गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012




तेरी याद में दिल का फिर पलाश हो जाना
चाँद का हाथों से गिर कर पाश पाश हो जाना

रुकती थमती धडकनों के सिलसिलों के साथ साथ
आती जाती इन रुतों का इक तलाश हो जाना

मिलन के मौसम के बीच, तसव्वुर ए फ़िराके यार
जिस्म का पल भर को चल कर लाश लाश हो जाना

ज़िन्दगी के तब्सिरे में, एक तिरा ज़िक्र ए वफ़ा
टूटते से दिल में फिर एक खराश हो जाना
-सहबा जाफ़री

5 टिप्‍पणियां:

  1. tippani nahi pyar bhej rahi hoon...aap itna pyara likhti ho - aur dher sara likh ke theek se chapvati kyon nahi ho? aur itne din kahan gayab thi?? ekadh email karo to kuch baat vaat ho... :)

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  2. अमूमन पलाश दहकन का अहसास कराते हैं और जब उन्हें यादों से वाबस्ता कर दिया तो कमाल हो गया ! रुतों और धड़कनों को एक ही स्केल से नाप डाला , सो धमाल हो गया ! मिलन के साथ जुदाई के हिचकोलों में गुज़रती जिंदगी में उसकी वफाओं का ज़िक्र इक खराश क्या ?
    ...गोया गहरा मलाल हो जाना !

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    1. जाफरी साहब आहें भर रहे हैं और अली सा कमाल धमाल कर रहे हैं:)

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।