रविवार, 17 जनवरी 2016

जब इश्क़ तुम्हे हो जायेगा





सेहबा जाफ़री

      लिल्लाह! यह गोपाल भाई हैं!! मैंने देखा और खूब ग़ौर से देखा, बचपन से लगा जवानी तक जिन गोपाल भाई की, अपने भाई सी ही सहचरी रही उन्हे इनती- गिनती के पांच सालों मे ही कैसे भूल सकती हूँ! पलकें झपकायी, दुहरा-दुहरा और तिहरा-तिहरा कर; मगर दुविधा है कि मस्तिष्क का साथ छोडने को राज़ी नही!

 वही गांव, वही बस अड्डा, वही मेरे जन्म के पहले से खडा नीम का पेड और वही पीपलेश्वर- महादेव का मंदिर. जो अनहोनी बात थी वह थी मंदिर के ठीक चरणों में कल-कल बहती नदी के बींचोबीच, कमर-कमर तक पानी मे खडे, पीताम्बर से अपनी गठीले देह को ढांके, माथे पर लाल चंदन लगाये, भक्तिभाव से ओतप्रोत गोपाल भाई.

      नयी ब्याही “मैं” बार बार पलट उन्हें आश्चर्य से तांक रही थी. मेरे बिल्कुल नये नवेले पति के पतीत्व का पारा चढे ही जा रहा था. “क्या देख रही हो उसे!” आख़िरकार उनके अंदर के पति ने डॅंपटा और मेरे अंदर की निरी पुरातन पत्नी ने भी गर्दन न पलटी वरना कोई और समय होता तो रपट पर बनी ऊंची सी चौकी पर बैठ, छोटे छोटे कंकर मार, गोपाल भाई का जीना हराम किये देती मैं! पूछती, “ मियां! अब ये पीपलेश्वर महादेव के साथ कौनसी आंखमिचौली हो रही है!”

बस-अ‍ड्डे से घर तक का फ़ासला कोई बीस मिनीट का होगा. इन बीस मिनटों मे पतिदेव के मन का मौसम तो ग़ारत हो ही चुका था पर मैं! अतीत के बीस साल एक ही सांस मे जी गयी थी.
      गोपी (गोपाल), गजु (गजेंद्र) और गुड्डू (इरशाद) गांव के थ्री-जी कहलाते थे. गांव की एकमात्र प्राथमिक शाला से लगा उच्च्तर माध्यमिक विद्यालय तक साथ-साथ पढे तीन हीरे. बचपन के साथी और घनिष्टता इतनी कि इसकी रोटी उसके घर बना करती थी. साढे सत्रह और साढे अट्ठारह का पहाडा पढते इनके ज़हन शरारती ऐसे कि गांव भर की नाक मे दम. इनके इम्तेहानों के नतीजों कि फ़िक्र इनसे ज़्यादा गांव के बडे बूढों को होती थी. यह उस दौर की बातें हैं जब गांव तकनीकी तुतम्बों से आज़ाद हुआ करते थे.

      गोपी भाई के पिता गांव की सबसे बडी किराना दुकान के मालिक, गजु भाई के पिता के अपने वेयर हाउसेज़ और गुड्डू यानि मेरा अपना वयस मे मुझसे छ: साल बडा भाई; गांव के मिडिल स्कूल के बेहद ईमानदार, मध्यमवर्गीय मास्टरसाब की सबसे बडी संतान.  सब के सब मेरे पिता के शिष्य. प्यार से भोले मास्टर साब इन्हें अपनी मानस संतान कहा करते थे. गजु भाई ब्रह्म्मण थे. हमारी पीढियों के सम्बन्धी. मेरी दादी ने कभी इनके दादा को राखी बांधी थी और हमारी पीढियां इस सम्बन्ध को जस का तस निभाती थीं. गोपाल भाई “वैष्णव वणिक संतान” पर इनके पिता जब तक जिये मेरे पिता का सम्मान उन्होने अपने स्थान से उठ कर ही किया. इम्तेहान चाहे हफ़्ते भर के हों या पंद्र्ह दिन के, सब के सब इतने दिनों दुतल्ले पर बने पिताजी के कमरे मे ही डेरा रमाते थे. उठना-बैठना, खाना-पीना, सब कुछ मास्साब के ही अधीन. जाने कैसे नास्तिक गांव की संतान थे ये कि जब सारे बडे शहर राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के दंगों मे सुलग रहे थे, ये तीनों  गांव की अमरायी में अपनी मित्रमण्ड्ली के साथ क्रिकेट खेला करते थे.

