारों सी अन्दर आ गयी. पहले पहल दिल हुआ इससे बातें करूँ या नहीं, जज़्बात की रौ में बह निकली और हम मिल कर हल्ला मचाने लगे ना तो मेहमान इस नन्ही को डांटेंगे और मेज़बान अपनी नन्ही  को. सोचों में गुम ही थी कि एलीज़ा ने मेरा दुपट्टा पकड़ कर ऑर्डर किया, भाभी  मुझे एक बुक दे दो ना!!! आईं!!! "मै ! भाभी!!! " शायद एलिज़ा ने कहीं भाभी लफ्ज़ सुन लिया हो, मगर उसके लफ़्ज़ों के यूं इस्तेमाल के टेलेंट को देख कर तो दंग रह गयी मै!!! 

 
                             बमुश्किल अपने हंसी रोकी ही थी, कि नन्ही ने एक और आर्डर किया, "परना बी आता है या युई  लक्खी है?" उसकी तीखी तीखी नाक किसी पारखी टीचर की तरह चढी हुई थी, और मासूम आँखों में शैतानी  के डोरे हरकत कर रहे थे. मै खिलखिलाने को हुई, कि मामा की आवाज़!!! " गुडिया! पानी वानी पिलवा दो ज़रा!" " उफ्फ्फ अल्लाह ये अदा!" मै बोलने ही वाली थी कि मुझे याद आया कि बाहर बैठे  मेहमान मेरी ज़िंदगी का फैसला लेने आयें हैं, और मै!!! मुझे थोडा सीरीयस होना चाहिए, ये एलिज़ा भी ना!  मैंने पानी देने के बाद किचन का रुख किया, नन्ही अब किचन में आ धमकी! "यां क्या कल्ली हो? उसकी नमकीले चेहरे पर फैली हैरानी और आँखों में घुली मासूमियत ने मुझे फिर जकड लिया. मेरे  ध्यान नहीं देने पर उसने मुझे फिर डपटा, " चाचू! इदल बैठो, मेले साथ खेलो!" अबकी बार उसने मुझे चाचू कहा, मैने बड़े जतन से हंसी रोकी ही थी, कि  एलिज़ा ने फिर हुक्म दिया! "मुझे खेलना है, तुमको बेत के खेलने वाला खेल नई आता?" कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि एक मिनट के लिए मुझे लगा कि मुझे अपनी सारी डिग्रीज़ जला देनी चाहिए, लानत है मुझ पर!!! बैठ के खेलने  का एक भी खेल मुझे नहीं आता.!!  
   मै इस संजीदा मसले पर गौर फरमा ही रही थी कि मम्मा की आवाज़! " बेटी! ज़रा इधर आकर बताइये कि आपने क्या क्या किया है? " जी में आया कहूं "अम्मा! मैंने कुछ नहीं किया, अरे!!! मुझे तो बैठ के खेलने का खेल भी नहीं आता"  मगर निहायत शराफत से मुझे बताना पडा कि  मैंने भी गुज़ारे लायक पढाई की है.

 मेरे पीछे पीछे परछाई सी डोलती एलीज़ा अब मेरे साथ किचन में आ गयी, मैंने उसे थोडा सा नाश्ता ऑफर किया जवाब में उसने मुझे घूर कर देखा, और पानी की तरफ इशारा किया, मैंने  प्योरिट से पानी निकाल, एक ग्लास उसकी ओर बढाया वह खड़े खड़े एक सांस में पानी पीने लगी, " बुरी बात! बैठ कर पीजिये" मेरे समझाने पर वह भाग कर डाइनिंग हाल तक आयी, ठुमक कर तख्त पर बैठ गयी और बोली, "लाओ यहाँ लाकर दो!" (मेरी सासू माँ! लो पियो) मैंने मुस्कुरा कर उसे ग्लास थमाया. उसने एक नज़र ग्लास पर डाली, " कांच का ग्लास क्यूँ लिया! तोलोगी (तोडोगी)  क्या???  अब तो मै हंस ही दी, एसा लगा जैसे कि हल्की हो उठी हूँ, नाश्ता लगा दिया गया था, लिहाजा मै और एलिज़ा डांस करने लगे, थोड़ी देर बाद रुक कर उसने हाल की  कुक्कू क्लोक़ की तरफ इशारा किया, उसमे चिरिया नई आती? मै जवाब देती इतने में तो दूसरा सवाल तय्यार हो गया था जो राहदारी के खिलौनों को लेकर था, "इत्ते सब से तुम अकेली खेलती हो" मासूम सी नन्ही को बेवजह अल्लाह मिया से शिकवा हो आया, मानों कह रही हो " अकेली एक तुम और इतने खिलौने."  मैंने उसे बेसाख्ता चूम लिया, उसके ओब्ज़र्वेशन, उसकी ऊर्जा, और उसकी मासूमियत!!!  जी में आया, इसकी नज़र उतार कर इसे अपने पास रख लूं, खिलौने वाली चुलबुली गुडिया के जैसी.

