गुरुवार, 5 जुलाई 2012

सावन की इस सुबह



सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

आँगन में पौधों पर

फूलों पर, पत्तों पर
बरसाती खुशबू से
मुझ पर ही क्यों छाये

खिड़की की चौखट पर

मौसम की आहट से
बरसाती झोंकों में
पगलाए वंशीवट से
यमुना के तीरे तीरे
श्याम सलोने नटखट से
राधा की पायल से गुंजित
वृन्दावन के पनघट से
स्मृति की नदिया में
अश्रुपूरित नीरव तट से
कालिदास के मेघ सलौने
बोलो! मुझको क्यों भाये 

सावन की इस सुबह
चुपके से यादों में
बोलो तुम क्यों आये?

                               

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर एहसास जगाया सावन ने।..बधाई।

    अपन तो आज घूमने ही नहीं जा सके।:(

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  2. khoobsurat kavita! komal mn shbdon me utr aaya. bhai! yh jo hlka hlka surur hai teri umar ka sb kasur hai ha ha ha nhi. samvedansheel ho n isliye.यमुना के तीरे तीरे
    श्याम सलोने नटखट से
    राधा की पायल से गुंजित
    वृन्दावन के पनघट से
    स्मृति की नदिया में
    अश्रुपूरित नीरव तट से
    कालिदास के मेघ सलौने
    बोलो! मुझको क्यों भाये ' क्योंकि सावन के गीत रचते रचते श्याम सलौने बीच में चले आये.

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    1. इंदु जी इस कविता पर आपका खुश होना तो बनता है !

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    2. अलीजी इंदु बुआ का खुश होना तय था। मैं भी खुश हुआ... :)


      इसकी लय गजब की है... लोरी अली जी, नमस्‍कार

      कविता के मामले में अनपढ़ से भी गया बीता हूं। सो लय से अधिक और कुछ समझ नहीं पाया। उम्‍मीद है आप माफ करेंगी। :(

      हटाएं

शुक्रिया, साथ बना रहे …।