शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

जंगल की बेटी

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हरसिंगार की महक के जैसी, हर दिल पर छा जायेगी 
रुत की एक सहेली है वह, रुत संग ही खो जायेगी 

​​भौर किरन के साथ निकल कर बगिया बगिया घूमेगी 
शाम ढले सूरज के संग ही बादल में सो जायेगी 

लहरों लहरो टूट के  साहिल के सीने पर बिखरेगी 
बादल बादल रक़्स करेगी, चिड़ियों के संग गायेगी 

अम्बर के कच्चे रंगों पर पंछी बन कर डोलेगी 
घास के ताज़ा फूलों में फिर चटखेगी मुस्कायेगी 

कोहरे के आँचल में लिपटे हलके गीले बाल लिए 
धान के जैसी बाली  उमर में गीत खुशी के गायेगी 

चाँद किरन के झूले में वह तारों से बतियाएगी
सुबह सवेरे शबनम बन कर , हर गुंचा धो जायेगी 

तेरे सुनहरे क़ैद में कैसे, ये अल्हड़ जी पायेगी 
मालो -ज़र के ढेर में दब कर ये पगली खो जायेगी 

जंगल की वहशत फिर उसमे मार रही है लश्कारे 
जंगल की बेटी वापस फिर जंगल की हो जायेगी 

                                                       - सेहबा जाफ़री 

16 टिप्‍पणियां:

  1. what I call, "Lady Wordsworth" or "Judith Shakespeare" ????
    "Jangal ki Beti" .......lovly

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  2. बहुत ही सुन्दर....
    अम्बर के कच्चे रंगों पर पंछी बन कर डोलेगी
    घास के ताज़ा फूलों में फिर चटखेगी मुस्कायेगी
    वाह!!!

    अनु

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  3. अती सुन्दर ... मन को छूते हुए छंद हैं सभी ...
    नव वर्ष की मंगल कामनाएँ ...

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  4. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।