यूं देखती है जैसे नहीं देखती नज़र
ज़ालिम के देखने का अंदाज़ देखिये....
शनिवार, 11 फ़रवरी 2012
शनिवार, 21 जनवरी 2012
तुम मुझको गुडिया कहते हो

तुम मुझको गुडिया कहते हो
सच कहते हो
खेलने वाले सब हाथों को
गुडिया ही तो लगती हूँ मै
जो पहना दो, मुझ पे सजेगा
मेरा कोई रंग नहीं
जिस बच्चे के हाथ थमा दो
मेरी किसी से जंग नहीं
कूक भरो
बीनाई लेलो
या मेरी गोयाईं ले ले लो
मांग भरो
सिदूर सजाओ
प्यार करो आँखों में बसाओ
और जब दिल भर जाये तो
दिल से उठा कर ताक़ पर रख दो
तुम मुझको गुडिया कहते हो
सच ही तो कहते हो
- परवीन शाकिर.
सोमवार, 10 अक्टूबर 2011
मंगलवार, 20 सितंबर 2011
ख़ुदा हाफिज़
मरहबा मरहबा , खुदा हाफिज़
ऐ वफ़ा आशना ख़ुदा हाफिज़
कोई उनका ख़ुलूस तो देखे
क़त्ल करके कहा ख़ुदा हाफ़िज़
अच्छा अब फिर मिलेंगे ऐ नासेह!
उनका घर आ गया ख़ुदा हाफिज़
जाने क्योँ आज साज़े-हस्ती से
आ रही है सदा ख़ुदा हाफिज़
वक्ते- आखिर वो मुझसे यूँ बोले
आज से आपका ख़ुदा हाफिज़
बैठे बैठे हयात ने अख्तर
दफ'अतन ये कहा ख़ुदा हाफिज़
- अख्तर ग्वालियरी
शुक्रवार, 16 सितंबर 2011
तुम्हारे लिए....!
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
सदस्यता लें
संदेश (Atom)



