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सोमवार, 24 जनवरी 2011

" कैसा है बंधन.........!!!! "







कभी कभी ज़िंदगी जिन अनुभवों से दो चार करती है, उन्हें भुला पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन हो जाताहै, मेरे "नेट-भाई" से मेरा जुड़ जाना इतना ही प्यारा अनुभव है.जी हाँ! इस हाई टैक युग में, चचेरे, ममेरे. मौसेरे का स्थान भी मोबाइल भाई, नेट भाई, चैट भाई ने ले लिया है. और रिश्ते की गरिमा में रत्ती भर फर्क भी नहीं पडा है."शैमी" से मेरा जुड़ जाना एसा ही एक टैक्निकली-एक्सपेरिमेंटल" अनुभव है. बात उस समय की है, जब मै घोर शारीरिक एवं मानसिक अनुभवों के दौर से गुज़र रही थी, एक के बाद एक अचानक से इतनी समस्याओं से अकेले कोई निबटे भी तो कैसे निबटे? वह वक्त जो कभी अपने थमने के सपने सजाया करता था, वही वक्त अचानक से इतना थम गया था कि मै रो -रो पडी थी, बिस्तर पर पड़े- पड़े बस एक ही दुआ करती थी:
"मै तन्हाँ हूँ आखिर किससे बात करूँ?
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न "
अल्लाह ने एक दिन मेरी सुन ली मुझे मेरे जैसा, अपने उम्र से पांच एक साल छोटा, एक "इन्टर नेट भाई " मिला, मेसेज से आगे निकले, खैर- ओ - खैरियत पर आए, सुख- दुख, स्कूल , कोलेज, बाजार, बगीचे, किताबे, गीतों, गज़लों और नज्मो की पगडण्डीसे होते हुए कब् जिन्दगी की फिलोसफी पर आ गए, मालूम ही नही हुआ.
हम दिन दिन भर गपियाते, देर रात तक गपशपाते, कभी कभी चाँद देखते, कभी ठंडी हवा और बदलते मौसमों का तब्सिरा करते. मै अक्सर ही चाय बना कर लाती और दूर बैठे, उस अनदेखे अजनबी भाई से गुहार लगा कर पूछती भी!!! "सुनो छोटू!! चाय पियोगे?" "हँ हाँ! क्यों नही, जरा मलाई मार कर लाना" वह भी उसी मोहब्बत से जवाब देता! हम "चीयर्स !!! " करके पीते भी! अम्मी हमारी इन हरकतों को देख कर मुस्कुरा कर रह जातीं!
कल तक जो मेरी बीमारी की वजह से दुखी थी, आज मेरे एक प्यारे से भाई को देख कर बड़ी मोहब्बत से कहतीं : "मै तो समझती थी, अब तुम्हे मै कभी छोटा भाई नहीं दे पाउंगी! सच है भाई, अल्लाह जिसे चाहे जो अता फरमाए!!!
अपनी ज़िंदगी की जंग में, बेहद तन्हाँ "मुझ" को अचानक ही, अम्मी अब्बू के घर गुज़ारे बचपन के वह दिन याद आ जाते जब, हम सब भाई-बहनों का कमरा साझा हुआ करता था, सबके पलंगो के बीच सरहद का काम करती उस टेबल की याद आते ही मुझे लगता, इसके एक ओर के पलंग पर मै हूँ और दूसरे बाजू शैमी (यों नाम तो उसका एहतेशाम है, पर मैंने उसे "शैमी" कर दिया है ), हम दूर नहीं हैं, मानो एक ही कमरे में बैठे , एक माँ जाये दो सग्गो से भी सग्गे भाई बहन!