      भगवान, अल्लाह, क्राइस्ट या वाहेगुरु से इन्हें कोईं दुश्मनी हो ऐसा नही था किन्तु इनके नाम पर किये ढिंढोरे ढकोसले से इनकी चिढ शाश्वत थी. उम्र कोईं आठ की रही होगी, मां ने एक को डपट कर जुम्मे की नमाज़ को भेजा तो  सफ़ेद क़मीज़ पाजामा पहिन, टोपी लगा, तीनो ही साथ हो लिये. मौल्वी साहब ने जैसे ही “अल्लाहु-अकबर” कहा, जाने किसके ज़हन मे शरारत कौंधी, एक ने एक को धक्का दिया, दूसरे ने दूसरे को! पूरी सफ़ औंधी कर आये और जो अम्माओं ने घर से निकाला तो गुरू द्वारे मे कडाप्रसाद खा कर सो रहे. पंडितों, मुल्लाओं और गांव भर के बाबाओं को सताने के लिये तो ढोल जैसे पिटते देखा है इन्हें मैंने.

      चौमासे चालू होते ही गजु भाई के नाश्ते के अण्डे गुड्डू भाई
 के फ़्रिज मे घर बना लेते और गोपी भाई जो अण्डों को हाथ तक न लगाने की कसम लिये थे, बडे लाड से मुझसे कहते,  “ग़ुडिया! तुम जो हमे एक अण्डा खिला दोगी, हम तुम्हे चार आने देंगे.” चार आने मे उस वक़्त दुनिया ख़रीदी जा सकती थी, लिहाज़ा छीलछाल, नमक लगा, मैं उन्हें अपने हाथों से अण्डा खिला दिया करती थी और जब फ़्रिज अण्डों से ख़ाली हो चुकता यह बदमाश-कम्पनी चौराहे पर पडे, उतारा किये अण्डे भी उठा लाती और उनके भी आमलेट बना कर खा जाया करती थी.

