शनिवार, 17 जनवरी 2015

तुम याद हमें भी कर लेना



जब झूम के उट्ठे सावन तो, तुम याद हमें भी कर लेना
जब टूट के बरसे बादल तो, तुम याद हमें भी कर लेना 

जब रात की पलकों पर कोई ग़मगीन सितारा चमक उठे 
और दर्द की शिद्दत से दिल भी जब रेज़ां -रेज़ां  हो जाए
जब छलक उठे बेबात नयन ,तुम याद हमें भी कर लेना 

पूरे चाँद    की    रातों    को   जब   हवा  चले ठंडी ठंडी
और कोई दीवाना पंछी जब चाहत से चाँद को  तकता हो
उस लम्हे की ख़ामोशी  को तुम अल्फ़ाज़ों में बांधो जब
और लिखो जब कोई ग़ज़ल, तुम याद हमें भी कर लेना 

सारी ख़्वाहिश बर आए जब, और दिल ख़्वाहिश से खाली हो
सब के बाद जो तेरा   दिल  , बस   चाहत  का  सवाली  हो
बेगर्ज़ मोहब्बत की चाहत में, दिल तेरा जब तड़प उट्ठे
ये तड़प  जो हद से बढ़ जाए ,तुम याद हमें भी कर लेना 

दिल का भोला बच्चा जब, सबसे बग़ावत कर बैठे
तन्हाँ-तन्हाँ , रुठा -रूठा दीवाना बन जाए जब
जब दुनिया भर से शिकवा हो और आँख से आंसू बह निकले
उस मासूम से लम्हे में तुम याद हमें भी कर लेना
- सहबा जाफ़री 

24 टिप्‍पणियां:

  1. Sahba Zafri ko pehli baar padha shayad Achchhi lagi ye nazm. Shukriya share karne ke liye.

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  2. बहुत ही सुन्दर गीत ... भावो से परिपूर्ण ...

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  3. बहुत सुन्दर ! मन को छूती हुई भावनाएं और अल्फ़ाज़ ! साझा करने के लिये शुक्रिया !

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  4. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (19-01-2015) को ""आसमान में यदि घर होता..." (चर्चा - 1863) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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शुक्रिया, साथ बना रहे …।