अब वह आम भाई बहनों के जैसे मुझ से लड़ने और लाड भी लड़ाने लगा था, मसलन कभी कहता, "यार अप्पी! कित्ती मुटल्ली हो गयी हो आप!" या फिर "सच्ची अप्पी! काले कपड़ों में तो भूत ही नज़र आती हो आप!" मुझे भी आम बहनों की तरह उसकी फिक्र होने लगी थी; मुक़र्रर वक़्त पर, उसके आन-लाइन न होने से, मै घबरा जाती! बिलकुल ऐसे ही उसकी राह देखती जैसे कोई बड़ी-बहिन, रात को देर से घर आने वाले भाई के लिए, दहलीज़ पर फिक्रमंद खड़ी हो; उसके लिए दुआएं करते मेरे लबो पर बरबस ही थिरक उठता," ऐ अल्लाह! इसको इम्तेहानो में कामयाब कर "
कभी हमें एक दूसरे को देखने की ख्वाहिश नहीं हुई, पर ऐसा भी नहीं लगा कि हम निरे अजनबी है, एसा लगता था, जैसे एक-दूसरे को इतना नज़दीक से जानते हैं कि बिना कहे सुने सब देख लेते हैं, मुझे लगता जैसे एक ही किचन में, बड़े से उस पटले पर बैठ हमने साथ साथ खाना खाया हो , जिस पर अम्मी छुटपन में मुझे और चार साल बड़े भाई को साथ साथ खिलाती थीं, अक्सर काम पर जाने की जल्दी में, रोटी के नन्हे-नन्हे टुकड़े कर, उसे सालन में डुबो कर निवाले बना रख दिए जाते थे, जो अम्मी की मजबूरी समझ हम बेमन से निगल लिया करते थे, और लगता है, जब मै, अम्मी की कमी को शिद्दत से महसूस कर अह्सासे-तौहीन से रो पड़ती थी, तो जो नन्हे- नन्हे हाथ मेरे आसूं पोछा करते थे, शायद वो भी तुम्हारे ही थे.
अब मै धीरे धीरे अच्छी होने लगी थी, बिस्तर से मेरा राबता और फुर्सत में गपियाने के मेरे पल भी कम होने लगे थे, ऑफिस भी पार्ट- टाइम ज्वाइन कर लिया था, शैमी भी गले-गले वकालत की पढाई में डूब गया था, साथ धीरे धीरे कम होता जा रहा था एक रिश्ता था जो किसी बंधन में न जुड़ कर भी एक प्यारे बंधन में दिन पर दिन गुन्थता जा रहा था. एक ऐसा रिश्ता जो, निह्स्स्वार्थ भाव से बंधा बस किसी अनदेखे "उस" के सुख, "उस" की शान्ति और "उस" की खुशी के लिए था, वही, सच मानो तो, मेरे उन अकेले, और अधूरे दिनों की ताक़त था.
.जानती हूँ शैमी! वक्क्त के जिस बहाव ने हमें मिलाया, एक दिन वह हमें अलग भी कर देगा. पर मेरे नन्हे अजनबी दोस्त!!! तुम्हारी इस मदद को ज़िंदगी में कभी नहीं फरामोश कर सकूंगी मै! सच मानो!! तुम्हारी कामयाबी और कामरानी के लिए, हवा में मेरी सब अंगुलियाँ, शादाबियाँ लिखती रहेंगी......दुआओं के ज़रिये....
तुम्हारी अप्पी
लोरी.

