शुक्रवार, 24 जून 2016

पहला रोज़ा


    याद नही उम्र कितनी थी, पांचवे का इम्तेहान दिया था और अब तक रमज़ान में इफ्तारी खाने का ही लुत्फ उठया था कि रमज़ान के छट्वें रोज़े के दिन अम्मा दादी अम्मा के साथ लोगों की फेह्रिस्त बनाती बरामद हुईं. अप्रैल का महिना, ऐन मेरी सालगिरह के एक दिन पहिले. स्कूल अभी खुले नही थे, लिहाज़ा मदरसा और पेटिंग की क्लास के बाद चंग-अष्ट की मेह्फ़िलें और चम्पक, नंदन के साथ बीतती ख़ाली ख़ाली दुपहरें. बुज़ुर्गों के काम में ज़्यादा दख़लअंदाज़ी की इजाज़त तो थी नही सो पता भी नही था कि क्या होने जा रहा है. पडोस की रफ़ीक़ा ख़ालाजान के साथ दादी अम्मा जो जो मश्विरे कह सुन रहीं थी उससे तो यही अंदाज़ लगाया जा सकता था कि दूर दराज़ की किसी कुआंरी फूफीजान या ख़ालाजान की मंगनी ही होनेवाली है. तभी बडी अम्मा ने घुडका: “ज़्यादा इतराओ नही! कल तुम्हारा ही काम होगा” या अल्लाह! मेरी मंगनी!!! ख़ौफ के मारे कलेजा मुंह को आ गया! दूर दूर तक मोहब्ब्त लुटाते भाइयों के बीच कहीं भी दुल्हे की ख़ौफनाक तस्वीर का तस्व्वुर भी नही था, फिर ये मंगनी!!!! अंदर के बाग़ी तेवर कोई जवाब तलब करते इंसाफ की ज़ंजीर हिलाते इससे क़ल्ब ही अम्मा ने आकर बताया, “कल तुम्हारी सालगिरह भी है और पहिला रोज़ा भी.” जान में जान आयी मेरी. बक़ौल दादीअम्मा, “दिन भर भूखे भिनभिनाना तो मेरा ख़ास शगल था”, सो मुझे कोई ऐतराज़ नही था, फिर यहां तो पब्लिसिटी भी पूरी मिल रही थी, सो फख़्र से उडी उडी अडोस पडोस में भी गा आयी मैं! “ मेरा पहिला रोज़ा है, फ़लानी तुम भी आइयो और ढमाकी तुम भी आइयो”

       अगले दिन पूरे जोश से सेहरी में जगाया मुझे. नेहला धुला अम्मा ने नीली अम्ब्रेला फ्रोक के साथ पडोस की पिंकी बाजी की छोटी हुई पीली शल्वार पह्ना दी. (अस्ल में भाइयों के कपडों पर डाका डालने वाली उम्र की वजह से अभी ज़िंदगी में शल्वारों की घुसपैट शामिल नही हुई थी.) जल्द जल्द सेहरी खिला कर रोज़े की नियत करवाई गयी. बडी अम्मा ने ख़त्म- वक़्ते- सेहरी नाक दबा कर बडा सा ग्लास पानी का भी हलक़ मे उडैल दिया. और सेहरी का वक़्त खत्म हुआ. फज्र की अज़ान हुई, अम्मा ने नमाज़ के बाद क़ुरान हाथों में थमा दिया. यासीन पढते पढ्ते जम्हाइयों को दबा कर जल्द ही फारिग़ हो बिस्तर में लुडक गयी.

