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शनिवार, 17 जनवरी 2015

तुम याद हमें भी कर लेना



जब झूम के उट्ठे सावन तो, तुम याद हमें भी कर लेना
जब टूट के बरसे बादल तो, तुम याद हमें भी कर लेना 

जब रात की पलकों पर कोई ग़मगीन सितारा चमक उठे 
और दर्द की शिद्दत से दिल भी जब रेज़ां -रेज़ां  हो जाए
जब छलक उठे बेबात नयन ,तुम याद हमें भी कर लेना 

पूरे चाँद    की    रातों    को   जब   हवा  चले ठंडी ठंडी
और कोई दीवाना पंछी जब चाहत से चाँद को  तकता हो
उस लम्हे की ख़ामोशी  को तुम अल्फ़ाज़ों में बांधो जब
और लिखो जब कोई ग़ज़ल, तुम याद हमें भी कर लेना 

सारी ख़्वाहिश बर आए जब, और दिल ख़्वाहिश से खाली हो
सब के बाद जो तेरा   दिल  , बस   चाहत  का  सवाली  हो
बेगर्ज़ मोहब्बत की चाहत में, दिल तेरा जब तड़प उट्ठे
ये तड़प  जो हद से बढ़ जाए ,तुम याद हमें भी कर लेना 

दिल का भोला बच्चा जब, सबसे बग़ावत कर बैठे
तन्हाँ-तन्हाँ , रुठा -रूठा दीवाना बन जाए जब
जब दुनिया भर से शिकवा हो और आँख से आंसू बह निकले
उस मासूम से लम्हे में तुम याद हमें भी कर लेना
- सहबा जाफ़री 

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

वह जब से शहर-ए -ख़राबात को रवाना हुआ



वह जब से शहर-ए -ख़राबात को रवाना हुआ 
बराहे रास्त मुलाक़ात को ज़माना हुआ 

वह शहर छोड़ के जाना तो कब से चाहता था 
यह नौकरी का बुलावा तो एक बहाना हुआ 

ख़ुदा  करे तेरी आँखें हमेशा हँसती  रहें 
ये आँखें जिनको कभी दुःख का हौंसला न हुआ 

कनारे सहने चमन सब्ज़ बेल के नीचे 
वह रोज़ सुबह का मिलना तो अब फ़साना हुआ 

मैं  सोंचती हूँ कि मुझमे कमी थी किस शै की 
कि  सब का  होके  रहा वह, बस एक मेरा न हुआ 

किसे बुलातीं हैं आँगन की चम्पई शामें 
कि  वह अब नए घर में भी पुराना हुआ 

धनक के रंग में साड़ी तो रंग ली मैंने 
और अब ये दुःख कि  पहन कर किसे दिखाना हुआ 

मैं  अपने कानों में बेले के फूल क्यूँ  पहनूँ 
ज़बाने रंग से किसको मुझे बुलाना हुआ 
                                             - परवीन शाकिर 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

अपने साथी से



धूप  में बारिश होते देख के 
हैरत करने वाले! 
शायद तूने मेरी हँसी को 
छूकर 
कभी नहीं देखा !
                      - परवीन शाकिर 

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

वो अक्स-ए -मौज -ए गुल था



वो अक्स-ए -मौज -ए  गुल था, चमन चमन में रहा 
वो रंग रंग में उतरा , किरन  किरन  में रहा

वो नाम हासिल-ए -फन, हो के' मेरे फन में रहा 
कि  रूह बन के मेरी  सोंच के बदन  में रहा 

सुकूने दिल के लिए मै , कहाँ कहाँ न गयी 
मगर ये दिल कि  सदा उसकी अंजुमन में रहा 

वो शहर वालों के  आगे कहीं मोहज़्ज़ब था 
वो  शख़्स  जो शहरों से दूर बन में रहा में 

चराग़ बुझते रहे, और ख़्वाब  जलते रहे 
अजीब तर्ज़ का मौसम मेरे वतन में रहा  

                                                   - परवीन  शाकिर 

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

दयार -ए -दिल की रात में,




दयार -ए -दिल की रात में, चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ , वह शक्ल तो दिखा  गया

जुदाइयों  के ज़ख्म, दर्द-ए -ज़िंदगी ने भर दिए
तुम्हे भी नींद  गयी , हमें भी सब्र  आ गया

ये सुबह की सफेदियां, ये दोपहर की ज़र्दियां
अब आईने में देखता हूँ , मै कहाँ चला गया

पुकारती हैं फुर्सतें , कहाँ गयी  वो सोहबतें
ज़मीं  निगल गयी उन्हें, या आसमान  खा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब , नसीब-ए -दुश्मनी हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

ये किस ख़ुशी की रीत  पे ग़मों  को नींद आ गयी
वो लहर किस तरफ गयी, ये मैं कहाँ समा गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक
उठो अमलकशों उठो ! के  आफ़ताब  आ गया
                                                                       शायर  ए नामालूम 
                                                                    प्रस्तुति : लोरी 

बुधवार, 19 नवंबर 2014

कौन कहता है अच्छे दोस्त नहीं होते....!!!!

 आज पूरे हो गए हैं है चार साल हमारी प्यारी दोस्ती को :

                    १९ नवम्बर २०१० को रमन जी से नेट पर हुई पहली मुलाक़ात।  और सुख दुःख की छुटपुट घटनाओ में एक  दूसरे का  दर्द बाँटते प्यारे -मीठे क्षण।  मैं  रमन जी  की आत्मीयता एवं स्नेह के लिए ईश्वर की आभारी हूँ:  




(रमन भगत : ग़रीबों  को वस्त्रदान करते हुए:
जीना इसी का नाम है…। )


शहज़ाद भाई, हौंसले के क़दमों पर खड़े मेरे दूसरे अज़ीज़ दोस्त. २० नवम्बर २०१० दिन के तीन बजे पहली बार नेट पर मिले,  मेरी प्रेरणा का स्त्रोत बने व अब मेरे आत्मीय जनों  में शामिल है। उनके जैसा प्यारा दोस्त पाकर मैं  ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ: 



 (शहज़ाद भाई: किसी की मुस्कुराहटों पे' हो निसार)

हमारी दोस्ती क़ायम दाईम  रहे , आपके  जीवन आदर्श इसी तरह युवाओं के लिए प्रेरणा बनते रहें और आप तमाम बुलंदियों को छुएँ। 
                                     -अमीन 
                                        दोस्त लोरी।  

बुधवार, 10 सितंबर 2014

नहीं है ........





तुझसे कोई गिला नहीं है 
क़िस्मत में मेरी सिला नहीं है 

बिछड़ के तो न जाने क्या हाल हो 
जो शख़्स  कभी मिला नहीं है 

जीने की तो आरज़ू ही कब थी 
मरने का भी हौंसला नहीं है

जो ज़ीस्त को मो'तबर  बना दे
ऐसा कोई सिलसिला नहीं है 

खुशबू का हिसाब हो चुका 
और फूल अभी खिला नहीं है

 सरशारी-ए - रहबरी में देखा 
पीछे मेरे काफला नहीं है 

एक ठेस पे दिल का फूट बहना
छूने में तो आबला नहीं है 
                           - परवीन शाकिर