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

तुम मै और वह

पुरुष होना कित्ता आसान है न प्रीतिश!!! तुम जब पहली बार मिले थे, धडके तो हम दोनों ही थे पर तुम्हारी हिप्पोक्रेसी ने छीन लिया मेरा वह प्यार जो अब भी कायम है (प्यार मरता नहीं है, कही गुम हो जाता है, किन्तु तुम्हारा तो गुम ही नहीं हो रहा है ) जब तुमसे पहली बार मिली थी तब ही से मन में तुमने जगह बना ली थी , क्किन्तु जैसे ही जाना, रुचिका और तुम्हारे प्रेम के घरौंदे पर मेरा पाँव अनजाने ही पड़ रहा है, मैंने अपने क़दम खींच लिए, मै जानती हूँ तुम उसका पहला प्यार हो, शायद वह भी तुम्हारी!! न प्रीतिश! मुझे गलत मत समझना, मै तुम्हारे और उसके बीच नहीं आयी थी, बस!!! एक दोस्त के नाते आयी थी, जिस दम उसने बताया कि तुम और वो बहुत आगे निकल .....,!!! (आज भी अपने गर्दन पर तुम्हारे स्पर्श को महसूस करके पागल हो जाती है वो ) बस!!! उसी लम्हे तुम पर गुस्सा आया था मुझे!!! जब ज़िंदगी में , वह स्थान खाली है ही नहीं तो मेरे साथ क्यों खेल रहे हो तुम!!!! और अब तुम ऐसे पागल पन भी करोगे कि मेरे उदगार जानने के लिए स्पीकर ओन करके, उससे मेरी बात करवाओगे, फिर जब मै चाह कर भी तुम्हारे फेवर में कुछ न कह पाउंगी तो तुम उस "कुछ -नहीं " को हकीकत मान लोगे? जब कि तुम जानते हो कि मै भी जानती हूँ कि "सुन रहे हो तुम सब कुछ."
रुचिका भी खेल सकती है मुझे पता है, वह खेल रही है मिझे यह भी पता है बस शर्म आती है तो इस बात पर कि यह बिलकुल एकता कपूर के नाटक जैसा हो रहा है, प्रीतिश!!! कई बार शब्द सच नहीं होते! (मैंने तो आँखों पर भरोसा किया था, तब भी हारी हूँ ) मै हर बार तुम्हारे लिए बेहतर कहते कहते रह जाती हूँ क्योंकि जानती हूँ, "रुचिका बर्दाश्त नहीं कर पाएगी " और अगर इसे तुम मेरी कमजोरी या उदगार समझ कर रुचिका के ज़रिये, स्पीकर ओन कर के सुन रहे हो तो , मै मानती हूँ कि यह तुम्हारी कमजोरी है! हाँ रुचिका से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध है तो उसे निभालो, "वक्त खुद अपने परिभाषाएं, और ज़रूरतें तय कर लेता है!
ज़िन्दगी भागती गाडी की खिड़की से धुन्द्लाये मंज़रों जैसी होती है, कुछ भी ज़हन के पल्लों पर ज्यादा देर नहीं टिकता! इसलिए मेरे दिल की परवाह किये बिना एक सही फैसला जल्दी ले लो, पर रब के लिए किसी से खेलो मत!!! क्योंकि खेलने वाले से ज़िन्दगी खेल जाती है, मै जहां रहूँगी, तुम्हारे लिए दुआगो हूँगी, क्योंकि प्यार तो मैंने तुमसे किया है, चाहे अनजाने ही!!! बस जहां रहो खुश रहो!!! रब तुम्हे दोस्तों और दुश्मनों के बीच का फर्क जानने की तहजीब अता करे!
- आमीन!!!
लोरी

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

अकेलापन



उसी रह-गुज़र पर
जहां से गुज़र कर
न वापस हुए तुम
बिचारा सनोबर
झुकाए हुए सर
अकेला खडा है
-मोहम्मद अल्वी

रविवार, 2 जनवरी 2011

"शी वाज़ नॉट वर्जीन "



याद करूँ क्या बोलो
उन रिक्त रीते क्षणों को
जबकि तुमने
चूमा था मुझको
पहली बारिश के नशे में

याद करूँ क्या बोलो
जबकि मुस्कुराए थे तुम
पहली बार उस क्षण को याद कर

याद करू क्या बोलो
उस गुलाबी अहसास को
जो जिया था मैंने
जबकि तुमने मुझे लाड से
बुलाया था, एक नया नाम देकर

याद करू क्या बोलो
जबकि तुमने मुझे अपना कह कर
मांग ली थी एक पूरी शाम

याद करूँ क्या बोलो
उस शाम के बाद बदले तुम्हारे तेवर
या मेरी रोती -बिलखती बेबसी
महीनो तुम्हारे बंद हो गए दरवाज़े पर

या कि याद करू
मेरा निराश हो, किसी और का
हाथ थाम चले जाना
और तुम्हारा पीछे यह कहना
"तुम्हे पता है!
शी वाज़ नॉट वर्जीन "
(दोस्त राधिका के नाम जिसने इस घटना के बाद आत्म-हत्या कर ली )

रविवार, 19 दिसंबर 2010


टूट जाए के पिघल जाए मेरे कच्चे घडे
तुझको देखू के ये आग क दरिया देखू
परवीन शाकिर

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया
तूने ढाला है और ढले हैं हम
क्या हैं, कब तक हैं, किसकी खातिर है,
बड़े संजीदा मस'अलें हैं हम

रविवार, 14 नवंबर 2010

काश! वह् रोज़े-हशर भी आए!


तू!
मेरे हमराह खडा हो
सारी दुनिया पत्थर लेकर
जब् मुझको संगसार करे
तू अपनी बाहो मे छूपा कर
तब् भी मुझ् से प्यार करे