       एक नींद निकाली और जले पैर की बिल्ली की तरह आदतन बावर्चीख़ाने का रुख़ किया. “ अरी!! ये भूत की तरह यहां क्यूं मंडरा रही हो? रोज़ा है तुम्हारा!!!” बडी अम्मा ने डपटा तो ख़याल आया कि रोज़ा है. खिसियाती हुई बाहर आयी तो बाजी ने टोका, “अरे! मेहमान आ गये हैं! ज़रा मुंह धोकर कपडे बदल लो, नानीजान, मामूजान-मुमानी जान, चचा चची सब के सब लोग ही आते होंगे, जल्द कंघा लेकर आओ तो तुम्हारी चोटियां बना दूं”. मुझे बाजी का बाल खींच खींच कर चोटी बनाना सख़्त नापसंद था मगर उन्हें ना सुनने की आदत नही थी, अभी रोज़े में ही धुनककर रख देतीं सो मैंने चुपचाप चोटी करवाने को ही ग़नीमत जाना. इतने में अम्मा ने आकर बताया कि आज सब लोग मेरे लिये तोहफ़े और ढेर से कपडे भी लाने वाले हैं. मैं थोडी सी ख़ुश हो गयी. आज मुझे मेरी रोज़ की झाडू बुहारने वाली ड्युटी से भी छुट्टी मिल गयी थी. नानी के घर से लाये गये कपडे पहिन मैं फिर आंगन से कमरे, कमरे से छज्जे डोलने लगी. दिल में खयाल आया, रोज़ा है, कोई काम तो है नही, क्यूं न थोडी टीवी टावी ही देख ली जाये. प्लग लगाया ही था कि सीआईडी की तरह फिर बडी अम्मी नाज़िल, “अ‍री कम्बख़्त! रोज़े में टीवी नही देखते, रोज़ा मतलब नफ्स का रोज़ा. किसी  क़िस्म का कोई एंनटरटैनमेंट नही.” उनकी घुडकियां दिल पर ली भी ना थी कि सब के सब चचा, फूफा अपनी जतन से जमा की गयी बच्चों की फौज समेत हाज़िर. गुडिया गुडिया का शोर मचाते कोई चूमचाट रहा था तो कोईं मारे ख़ुशी के गले लगा रहा था. मेरा पूरा ध्यान साथ लाये तोहफों के झोलो पर था.

           दिन का दूसरा पहर चालू. सूरज ऐन सर के ऊपर. ज़ुहर की नमाज़ का वक़्त. मर्द हज़रात मस्जिद मे नमाज़ अदा करने गये. औरतों ने घर में पढी. नानीअम्मी का फरमान जारी हुआ, “ बाई! रोज़दार बच्ची को हवा में लिटा दो. चचियां, मुमानियां और फुफियां नमाज़ के बाद बावर्चीख़ाने में अम्मां की मदद करने लगीं.  नसीम आपा एक बडे से टोकरे में गर्मागरम पकौडे उतारने मे लगीं तो क़ुरैश आपा पापड तलाई को बैठ गयीं, मुहल्लेभर से झारे पल्टे मांग इफ्तारी की तैय्यारियां होने लगीं. पडोस की यास्मीन और तस्नीम बाजी पपिते और तरबूज़ काटने को मुक़र्रर हुईं और छम्मी आपा लगीं ख़्वान परातों की सफाई में.  हम उम्र सहेलियां घर के वाहिद कूलर ( जिसे दादीजान “भड् भड ख़ूंटा” भी कहती थीं )  के सामने मुझे लेकर बैठ गयीं. बबलीबाजी ने फौरन मेहंदी घोली और मेरे हाथ पैरों में बेलबूटे लगा डाले. हम उम्र लड्कियों बालियों को भी मेहंदी लगा वह किचन में गयी और मैं घडी की तरफ़ देख वक़्त का जायेज़ा लेने लगी. सारी सहेलियां ठंडी हवा मे सो पसर गयीं इतने में पडोस के बच्चे भी आगये. भाई लोगो मे पूछा, “रोज़ा तो नही लग रहा? बस चार पांच घन्टे और हैं फिर जी भर के खाना! बाहर तो सिर्फ तुम्हारे रोज़े की खुशी में ही शामियाने लगे हैं, टैरेस गार्डन की सफाई की है और जमातख़ाने से बडे बर्तन भांडे मंगवाकर गांव भर की दावत और रोज़ाकुशाई का इंतेज़ाम किया है. सुनते हैं दुल्हेभाई और बडी बाजी के ससुराल वाले तुम्हारे लिये नोटों का हार लाने वाले हैं!” मैं मारे खुशी के और फूल फैल गयी. दोपहर की नमाज़ में खूब दुआ की कि ऐ अल्लाह! तू मेरा रोज़ा क़ुबूल फरमा!