          उसके निहायत एटिकेट-पसंद अब्बू और नफासत -पसंद अम्मी को उसके यह सहासिक कारनामे शायद बिलकुल पसंद नहीं आ रहे थे, इसी से लगातार 'नहीं- नहीं' कहते वह एलिज़ा को भीतर से बाहर बुलाने की कोशिश कर रहे थे, पर नन्ही की डिक्शनरी में "नहीं" लफ्ज़ था ही नहीं. उसे किसी की कोई परवाह नहीं थी, दुनिया के तन्ज़ों से गाफिल वह मेरे घर के कोने कोने का लुत्फ़ उठा रही थी.
मुझे नहीं पता देखने आये लोगों में कौन लड़के  से क्या क्या रिश्ता रखता था, पर एलिज़ा! थोड़े ही वक्फे में उसने मुझे, आंटी, अप्पी, भाभी, चाचू, और पता नहीं क्या क्या बना डाला था.


वंडरलैंड की एलिस, पंचतन्त्र के साधू- महात्मा, एंडरसन के भूत, परी और मेज़ पर रखी तमाम किताबों से एक रिश्ता कायम करके एलिज़ा चली गयी पर कमरे में उसकी खुश्बू अब भी ताज़ा है गुलदान के फूलों जैसी.
जियो नन्ही, और नूर किरन बन कर सारी दुनिया पे छ जाओ
तुम्हारी आंटी
लोरी .




 

   

 


5 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे लगा कि सर्दियों में फोटो खिंचवाना सिर्फ आपके खानदान का चलन है यहां तो एलीजा भी स्वेटर के साथ नमूदार हुईं हैं :)

    बाहर जो 'उम्मीदवार साहब' मौजूद हैं उनका कोई ज़िक्र नहीं है आज के अफसाने में , क्या पता कैसे हैं वो ? पास होने वाले हैं या कि फेल ? पर एक बात पक्की है कि एलीजा अगर खुद 'उम्मीदवार' होती तो आपने हामी भर ली होती :)

    बच्ची के लिए दुआयें ! उसके एटीकेट पसंद वालिद और नफासत पसंद अम्मी को एक सलाह ...अरे भाई ऐसा भी क्या तकल्लुफ , कभी कभार बच्चों की तरह भी जी लिया करें :)

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    1. अली जी! "उनका" ज़िक्र इसलिए नहीं कि "वो" तो आये नहीं थे
      अम्मी जाँ के हवाले सब कर दिया गया है.
      फोटो सर्दी की ही खींची गयी है
      अपने स्टाफ की एक मैडम की बिटिया है,
      सचमुच की अलीजा को तो देख कर ही फ़िदा हो गयी थी, फोटो खींचना ही भूल गयी. .
      अम्मी अब्बू भी खासे प्यारे थे, दुआओं का बहुत शुक्रिया.
      अल्लाह करे नन्ही आगे बढ़ती रहे.

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    2. जी अगर एलीज़ा उम्मीदवार होती ना!
      तो माइक लगा कर जोर जोर से ३ बार कहा होता मैंने :
      "मंज़ूर है, मंज़ूर है, मंज़ूर है....."

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  2. वर्ड वरिफिकेशन हटाने के लिए शुक्रिया , अब ज़रा अपने टिप्पणी स्पैम की क़ैद से मेरी टिप्पणी को बाहर निकालिए !

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  3. स्पैम से आजादी की गुहार भी स्पैम में गई :)

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।