शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

"चलो...."



चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों

चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों

ताल्लुक बोझ बन जाए तो
उसको तोड़ना अच्छा
तार्रुफ़ रोग हो जाए तो
उसको भूलना बेहतर

वो अफसाना जिसे तकमील तक
लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर
छोड़ना बेहतर

चलो एक बार फिर से
अजनबी बन जाएं हम दोनों


आपने सुना है साहिर साहब का ये कलाम!
कहिये तो!!!

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी बिल्कुल देखा / सुना है और उन दोनों के लिये यही ठीक भी लगा !

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  2. सही फरमाया आपने
    शुक्रिया अली जी

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  3. साहिर का उम्दा कलाम।

    शुभकामनाएं।

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।