       दिन के चार बजने आये दोपहर ढलने की नमाज़ में थोडा वक़्त होगा कि पडोस के मेह्नाज़ और गुल्नवाज़ आ धमके. मुझे डाले गये हारों को बाजी ने क़रीने से एक ढेरी की शक्ल दे, चादर से ढांक दिया था. उन दोनो शैतानो की नज़र जब हार पर गयी तो गुल्गेंदे की पत्तियां  तोड वह उसके फूलों की नमकीन जडे खाने लगे. लो तुम भी खाओ, कहने की देर थी और मैं भी खाने लगी, एक जड खायी ही थी कि याद आया मेरा तो रोज़ा है! हाय अ‍ल्लाह !! अब क्या होगा!!! मेरे चेहरे के रंग उडते देख दोनो आंखे तरेरते हुए बोले, “ होगा क्या! तुमने रोज़ा तोड दिया है!! हम अभी सब से कह आते हैं शामियाने निकालो, तोहफे हमे दे दो, खाना पकाना बंद करो, भटियारों घर जाओ, इफ्तारी मुहल्ले पडोस में बांट दो, नोटोका हार फैंक दो कि लडकी रोज़ा तोड चुकी है!!!”

       मेरा दिल बैठ गया और मै ख़ुद का तस्सवुर कोर्ट मार्श्ल किये गये कैप्टन सा ही करने लगी. आंखो से आंसू की बूंदे छलक पडी और  जी में आया मैं ख़ुद्कुशी कर लूं. इतने में उन दोनो का बडा भाई “ शाहनवाज़”  जो उम्र में हमसे कोई साल दो साल बडा होगा आया और रोने का सबब पूछ्ने लगा. मै कुछ कहती उससे पहिले वह दोनो उसे नमक मिर्चे लगा सब कह गये. उसने गौर से सुना और मुझे समझा के कह्ने लगा, “जाओ! दौड कर गुस्लख़ाने मे जा कर कुल्लियां कर लो और तौबा कर लो, भूल में तो सब माफ़ है” मैं फौरन तौबा करती हुई गुस्लख़ाने की जानिब दौड गयी, वापस आयी तो दोनो शैतान फिर बोले, “ अ‍ॅल्लाह मियां  तो ठीक हैं , तुम दुनिया को क्या जवाब दोगी!!! हम अभी सब से बोल आते हैं!” शाह्नवाज़ ने आंखे तरैरी और बेंत दिखाते हुए उन्हें धमकाया, “ ख़बीसों! आज सुबह हदीस की क्लास मे आलिम साहब ने समझाया था न कि जो किसी के एक ऐब पर पर्दा डालेगा, अ‍ॅल्लाह आख़िरत में उसके ऐबों से पर्दापोशी कर उसे ज़लील होने से बचायेगा!!!” दोनो के दोने डर कर भाग ख़डे हुए.


       मगरिब हुई, मैंने गोटे टका नया सूट पहिना. लाल हाथों में चट मेहंदी रचायी, रोज़ा इफ्तारा गया, मुझे कपडे, खिलौने और तोहफे सभी कुछ मिले. खिलौने मैने शाह्नवाज़ को दिखाये और इफ्तारी के बचे हुए पापडों का टोकरा मैंने और शाह्नवाज़ ने कच्ची सीढियों पर साथ बैठ कर निबटाया.       

28 टिप्‍पणियां:

  1. इतना नियम कानून
    मैं तो सिर्फ करवा चौथ में हाँफ जाती हूँ
    यहाँ तो एक महीने का करवाचौथ
    तौबा..

