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बुधवार, 27 अगस्त 2014

चल रे मटके टम्मक टूँ


उन प्यारे दिनों के नाम, जब माँ रोज़ ही सोने के पहले यह सब सुना करती थी : 

हुए बहुत दिन बुढ़िया एक 
चलती थी लाठी को टेक 

उसके पास बहुत था माल 
जाना था उसको ससुराल 

मगर राह में चीते शेर 
लेते थे राही को घेर 

बुढ़िया ने सोंची तदबीर 
जिससे चमक उठी तक़दीर 

मटका एक मंगाया मोल 
लंबा लंबा गोल मटोल 

उसमे बैठी बुढ़िया आप 
वह ससुराल चली चुपचाप 

बुढ़िया गाती जाती यूँ 
चल रे मटके टम्मक टूँ

                                                   - बताइये  कौन है इस बालगीत का रचनाकार 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

मोहब्बत बरसा देना तुम, सावन आया है …।


               " बस भी करो यार! तुम्हारे बगैर हम क्या मज़े करें!! " उसने तुनकते हुए कॉल डिस्कनेक्ट की और गुस्से में लाल भभूका मुँह करते हुए, खिड़की के पल्ले से जा लगी. बेवजह सारा गुस्सा, अगस्त के सूरज को कोसने में लगा दिया, " कमबख्त  सारा पानी सोंख कर पता नहीं अपनी अम्मा को पिलाएगा या क्या! " और ये गर्मी ये गर्मी ! यह उमस!! और और यह पसीना!!! उसने गुस्से में पावों की सैंडल निकाल ड्राइंग रूम के कांच को निशाना बनाया।  

               "बस तो करिये भाभी ! हम लोग इस गर्मी के आदी  हैं, क्या  हो गया है आपको !"
ज़ीशान बाथरूम से बाहर आ सिर्फ इतना बोल कर यों  खिसका मानो , ज़्यादा  बोलने पर टैक्स लगता हो. 

                 अर्शी कुछ न बोली , दूसरी सैंडल निकाल उसके जाते ही, बंद होते दरवाज़े पर दे मारी।  क्या जवाब देगी बच्चों को! कैसे कहेगी छह महीनों से जो वादा किया जा रहा था, वह महज़ सब्ज़बाग था ! आरिश  तो मान लेगा पर अना  तो मचल ही जाएगी।  अल्लाह! क्या सीखेंगे ये बच्चे अपने बाप से! " फर्स्ट डे- फर्स्ट शो "  जाने कब से चिल्ला रहे थे, आज फिल्म रिलीज़ हुई और 
मियाँजान को ऑफिस का काम निकल पड़ा  कितने दिन से बच्चे सोंच,रहे थे " ये होगा, वह होगा।" अब क्या जवाब देगी बच्चों को! और सबसे बुरी तो बेचारी खुद उस पर ही बीती, कल पार्लर गई थी, आज जतन से तैयार हुई, मिया मोहब्बत से तकते हुए बोले, " जान!  बॉस का फोन है , बस यूँ गया यूँ आया"  दिल तो धड़ाक से ऐसे बैठा था, जैसे बॉस न हुआ सास हो गई. 

अब! अल्लाह, बच्चों की तरह ठुनक उठी वह. बच्चे बावले भी तैयार होकर आ गए थे।

                      गुमसुम गुमसुम बैठी ही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई।  अब कौन आया ! देखा, बरसों पुरानी दोस्त "कीर्ति" खड़ी थी, हर पहली बारिश,  सावन की तरह झूम के  दरवाज़े पर आ जाती थी, घर के कड़े पहरे और काम काज सबके बीच से गोटियां जमाती ऐसे उड़ा ले जाती कि कोई चूँ  भी न करे , गांधी हॉल के झूलों, सराफे की चाट, और 'रीगल' की एक मूवी के बीच , हर पहली बारिश का पहला दिन यादगार बना लेते थे हम दोनों और कम्बख़्त गाजर मूली की तरह झूठ बोल, मुझे वापिस दादी अम्मी के पास जमा भी करा जाती थी। 

" नीचे कार खड़ी है चल! " उसका वही अंदाज़ 
 नहीं यार! अब ससुराल से ऐसे कैसे पॉसिबल है..... मैं वही सहमी सहमी।

