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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

मश्विरा



नन्ही लड़की!
साहिल के इतने नज़दीक
रेत से अपना घर ना बना
कोई सरकश मौज इधर आयी तो
तेरे घर की बुनियादे तक बह जायेंगी
और फिर उनकी याद में तू
सारी उम्र उदास रहेगी
-परवीन शाकिर

रविवार, 8 अप्रैल 2012

समन्दरों के उधर से कोई सदा आयी .....


"कहीं रहे वो मगर खैरियत के साथ रहे
उठाये हाथ तो लब पर यही दुआ आयी ..."
- परवीन शाकिर


मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

अपनी यूनिवर्सिटी की नन्ही सी दुनिया से निकलकर, एक अनजान शहर, अनजान नगर से शुरू हुई ज़िंदगी ने मुझे लुबना से मिलाया था, और मै नहीं जानता था कि यह रब की मर्जी थी या इत्तेफाक कि हम दोनों एक ही साथ, एक ही घड़ी इस शहर के बस अड्डे पर उतरे थेवह खामोश नज़रों से इधर उधर तक मंजिल की थाह लेने की कोशिश कर रही थी, और मै, उससे बेखबर लम्बे लम्बे डग भरता अपने मंजिल तक पहुचने का ठिकाना कर रहा था। "एक्सक्यूज़मी" उसकी तमीजदार आवाज़ ने मुझे चौकाया। "ज्जी! " मैंने जवाबन कहा। "आप मुझे यूनिवर्सिटी का रास्ता बता सकते हैं क्या? दरअसल मै इस शहर में नयी हूँ। "मै भी वहीं जा रहा हूँ, आप चाहें तो साथ हो लें! " वह बड़ी बेबाकी से मेरे साथ चलने लगी हैरत हुई मुझे! कितनी आसानी से भरोसा कर लिया इसने मुझ पर! रस्मी बातचीत के दौरान मालूम हुआ कि मोहतरमा पीएचडी के सिलसिले में यहाँ तशरीफ लाई हैंहमारे मक़सद और डिपार्टमेंट दोनों एक ही बिल्डिंग में थेलुबना अंग्रेज़ी विभाग में और मै राजनीतिउसे दुमंजिले पर बने उसके विभाग में पहुंचा, मै अपने विभाग तक आया, यहाँ पीएचडी की ज़रूरी जानकारियाँ इकट्ठी कर मै वापस आयासुस्त क़दमों से राहदारी और लान पार कर एक घने बरगद के करीब से गुज़रा ही था, कि वह फिर दिखी, आराम से पालथी जमाये, नीबू का अचार चट्कारतीमै मुस्कुरा दिया
"प्लीज़ अज़ीम! कुछ खा लीजिये, मुझे खुशी होगी" उसका मिन्नत भरा लहजा मै टाल नहीं सकाआखिर अमृतसर कोई पास नहीं था कि मै कहूं कि मेरा घर पास ही है, और मुझे भूख नहीं है






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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012




तेरी याद में दिल का फिर पलाश हो जाना
चाँद का हाथों से गिर कर पाश पाश हो जाना

रुकती थमती धडकनों के सिलसिलों के साथ साथ
आती जाती इन रुतों का इक तलाश हो जाना

मिलन के मौसम के बीच, तसव्वुर ए फ़िराके यार
जिस्म का पल भर को चल कर लाश लाश हो जाना

ज़िन्दगी के तब्सिरे में, एक तिरा ज़िक्र ए वफ़ा
टूटते से दिल में फिर एक खराश हो जाना
-सहबा जाफ़री

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

यूं देखती है जैसे नहीं देखती नज़र
ज़ालिम के देखने का अंदाज़ देखिये....

शनिवार, 21 जनवरी 2012

तुम मुझको गुडिया कहते हो



तुम मुझको गुडिया कहते हो
सच कहते हो
खेलने वाले सब हाथों को
गुडिया ही तो लगती हूँ मै
जो पहना दो, मुझ पे सजेगा
मेरा कोई रंग नहीं
जिस बच्चे के हाथ थमा दो
मेरी किसी से जंग नहीं
कूक भरो
बीनाई लेलो
या मेरी गोयाईं ले ले लो
मांग भरो
सिदूर सजाओ
प्यार करो आँखों में बसाओ
और जब दिल भर जाये तो
दिल से उठा कर ताक़ पर रख दो
तुम मुझको गुडिया कहते हो
सच ही तो कहते हो
- परवीन शाकिर.

शनिवार, 26 नवंबर 2011



"ज़िंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी
मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जायेगी ......."