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  2. आपको पढ़कर इस्मत चुगताई जी याद आ गईं.बड़ा रोचक अनुभव.बालमन कई तरह की स्मृतियों को संजोकर रखता है.

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    1. अचानक से आपने ईसमत जी का दर्जा दे दिया!!! अब तो कुछ कहने को बचा ही नही....शुक्रिया !!!

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  3. बालपन में त्यौहार का अपना ही एक आनन्द होता है जो हमेशा यादगार पल बन कर हमारे साथ चलता , बहुत रोचक लगा एक ही बार में सब पढ़ गई ।

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  4. बालपन में त्यौहार का अपना ही एक आनन्द होता है जो हमेशा यादगार पल बन कर हमारे साथ चलता , बहुत रोचक लगा एक ही बार में सब पढ़ गई ।

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  5. वाह ,
    बेहतरीन और रोचक वर्णन पहले रोजे का , बधाई इस मजबूती के लिए :)
    हमने भी एक दिन रोजा रखा था शिवरात्रि पर , अाधा दिन जैसे तैसे कट सका उसके बाद हमारे बदायूं का हलवाई चौक जहां से निकलते हुए मुंह मे पानी अाता था , काम अाया ! चुपचाप एक कोने मे खड़े होकर जीभर कर अालू टिक्की खाई , अाज तक नहीं भूला वह व्रत ...
    बढ़िया लिखती हो !

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  6. पहले पैराग्राफ से मुझे खटका था कि छोरी व्रत खोटा करके ही मानेगी।

    खुदा को ही एडजस्ट करना पड़ेगा।

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  7. पहले पैराग्राफ से मुझे खटका था कि छोरी व्रत खोटा करके ही मानेगी।

    खुदा को ही एडजस्ट करना पड़ेगा।

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    1. अल्लाह,सिद्धार्थ भाइ जान!!! आपने तो पूरी कुन्डली ही बांच डाली छोरी की....  शुक्रिया आने क लिये.... अपनो के बिना क़िस्सेगोयी की मेह्फिल मे रंग ही नही आता

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  8. बेहद खूबसूरत रचना. संजीदगी से भरी हुई. गांव की यादें ताजा हो गयीं. कई दोस्त याद आ गये. कासिम भाई, निसार भाई और भी बहुत से लोग....

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  9. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-06-2016) को "लो अच्छे दिन आ गए" (चर्चा अंक-2385) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. शुक्रिया गुरुदेव!!! साथ बना रहे..... 

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    1. शुक्रिया डाक्टर साहिबा ..ये मेरे बच्पन की प्यारी यादों की पोटली में से एक है

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " खालूबार के परमवीर को समर्पित ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. नीले और पीले की जुगलबंदी में बहुत ज्यादा तंदुरुस्त बच्ची का तसव्वुर किया :) पता नहीं कैसे और क्यों ? रोज़े ने आपके साथ निबाह ली बड़ी बात है :P

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    1. क्या कहने!!! आपके तस्व्वुर को मान गयी, सही है, बहुत गप्पु सी थी मैं !! और बेहद पूछ्ताछ करती रहने वाली....अम्मी मुझे नेहला धुला ज़्यादातर बाहर भेज देती थी ताकि उनका मगज़ खराब ना हो....इसी से भाइयों की सोहबत का असर रहा ....डांटमार भी बहुत खायी

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  13. वाह, वाह, आपके रोजे की कहानी पढ कर बहुत मज़ा आया। खुदा ने आपको माफ ही कर दिया समझिये। अब गेंदे के फूल की जड भी कोई लालच में खाने वाली चीज़ है?

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  14. अत्यंत रोचक संस्मरण ! आप बहुत कमाल का लिखती हैं ! पहले रोज़े और बाल मनोविज्ञान का लाजवाब ख़ाका खींचा है ! बहुत मज़ा आया !

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  15. आपकी इस प्रस्तुति से आपके धर्म के रीति रिवाज़ों के बारे में भी महती जानकारी मिली ! बहुत ही मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक पोस्ट ! आभार !

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।