" अंधी! तुझे दिखता नहीं अगस्त आ गया, पूरा इंदौर  सूखा है , जानती है क्यों ! सब तेरी वजह से!  मायके आ, मुझसे नही मिली!! सज़ा है उसकी।   अरी कमबख़्त !  मेरा नहीं मौसम का तो लिहाज़ किया होता! 
अरी दो सहेलियां न मिले तो बारिश भी नहीं होती. डालो बच्चों को गाड़ी में, मेरे बच्चे तो मैं नानी के पास जमा करा आयी हूँ" 

" पर बच्चे!  उनके अब्बू ! उनसे क्या कहूँगी मैं !" मेरे समझ में नही आ रहा था। 

" ओ  हरीश-चन्द्र! मेरे बच्चोँ के साथ खेलेंगे तेरे बच्चे! अभी ही नया झूला लगाया है अम्मा की छत पे. और तू तो मेरी देवरानी को खून देने जा रही है कौनसा सराफे की चाट खाने जा रही है !" उसने एक आँख दबा कर मुझे मुस्कुरा कर देखा। मैं  धक धक होते दिल से गाडी मैं  बैठी; कमबख़्त  ऊंचे सुरों में 
गा  रही थी : " मोहब्बत बरसा देना तुम सावन आया है…। " 

सोमवार, 11 अगस्त 2014

:)



इस मसाइल में तेरी याद क्या 
जैसे तितली पहाड़ पर आयी 
                                          - डॉ बशीर बद्र ​

बुधवार, 4 जून 2014

पर्यावरण दिवस मुबारक

landscapes nature trees night moon digital art 1920x1080 wallpaper



 
नहीं छेड़ते पंछी सुबह 
ताज़गी की सरगम
नहीं जागते हम अब 
भौर की उजास के साथ
 
वीडियो गेम की 
लत में डूबा बचपन 
सुनता है 
मोबाइल में लोरी 

पहला प्यार 
होता है अब 
केमिस्ट्री  लैब में 
और  करहाने लगता है 
फ़िज़िक्स  लैब की 
 सीढ़ियों तक आते आते

मॉल में 
बुनते हैं सब सपने 
घास, पंछी, दूब नदियाँ 
दूर तक नही आती 
ख़्वाब   के किनारों में 

कैमिकल  की नकली बारिशों में 
भीगती प्यार की कोमल भावनाएं 
नक़ली गुलाब की कलियाँ  थामे 
नाचती हैं 
नक़ली पेड़ों के इर्द गिर्द 

भीड़ भरी सड़कों की 
धूल  भरी आपाधापी 
पैदा करती है 
ऐसी  ग़ज़लें 
जिनमे नहीं होती आक्सीजन  

वी ऍफ़ एक्स के 
इफेक्ट्स से पैदा हुए 
चाँद के इर्द गिर्द 
हाले को देख , 
ए. सी. में बैठे
 बच्चे  गुनगुनाते हैं  
चन्दा मामा दूर के 
         -  लोरी 
इमेज : गूगल से साभार 

शनिवार, 24 मई 2014

एक प्याली चाय




 



एक कसक 
एक खलिश 
कुछ मिला अनमिला 
कुछ गुमा अध गुमा 
कुछ अधूरे ख़्वाब 
कुछ नामुकम्मल ख्वाहिशें 
 सबकी टूटन 
और नए रास्तों पर चलने की हिम्मत 
कितना कुछ बाँट बूंट कर 
हल्का कर देती है
एक प्याली चाय 
अम्मा पास न हो तो 
दुलार भी देती है 
जीने का हौंसला भी दे जाती है 
और दे जाती है 
गर्म भाँप  में धुँआते से दिल को 
इतवार की  सुबह 
देर तक सोने के
 रंगीन सपने   
लोरी 

रविवार, 27 अप्रैल 2014

मैं और तुम गर…।






नाश्ता, खाना,  बच्चे, कपडे, होमवर्क, बजट, पति का  गुस्सा, बीमा की पॉलिसी , इनका ब्लड प्रेशर , मेरी शुगर, माँ की बीमारी, सास के दर्द , देराणी - जेठानी  की रीत रस्मे और इनके बीच सिसकते उसके अरमान, समाज, दुनिया,घर परिवार!!!एक  सुबह  हुई नही कि  इतनी चिन्ताएं।  और रेडिओ वाले गाना सुनवा रहे हैं:

कितने हंसी मौसम हो जाते 
मैं  और तुम गर हम हो जाते।  

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

नारी तुम केवल श्रद्धा हो





नारी तुम केवल श्रद्धा हो  विश्वास रजत  पग  पग  तल  में ,
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो  जीवन के सुन्दर समतल में ......