      नुक्ते के खाने को शादी के खाने सा ही आन्न्द लेकर खाना, वह भी बिन बुलाया मेह्मान बन कर! इनके लिये आम बात थी.  अमावस पूनम के उतारे हों या ऊर्स के टोट्के, भूत जिन्नों के लिये फेंकी मिठाइयां हो या बिमारियों को दूर करने आये सय्यद साहब की शीर्नी, सब इन तीनो के प्रिय आहार थे और जान बूझ कर अपनाये गये! शनीचरी अमावस, नौदुर्गा के नौ दिन और भूतडी अमावस के राह पडे भूरे कद्दु, कितनी बार साफ कर, छीलछाल,  अंधी बूढी राहतचची की रसोयी में भून, न केवल ख़ुद खा पका गये थे बल्कि उन्हे भी खिला कर ना जाने कितनी दुआयें समेट लीं थीं. नदी किनारे चलती, राह पडे अण्डों की पार्टी तो कईं दफ़े, ख़ुद मैंने इनके साथ उडायी थी, और एक बार तो अम्मी के जूते भी खाये थे.
      सोंच मे डूबते उतरते  कब गेंदे के फूलों वाली बावली के पास बने जिन्न बाबा के डेरे तक आ गयी एह्सास ही ना हुआ. वहां जिन्न बाबा को बादाम  लगाते जब गोपी भाई की पत्नी गायत्री भाभो को देखा तो दंग रह गयी मैं! यह वही गायत्री भाभो हैं जिनसे गोपी भाई के विवाह का एकमात्र कारण उनका किसी भी अंधविश्वास में लिप्त ना होना ही था. वरना कैसी कैसी सुंदर सुशील और धनी वणिक-कुमारियां वर माला लेकर खडी थीं इस अंक गणित के व्याख्याता के लिये! न!! रहा ना गया मुझसे! आख़िर मेरी अपनी सगी भाभी से ज़्यादा लाड वसूले हैं मैंने इनसे! “ सब ठीक तो है ना  भाभो!” पास पहुंची तो हठात पूछ बैठी मैं! कहाँ ठीक! भाभो तो मुझसे लिपट ऐसी रोयीं मानो! जन्मों से भरा बादल बरस पडा हो. “ पूरे छ: साल में ह्मारी गोद हरी हुई गुडिया!  और लड्कन के जीने की आस जाती है, चार माह के तोहरे लाड्ले बबुआ को हिपेटाइटिस-बी हुआ है”  मेरे पैरों से ज़मीन ही खिसक गयी! वहीं डेरे के चबूतरे पर ही उन्हें  लिपटा फिर अतीत मे खो गयी. उन दिनो फ़सल ना हुई थी, कटाई मज़दूरों को ज़्यादा काम ना था,  गांव के  गरीब से उडन चाचा का बेटा भूख के वजह से सूखामेली (कुपोषण) का शिकार हुआ तो धैला-दुअन्नी तक ना निकली  थी गांववालों के पास. तब गोपी भाई ने ही अपना गणित भिडाया था. गांव भर की विवाह योग्य दीदियों और आपाओं को पकड कर शीघ्र विवाह के दान करवाने लगे थे  वह! सोमवार को एक सौ बीस ग्राम चने की दाल और दूध, मंगल वार को गुड और उडद, बुधवार को घी  और ऐसे ही शनिवार आते आते ढेर लग जाता था दान की हुई वस्तुओं का! सब का सब उडन चचा के घर! लडका देखते ही देखते हरा भरा होने लगा था और अब तो सुना है कि इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा है शहर में. “क्या गरीबों के बच्चे मान मनौव्वल के नही होते गुडिया!” उसे देख देख गोपी भाई कह्ते थे. रब्बा!!! ये पानी मे खडा, जाने किस मंत्र का पूरी निष्ठा से जाप करता पुरुष और जिन्नबाबा को बादाम लगाती स्त्री क्या वही मनुष्य हैं जिनकी वजह से गांव के म्लेच्छ मज़दूर उडन-सिन्ह के मान मनौव्वल के बेटे जग्जीवन को जीवन मिला था!
“अल्लाह के घर देर है भाभो! अंधेर नही!” मैं उन रोती हुई को सह्लाती हुई अपने पति  को  भी भूल गयी थी पल भर के लिये. “आपने और गोपी भाई ने तो अंजाने मे भी किसी का बुरा नही किया! बबुआ को फिर काहे कुछ होगा!”
      उन्हें आस बंधाती जब अपने घर आयी तो क्या देखती हूँ, घर के बाहर बहुतसे जूते-चप्पल, इत्र अगर की खुश्बू और सफ़ेद क़मीज़ पाजामे मे बुर्राक़ सा  नूर बिखेरता  मेरा निरा नास्तिक भाई हिदायत करता कह रहा है, “तू मर्दाने से मत निकलियो!  वहां आयते-करीमा का वज़ीफा चल रहा है, अपने गोपी का लल्ला  ठीक हो  जाये बस!” मेरी आंखे दुआ मे रो रही थीं और मेरे ज़हन मे किसी अंजान शायर का कलाम गूंज रहा था :
हर बात गवारा कर लोगे,
मन्नत भी उतारा कर लोगे
 तावीज़ें भी बंधवाओगे
जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा
जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा….